||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १३ || ||ॐ श्री परमात्मने नमः || अध्याय तेरावा | क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगः | आत्मरूप गणेशु केलिया स्मरण| सकळ विद्यांचें अधिकरण| तेचि वंदूं श्रीचरण| श्रीगुरूंचे ||१|| जयांचेनि आठवें| शब्दसृष्टि आंगवे| सारस्वत आघवें| जिव्हेसि ये ||२|| वक्तृत्वा गोडपणें| अमृतातें पारुखें म्हणे| रस होती वोळंगणें| अक्षरांसी ||३|| भावाचें अवतरण| अवतरविती खूण| हाता चढे संपूर्ण| तत्त्वभेद ||४|| श्रीगुरूंचे पाय| जैं हृदय गिंवसूनि ठाय| तैं येवढें भाग्य होय| उन्मेखासी ||५|| ते नमस्कारूनि आतां| जो पितामहाचा पिता| लक्ष्मीयेचा भर्ता| ऐसें म्हणे ||६|| श्रीभगवानुवाच | इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते | एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ||१|| तरी पार्था परिसिजे| देह हें क्षेत्र म्हणिजे| जो हें जाणे तो बोलिजे| क्षेत्रज्ञु एथें ||७|| क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ञानं मतं मम ||२|| तरि क्षेत्रज्ञु जो एथें| तो मीचि जाण निरुतें| जो सर्व क्षेत्रांतें| संगोपोनि असे ||८|| क्षेत्र आणि क्षेत्रज्ञातें| जाणणें जें निरुतें| ज्ञान ऐसें तयातें| मानूं आम्ही ||९|| तत् क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् | स च यो यत्प्रभावश्च तत् समासेन मे श्रुणु ||३|| तरि क्षेत्र येणें नावें| हें शरीर जेणें भावें| म्हणितलें तें आघवें| सांगों अतां ||१०|| हें क्षेत्र का म्हणिजे| कैसें कें उपजे| कवणाकवणीं वाढविजे| विकारीं एथ ||११|| हें औट हात मोटकें| कीं केवढें पां केतुकें| बरड कीं पिके| कोणाचें हें ||१२|| इत्यादि सर्व| जे जे याचे भाव| ते बोलिजती सावेव| अवधान देईं ||१३|| पैं याचि स्थळाकारणें| श्रुति सदा बोबाणे| तर्कु येणेंचि ठिकाणें| तोंडाळु केला ||१४|| चाळिता हेचि बोली| दर्शनें शेवटा आलीं| तेवींचि नाहीं बुझविली| अझुनि द्वंद्वें ||१५|| शास्त्रांचिये सोयरिके| विचळिजे येणेंचि एकें| याचेनि एकवंकें| जगासि वादु ||१६/ | तोंडेसीं तोंडा न पडे| बोलेंसीं बोला न घडे| इया युक्ती बडबडे| त्राय जाहली ||१७|| नेणों कोणाचें हें स्थळ| परि कैसें अभिलाषाचें बळ| जेघरोघरीं कपाळ| पिटवीत असे ||१८|| नास्तिका द्यावया तोंड| वेदांचें गाढें बंड| दे देखोनि पाखांड| आनचि वाजे ||१९|| म्हणे तुम्ही निर्मूळ| लटिकें हें वाग्जाळ| ना म्हणसी तरी पोफळ| घातलें आहे ||२०|| पाखांडाचे कडे| नागवीं लुंचिती मुंडे| नियोजिली वितंडें| ताळासि येती ||२१|| म्ऱ्त्युबळाचेनि माजें| हें जाईल वीण काजें| तें देखोनियां व्याजें| निघाले योगी ||२२|| म्ऱ्त्यूनि आधाधिले| तिहीं निरंजन