॥ श्रीवेदव्यासाष्टकम् ॥

कलिमलास्तविवेकदिवाकरं समवलोक्य तमोवलितं जनम् । करुणया भुवि दर्शितविग्रहं मुनिवरं गुरुव्यासमहं भजे ॥ १॥ भरतवंशसमुद्धरणेच्छया स्वजननीवचसा परिनोदितः । अजनयत्तनयत्रितयं प्रभुः शुकनुतं गुरुव्यासमहं भजे ॥ २॥ मतिबलादि निरीक्ष्य कलौ नृणां लघुतरं कृपया निगमाम्बुधेः । समकरोदिह भागमनेकधा श्रुतिपतिं गुरुव्यासमहं भजे ॥ ३॥ सकलधर्मनिरूपणसागरं विविधचित्रकथासमलङ्कृतम् । व्यरचयच्च पुराणकदम्बकं कविवरं गुरुव्यासमहं भजे ॥ ४॥ श्रुतिविरोधसमन्वयदर्पणं निखिलवादिमतान्ध्यविदारणम् । ग्रथितवानपि सूत्रसमूहकं मुनिसुतं गुरुव्यासमहं भजे ॥ ५॥ यदनुभाववशेन दिवङ्गतः समधिगम्य महास्त्रसमुच्चयम् । कुरूचमूमजयद्विजयो द्रुतं द्युतिधरं गुरुव्यासमहं भजे ॥ ६॥ समरवृत्तविबोधसमीहया कुरुवरेण मुदा कृतयाचनः । सपतिसूतमदादमलेक्षणं कलिहरं गुरुव्यासमहं भजे ॥ ७॥ वननिवासपरौ कुरुदम्पति सुतशुचा तपसा च विकर्शितौ । मृततनूजगणं समदर्शयन् शरणदं गुरुव्यासमहं भजे ॥ ८॥ व्यासाष्टकमिदं पुण्यं ब्रह्मानन्देन कीर्तितम् । यः पठेन्मनुजो नित्यं स भवेच्छास्त्रपारगः ॥ Encoded and proofread by Sunder Hattangadi sunderh at hotmail.com

% Text title            : Shri Veda Vyasa Ashtakam
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% Language              : Sanskrit
% Subject               : philosophy/religion/hinduism
% Transliterated by     : Sunder Hattangadi (sunderh at hotmail.com)
% Proofread by          : Sunder Hattangadi (sunderh at hotmail.com)
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% Latest update         : August 25, 2007
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