॥ प्रश्नोपनिषत् ॥

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा \ भद्रम् पष्येमाक्षभिर्यजत्राः । \ स्थिरैरङ्गैस्तुष्तुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ %**************************************************************************** ॐ सुकेशा च भारद्वाजः शैब्यश्च सत्यकामः सौर्यायणी च गार्ग्यः कौसल्यश्चाश्वलायनो भार्गवो वैदर्भिः कबन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठाः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष ह वै तत्सर्वं वक्ष्यतीति ते ह समित्पाणयो भगवन्तं पिप्पलादमुपसन्नाः ॥ १॥ % *************************** १/१'स्त् तन् ह स ऋषिरुवच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं संवत्स्यथ यथाकामं प्रश्नान् पृच्छत यदि विज्ञास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्याम इति ॥ २॥ %*****************************१/२'न्द् ********************************** अथ कबन्धी कत्यायन उपेत्य पप्रच्छ । भगवन् कुते ह वा इमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ ३॥ %***************************** १/३'र्द् ********************************** तस्मै स होवाच प्रजाकामो वै प्रजापतिः स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा स मिथुनमुत्पादयते । रयिं च प्रणं चेत्येतौ मे बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ॥ ४॥ %***************************** १/४'थ् ********************************** आदित्यो ह वै प्राणो रयिरेव चन्द्रमा रयिर्वा एतत् सर्वं यन्मूर्तं चामूर्तं च तस्मान्मूर्तिरेव रयिः ॥ ५॥ %***************************** १/५'थ् ********************************** अथादित्य उदयन्यत्प्राचीं दिशं प्रविशति तेन प्राच्यान् प्राणान् रश्मिषु सन्निधत्ते । यद्दक्षिणां यत् प्रतीचीं यदुदीचीं यदधो यदूर्ध्वं यदन्तरा दिशो यत् सर्वं प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु सन्निधत्ते ॥ ६॥ %***************************** १/६'थ् ********************************** स एष वैश्वानरो विश्वरुपः प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाऽभ्युक्तम् ॥ ७॥ %***************************** १/७'थ् ********************************** विश्वरूपं हरिणं जातवेदसं परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम् । सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः ॥ ८॥ %***************************** १/८'थ् ********************************** संवत्सरो वै प्रजापतिस्तस्यायने दक्षिणं चोत्तरं च । तद्ये ह वै तदिष्टापूर्ते कृतमित्युपासते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते तस्मादेत ऋषयः प्रजाकामा दक्षिणं प्रतिपद्यन्ते । एष ह वै रयिर्यः पितृयाणः ॥ ९॥ %***************************** १/९'थ् ********************************** अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोधस्तदेष श्लोकः ॥ १०॥ %*****************************१/१०'थ् ********************************** पञ्चपादं पितरं द्वादशाकृतिं दिव आहुः परे अर्धे पुरीषिणम् । अथेमे अन्य उ परे विचक्षणं सप्तचक्रे षडर आहुरर्पितमिति ॥ ११॥ %*****************************१/११'थ् ********************************** मासो वै प्रजापतिस्तस्य कृष्णपक्ष एव रयिः शुक्लः प्रणस्तस्मादेत ऋषयः शुक्ल इष्टं कुर्वन्तीतर इतरस्मिन् ॥ १२॥ %*****************************१/१२'थ् ********************************** अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३॥ %*****************************१/१३'थ् ********************************** अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेतस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥ १४॥ %*****************************१/१४'थ् ********************************** तद्ये ह वै तत् प्रजापतिव्रतं चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्यं येषु सत्यं प्रतिष्टितम् ॥ १५॥ %*****************************१/१५'थ् ********************************** तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६॥ %*****************************१/१६'थ् ********************************** इति प्रश्नोपनिषदि प्रथमः प्रश्नः ॥
%*****************************१ एन्द् ********************************** अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिः पप्रच्छ । भगवन् कत्येव देवाः प्रचां दिधारयन्ते कतर एतत् प्रकशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति ॥ १ ॥ % *************************** २/१'स्त् तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो वायुरग्निरापः पृथिवी वाङ्मनश्चक्षुः श्रोत्रं च । ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामः ॥ २ ॥ % *************************** २/२'न्द् तान् वरिष्ठः प्राण उवाच । मा मोहमापद्यथ अहमेवैतत् पञ्चधाऽऽत्मानं प्रविभज्यैतद्बाणमवष्टभ्य विधारयामीति तेऽश्रद्दधाना बभूवुः ॥ ३ ॥ % *************************** २/३'र्द् सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रामत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मि/श्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्व एवोत्क्रमन्ते तस्मि/ष्च प्रत्ष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्टन्त एवम् वाङ्मनष्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥ % *************************** २/४'थ् एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मघवानेष वायुः एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं च यत् ॥ ५ ॥ % *************************** २/५'थ् अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । ऋचो यजूꣳषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥ % *************************** २/६'थ् प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे । तुभ्यं प्राण प्रजास्त्विमा बलिं हरन्ति यः प्रणैः प्रतितिष्ठसि ॥ ७ ॥ % *************************** २/७'थ् देवानामसि वह्नितमः पितृणां प्रथमा स्वधा । ऋषीणां चरितं सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥ ८ ॥ % *************************** २/८'थ् इन्द्रस्त्वं प्राण तेजसा रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि सूर्यस्त्वं ज्योतिषां पतिः ॥ ९ ॥ % *************************** २/९'थ् यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः । आनन्दरूपास्तिष्ठन्ति कामायान्नं भविष्यतीति ॥ १० ॥ % *************************** २/१०'थ् व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षरत्ता विश्वस्य सत्पतिः । वयमाद्यस्य दातारः पिता त्वं मातरिश्व नः ॥ ११ ॥ % *************************** २/११'थ् या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुषि । या च मनसि सन्तता शिवां तां कुरू मोत्क्रमीः ॥ १२ ॥ % *************************** २/१२'थ् प्राणस्येदं वशे सर्वं त्रिदिवे यत् प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व श्रीश्च प्रज्ञां च विधेहि न इति ॥ १३ ॥ % *************************** २/१३'थ् इति प्रश्नोपनिषदि द्वितीयः प्रश्नः ॥
% *************************** २ एन्द् अथ हैनं कौशल्यष्चाश्वलायनः पप्रच्छ । भगवन् कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिञ्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बह्यमभिधते कथमध्यात्ममिति ॥ १॥ % *************************** ३/१'स्त् तस्मै स होउवाचातिप्रष्चान् पृच्छसि ब्रह्मिष्ठोऽसीति तस्मात्तेऽहं ब्रवीमि ॥२॥ % *************************** ३/२'न्द् आत्मन एष प्राणो जायते । यथैषा पुरुषे छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिञ्शरीरे ॥३॥ % *************************** ३/३'र्द् यथा सम्रादेवाधिकृतान् विनियुङ्क्ते । एतन् ग्रामानोतान् ग्रामानधितिष्टस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक् पृथगेव सन्निधत्ते % *************************** ३/४'थ् पायूपस्थेऽपानं चक्षुःश्रोत्रे मुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रातिष्टते मध्ये तु समानः । एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति ॥ ५॥ % *************************** ३/५'थ् हृदि ह्येष आत्मा । अत्रैतदेकशतं नाडीनं तासां शतं शतमेकैकस्या द्वासप्ततिर्द्वासप्ततिः प्रतिशाखानाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति ॥ ६॥ % *************************** ३/६'थ् अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नयति पापेन पापमुभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥ ७॥ % *************************** ३/७'थ् आदित्यो ह वै बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्येनं चाक्षुषं प्राणमनुगृह्णानः । पृथिव्यां या देवता सैषा पुरुषस्य अपानमवष्टभ्यान्तरा यदाकाशः स समानो वायुर्व्यानः ॥ ८॥ % *************************** ३/८'थ् तेजो ह वा उदानस्तस्मादुपशान्ततेजाः । पुनर्भवमिन्द्रियैर्मनसि सम्पध्यमानैः ॥ ९॥ % *************************** ३/९'थ् यच्चित्तस्तेनैष प्राणमायाति । प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना तथासङ्कल्पितं लोकं नयति ॥ १०॥ % *************************** ३/१०'थ् य एवं विद्वान् प्राणं वेद न हास्य प्रजा हीयतेऽमृतो भवति तदेषः श्लोकः ॥ ११॥ % *************************** ३/११'थ् उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्वं चैव पञ्चधा । अध्यात्मं चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते विज्ञायामृतमश्नुत इति ॥ १२॥ % *************************** ३/१२'थ् इति प्रश्नोपनिषदि तृतीयः प्रश्नः ॥
% *************************** ३ एन्द् अथ हैनं सौर्यायणि गार्ग्यः पप्रच्छ । भगवन्नेतस्मिन् पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देवः स्वप्नान् पश्यति कस्यैतत् सुखं भवति कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्टिता भवन्तीति ॥ १॥ % *************************** ४/१'स्त् तस्मै स होवच । यथ गार्ग्य मरीचयोऽर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति । ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै तत् सर्वं परे देवे मनस्येकीभवति तेन तर्ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥ २॥ % *************************** ४/२'न्द् प्राणाग्रय एवैतस्मिन् पुरे जाग्रति । गार्हपत्यो ह वा एषोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥ ३॥ % *************************** ४/३'र्द् यदुच्छ्वासनिःश्वासावेतावाहुती समं नयतीति स समानः । मनो ह वाव यजमानः । इष्टफलमेवोदानः । स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥ ४॥ % *************************** ४/४'थ् अत्रैष देवः स्वप्ने महिमानमनुभवति । यद्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं चानुभूतं चाननुभूतं च स्च्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पस्यति ॥ ५॥ % *************************** ४/५'थ् स यदा तेजसाऽभिभूतो भवति । अत्रैष देवः स्वप्नान्न पश्यत्यथ यदैतस्मिञ्शरीर एतत्सुखं भवति ॥ ६॥ % *************************** ४/६'थ् स यथा सोभ्य वयांसि वसोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते । एवं ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ७॥ % *************************** ४/७'थ् पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्यं च श्रोत्रं च श्रोतव्यं च ग्राणं च घ्रातव्यं च रसश्च रसयितव्यं च त्वक्च स्पर्शयितव्यं च वाक्च वक्तव्यं च हस्तौ चादातव्यं चोपस्थश्चानन्दयितव्यं च पायुश्च विसर्जयितव्यं च यादौ च गन्तव्यं च मनश्च मन्तव्यं च बुद्धिश्च बोद्धिव्यं चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्यं च चित्तं च चेतयितव्यं च तेजश्च विद्योतयितव्यं च प्राणश्च विद्यारयितव्यं च ॥ ८॥ % *************************** ४/८'थ् एष हि द्रष्ट स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः । स परेऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥ ९॥ % *************************** ४/९'थ् परमेवाक्षरं प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरम्लोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य । स सर्वज्ञः सर्वो भवति । तदेष श्लोकः ॥ १०॥ % *************************** ४/१०'थ् विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भुतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः सर्वमेवाविवेशेति ॥ ११॥ % *************************** ४/११'थ् इति प्रश्नोपनिषदि चतुर्थः प्रश्नः ॥
% *************************** ४ एन्द् अथ हैनं सैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ । स यो ह वै तभ्दगवन्मनुष्येषु प्रायणान्तमोङ्कारमभिध्यायीत । कतमं वाव स तेन लोकं जयतीति । तस्मै स होवाच ॥ १॥ % *************************** ५/१'स्त् एतद्वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः । तस्माद्विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥ २॥ % *************************** ५/२'न्द् स यध्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्याभिसम्पध्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥ ३॥ % *************************** ५/३'र्द् अथ यदि द्विमात्रेण मनसि सम्पध्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम् । स सोमलोके विभुतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥ ४॥ % *************************** ५/४'थ् यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभि- ध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्भुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्भुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरुशयं पुरुषमीक्षते । तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥ ५॥ % *************************** ५/५'थ् तिस्रो मात्रा मृअत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ताः अनविप्रयुक्ताः । क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥ ६॥ % *************************** ५/६'थ् ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत् तत् कवयो वेदयन्ते । तमोङ्कारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति ॥ ७॥ % *************************** ५/७'थ् इति प्रश्नोपनिषदि पञ्चमः प्रश्नः ॥
% *************************** ५ एन्द् अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ । भगवन् हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत । षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ । तमहं कुमारम्ब्रुवं नाहमिमं वेद । यध्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति । समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति तस्मान्नार्हम्यनृतं वक्तुम् । स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज । तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥ १॥ % *************************** ६/१'स्त् तस्मै स होवाच । इहईवान्तःशरीरे सोभ्य स पुरुषो यस्मिन्नताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥ २॥ % *************************** ६/२'न्द् स ईक्षाचक्रे । कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्टिते प्रतिष्टस्यामीति ॥ ३॥ % *************************** ६/३'र्द् स प्राणमसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः । अन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्म लोका लोकेषु च नाम च ॥ ४॥ % *************************** ६/४'थ् स यथेमा नध्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिध्येते तासां नामरुपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते । एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिध्येते चासां नामरुपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥ ५॥ % *************************** ६/५'थ् अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन्प्रतिष्टिताः । तं वेध्यं पुरुषं वेद यथ मा वो मृत्युः परिव्यथा इति ॥ ६॥ % *************************** ६/६'थ् तान् होवाचैतावदेवाहमेतत् परं ब्रह्म वेद । नातः परमस्तीति ॥ ७॥ % *************************** ६/७'थ् ते तमर्चयन्तस्त्वं हि नः पिता योऽस्माकमविध्यायाः परं परं तारयसीति । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ८॥ % *************************** ६/८'थ् इति प्रश्नोपनिषदि षष्ठः प्रश्नः ॥ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा \ भद्रं पष्येमाक्षभिर्यजत्राः । \ स्थिरैरङ्गैस्तुष्तुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

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% engtitle              : Prashna Upanishad
% Category              : upaniShat
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% Texttype              : svara
% Author                : Vedic Rishis
% Language              : Sanskrit
% Subject               : Philosophy/religion/hinduism
% Transliterated by     : Sorin Suciu sorins at hotmail.com
% Proofread by          : John Manetta
% Description-comments  : 4/108; Atharva Veda, Mukhya upanishad
% Latest update         : July 20, 1999
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