सेविलें| यमदमांचे केले| मेळावे पुरे ||२३|| येणेंचि क्षेत्राभिमानें| राज्य त्यजिलें ईशानें| गुंति जाणोनि स्मशानें| वासु केला ||२४|| ऐसिया पैजा महेशा| पांघुरणें दाही दिशा| लांचकरू म्हणोनि कोळसा| कामु केला ||२५|| पैं सत्यलोकनाथा| वदनें आलीं बळार्था| तरी तो सर्वथा| जाणेचिना ||२६|| ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् | ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ||४|| एक म्हणती हें स्थळ| जीवाचेंचि समूळ| मग प्राण हें कूळ| तयाचें एथ ||२७|| जे प्राणाचे घरीं| अंगें राबती भाऊ चारी| आणि मना ऐसा आवरी| कुळवाडीकरु ||२८|| तयातें इंद्रियबैलांची पेटी| न म्हणे अंवसीं पाहाटीं| विषयक्षेत्रीं आटी| काढी भली ||२९|| मग विधीची वाफ चुकवी| आणि अन्यायाचें बीज वाफवी| कुकर्माचा करवी| राबु जरी ||३०|| तरी तयाचिसारिखें| असंभड पाप पिके| मग जन्मकोटी दुःखें| भोगी जीवु ||३१|| नातरी विधीचिये वाफे| सत्क्रिया बीज आरोपे| तरी जन्मशताचीं मापें| सुखचि मवीजे ||३२|| तंव आणिक म्हणती हें नव्हे| हें जिवाचेंचि न म्हणावें| आमुतें पुसा आघवें| क्षेत्राचें या ||३३|| अहो जीवु एथ उखिता| वस्तीकरु वाटे जातां| आणि प्राणु हा बलौता| म्हणौनि जागे ||३४|| अनादि जे प्रकृती| सांख्य जियेतें गाती| क्षेत्र हे वृत्ती| तियेची जाणा ||३५|| आणि इयेतेंचि आघवा| आथी घरमेळावा| म्हणौनि ते वाहिवा| घरीं वाहे ||३६|| वाह्याचिये रहाटी| जे कां मुद्दल तिघे इये सृष्टीं| ते इयेच्याचि पोटीं| जहाले गुण ||३७|| रजोगुण पेरी| तेतुलें सत्त्व सोंकरी| मग एकलें तम करी| संवगणी ||३८|| रचूनि महत्तत्त्वाचें खळें| मळी एके काळुगेनि पोळें| तेथ अव्यक्ताची मिळे| सांज भली ||३९|| तंव एकीं मतिवंतीं| या बोलाचिया खंतीं| म्हणितलें या ज्ञप्ती| अर्वाचीना ||४०|| हां हो परतत्त्वाआंतु| कें प्रकृतीची मातु| हा क्षेत्र वृत्तांतु| उगेंचि आइका ||४१|| शून्यसेजेशालिये| सुलीनतेचिये तुळिये| निद्रा केली होती बळियें| संकल्पें येणें ||४२|| तो अवसांत चेइला| उद्यमीं सदैव भला| म्हणौनि ठेवा जोडला| इच्छावशें ||४३|| निरालंबींची वाडी| होती त्रिभुवनायेवढी| हे तयाचिये जोडी| रूपा आली ||४४|| मग महाभूतांचें एकवाट| सैरा वेंटाळूनि भाट| भूतग्रामांचे आघाट| चिरिले चारी ||४५|| यावरी आदी| पांचभूतिकांची मांदी| बांधली प्रभेदीं| पंचभूतिकीं ||४६|| कर्माकर्माचे गुंडे| बांध घातले दोहींकडे| नपुंसकें बरडें| रानें केलीं ||४७|| तेथ येरझारेलागीं| जन्ममृत्यूची सुरंगी| सुहाविली निलागी| संकल्पें येणें ||४८|| मग अहंकारासि एकलाधी| करूनि जीवितावधी| वहाविलें बुद्धि| चराचर ||४९|| यापरी निराळीं| वाढे संकल्पाची डाहाळी| म्हणौनि तो मुळीं| प्रपंचा यया ||५०|| यापरी मत्तमुगुतकीं| तेथ पडिघायिलें आणिकीं| म्हणती हां हो विवेकीं| कैसें तुम्ही ||५१|| परतत्त्वाचिया गांवीं| संकल्पसेज देखावी| तरी कां पां न मनावी| प्रकृति तयाची ? ||५२|| परि असो हें नव्हे| तुम्ही या न लगावें| आतांचि हें आघवें| सांगिजैल ||५३|| तरी आकाशीं कवणें| केलीं मेघाचीं भरणें| अंतरिक्ष तारांगणें| धरी कवण ? ||५४|| गगनाचा तडावा| कोणें वेढिला केधवां| पवनु हिंडतु असावा| हें कवणाचें मत ? ||५५|| रोमां कवण पेरी| सिंधू कवण भरी| पर्जन्याचिया करी| धारा कवण ? ||५६|| तैसें क्षेत्र हें स्वभावें| हे वृत्ती कवणाची नव्हे| हें वाहे तया फावे| येरां तुटे ||५७|| तंव आणिकें एकें| क्षोभें म्हणितलें निकें| तरी भोगिजे एकें| काळें केवीं हें ? ||५८|| तरी ययाचा मारु| देखताति अनिवारु| परी स्वमतीं भरु| अभिमानियां ||५९|| हें जाणों मृत्यु रागिटा| सिंहाडयाचा दरकुटा| परी काय वांजटा| पूरिजत असे ? ||६०|| महाकल्पापरौतीं| कव घालूनि अवचितीं| सत्यलोकभद्रजाती| आंगीं वाजे ||६१|| लोकपाळ नित्य नवे| दिग्गजांचे मेळावे| स्वर्गींचिये आडवे| रिगोनि मोडी ||६२|| येर ययाचेनि अंगवातें| जन्ममृत्यूचिये गर्तें| निर्जिवें होऊनि भ्रमतें| जीवमृगें ||६३|| न्याहाळीं पां केव्हडा| पसरलासे चवडा| जो करूनियां माजिवडा| आकारगजु ||६४|| म्हणौनि काळाची सत्ता| हाचि बोलु निरुता| ऐसे वाद पंडुसुता| क्षेत्रालागीं ||६५|| हे बहु उखिविखी| ऋषीं केली नैमिषीं| पुराणें इयेविषीं| मतपत्रिका ||६६|| अनुष्टुभादि छंदें| प्रबंधीं जें विविधें| ते पत्रावलंबन मदें| करिती अझुनी ||६७|| वेदींचें बृहत्सामसूत्र| जें देखणेपणें पवित्र| परी तयाही हें क्षेत्र| नेणवेचि ||६८|| आणीक आणीकींही बहुतीं| महाकवीं हेतुमंतीं| ययालागीं मती| वेंचिलिया ||६९|| परी ऐसें हें एवढें| कीं अमुकेयाचेंचि फुडें| हें कोणाही वरपडें| होयचिना ||७०|| आतां यावरी जैसें| क्षेत्र हें असे| तुज सांगों तैसें| साद्यंतु गा ||७१|| महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च | इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ||५|| इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः | एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ||६|| तरि महाभूतपंचकु| आणि अहंकारु एकु| बुद्धि अव्यक्त दशकु| इंद्रियांचा ||७२|| मन आणीकही एकु| विषयांचा दशकु| सुख दुःख द्वेषु| संघात इच्छा ||७३|| आणि चेतना धृती| एवं क्षेत्रव्यक्ती| सांगितली तुजप्रती| आघवीची ||७४|| आतां महाभूतें कवणें| कवण विषयो कैसीं करणे| हें वेगळालेपणें| एकैक सांगों ||७५|| तरी पृथ्वी आप तेज| वायु व्योम इयें तुज| सांगितलीं बुझ| महाभूतें पांचें ||७६|| आणि जागतिये दशे| स्वप्न लपालें असे| नातरी अंवसे| चंद्र गूढु ||७७|| नाना अप्रौढबाळकीं| तारुण्य राहे थोकीं| कां न फुलतां कळिकीं| आमोदु जैसा ||७८|| किंबहुना काष्ठीं| वन्हि जेवीं किरीटी| तेवीं प्रकृतिचिया पोटीं| गोप्यु जो असे ||७९|| जैसा ज्वरु धातुगतु| अपथ्याचें मिष पहातु| मग जालिया आंतु| बाहेरी व्यापी ||८०|| तैसी पांचांही गांठीं पडे| जैं देहाकारु उघडे| तैं नाचवी चहूंकडे| तो अहंकारु गा ||८१|| नवल अहंकाराची गोठी| विशेषें न लगे अज्ञानापाठीं| सज्ञानाचे झोंबे कंठीं| नाना संकटीं नाचवी ||८२|| आतां बुद्धि जे म्हणिजे| ते ऐशियां चिन्हीं जाणिजे| बोलिलें यदुराजें| तें आइकें सांगों ||८३|| तरी कंदर्पाचेनि बळें| इंद्रियवृत्तीचेनि मेळें| विभांडूनि येती पाळे| विषयांचे ||८४|| तो सुखदुःखांचा नागोवा| जेथ उगाणों लागे जीवा| तेथ दोहींसी बरवा| पाडु जे धरी ||८५|| हें सुख हें दुःख| हें पुण्य हें दोष| कां हें मैळ हें चोख| ऐसें जे निवडी ||८६|| जिथे अधमोत्तम सुझे| जिये सानें थोर बुझे| जिया दिठी पारखिजे| विषो जीवें ||८७|| जे तेजतत्त्वांची आदी| जे सत्त्वगुणाची वृद्धी| जे आत्मया जीवाची संधी| वसवीत असे जे ||८८|| अर्जुना ते गा जाण| बुद्धि तूं संपूर्ण| आतां आइकें वोळखण| अव्यक्ताची ||८९|| पैं सांख्यांचिया सिद्धांतीं| प्रकृती जे महामती| तेचि एथें प्रस्तुतीं| अव्यक्त गा ||९०|| आणि सांख्ययोगमतें| प्रकृती परिसविली तूंतें| ऐसी दोहीं परीं जेथें| विवंचिली ||९१|| तेथ दुजी जे जीवदशा| तिये नांव वीरेशा| येथ अव्यक्त ऐसा| पर्यावो हा ||९२|| तऱ्ही पाहालया रजनी| तारा लोपती गगनीं| कां हारपें अस्तमानीं| भूतक्रिया ||९३|| नातरी देहो गेलिया पाठीं| देहादिक किरीटी| उपाधि लपे पोटीं| कृतकर्माच्या ||९४|| कां बीजमुद्रेआंतु| थोके तरु समस्तु| कां वस्त्रपणे तंतु- | दशे राहे ||९५|| तैसे सांडोनियां स्थूळधर्म| महाभूतें भूतग्राम| लया जाती सूक्ष्म| होऊनि जेथे ||९६|| अर्जुना तया नांवें| अव्यक्त हें जाणावें| आतां आइकें आघवें| इंद्रियभेद ||९७|| तरी श्रवण नयन| त्वचा घ्राण रसन| इयें जाणें ज्ञान- | करणें पांचें ||९८|| इये तत्त्वमेळापंकीं| सुखदुःखांची उखिविखी| बुद्धि करिते मुखीं| पांचें इहीं ||९९|| मग वाचा आणि कर| चरण आणि अधोद्वार| पायु हे प्रकार| पांच आणिक ||१००|| कर्मेंद्रियें म्हणिपती| तीं इयें जाणिजती| आइकें कैवल्यपती| सांगतसे ||१०१|| पैं प्राणाची अंतौरी| क्रियाशक्ति जे शरीरीं| तियेचि रिगिनिगी द्वारीं| पांचे इहीं ||१०२|| एवं दाहाही करणें| सांगितलीं देवो म्हणे| परिस आतां फुडेपणें| मन तें ऐसें ||१०३|| जें इंद्रियां आणि बुद्धि| माझारिलिये संधीं| रजोगुणाच्या खांदीं| तरळत असे ||१०४|| नीळिमा अंबरीं| कां मृगतृष्णालहरी| तैसें वायांचि फरारी| वावो जाहलें ||१०५|| आणि शुक्रशोणिताचा सांधा| मिळतां पांचांचा बांधा| वायुतत्त्व दशधा| एकचि जाहलें ||१०६|| मग तिहीं दाहे भागीं| देहधर्माच्या खैवंगीं| अधिष्ठिलें आंगीं| आपुलाल्या ||१०७|| तेथ चांचल्य निखळ| एकलें ठेलें निढाळ| म्हणौनि रजाचें बळ| धरिलें तेणें ||१०८|| तें बुद्धीसि बाहेरी| अहंकाराच्या उरावरी| ऐसां ठायीं माझारीं| बळियावलें ||१०९|| वायां मन हें नांव| एऱ्हवीं कल्पनाचि सावेव| जयाचेनि संगें जीव- | दशा वस्तु ||११०|| जें प्रवृत्तीसि मूळ| कामा जयाचे बळ| जें अखंड सूये छळ| अहंकारासी ||१११|| जें इच्छेतें वाढवी| आशेतें चढवी| जें पाठी पुरवी| भयासि गा ||११२|| द्वैत जेथें उठी| अविद्या जेणें लाठी| जें इंद्रियांतें लोटी| विषयांमजी ||११३|| संकल्पें सृष्टी घडी| सवेंचि विकल्पूनि मोडी| मनोरथांच्या उतरंडी| उतरी रची ||११४|| जें भुलीचें कुहर| वायुतत्त्वाचें अंतर| बुद्धीचें द्वार| झाकविलें जेणें ||११५|| तें गा किरीटी मन| या बोला नाहीं आन| आतां विषयाभिधान| भेदू आइकें ||११६|| तरी स्पर्शु आणि शब्दु| रूप रसु गंधु| हा विषयो पंचविधु| ज्ञानेंद्रियांचा ||११७|| इहीं पांचैं द्वारीं| ज्ञानासि धांव बाहेरी| जैसा कां हिरवे चारीं| भांबावे पशु ||११८|| मग स्वर वर्ण विसर्गु| अथवा स्वीकार त्यागु| संक्रमण उत्सर्गु| विण्मूत्राचा ||११९|| हे कर्मेंद्रियांचे पांच| विषय गा साच| जे बांधोनियां माच| क्रिया धांवे ||१२०|| ऐसे हे दाही| विषय गा इये देहीं| आतां इच्छा तेही| सांगिजैल ||१२१|| तरि भूतलें आठवे| कां बोलें कान झांकवे| ऐसियावरि चेतवे| जे गा वृत्ती ||१२२|| इंद्रियाविषयांचिये भेटी- | सरसीच जे गा उठी| कामाची बाहुटी| धरूनियां ||१२३|| जियेचेनि उठिलेपणें| मना सैंघ धावणें| न रिगावें तेथ करणें| तोंडें सुती ||१२४|| जिये वृत्तीचिया आवडी| बुद्धी होय वेडी| विषयां जिया गोडी| ते गा इच्छा ||१२५|| आणी इच्छिलिया सांगडें| इंद्रियां आमिष न जोडे| तेथ जोडे ऐसा जो डावो पडे| तोचि द्वेषु ||१२६|| आतां यावरी सुख| तें एवंविध देख| जेणें एकेंचि अशेख| विसरे जीवु ||१२७|| मना वाचे काये| जें आपुली आण वाये| देहस्मृतीची त्राये| मोडित जें ये ||१२८|| जयाचेनि जालेपणें| पांगुळा होईजे प्राणें| सात्त्विकासी दुणें| वरीही लाभु ||१२९|| कां आघवियाचि इंद्रियवृत्ती| हृदयाचिया एकांतीं| थापटूनि सुषुप्ती| आणी जें गा ||१३०|| किंबहुना सोये| जीव आत्मयाची लाहे| तेथ जें होये| तया नाम सुख ||१३१|| आणि ऐसी हे अवस्था| न जोडतां पार्था| जें जीजे तेंचि सर्वथा| दुःख जाणे ||१३२|| तें मनोरथसंगें नव्हे| एऱ्हवीं सिद्धी गेलेंचि आहे| हे दोनीचि उपाये| सुखदुःखासी ||१३३|| आतां असंगा साक्षिभूता| देहीं चैतन्याची जे सत्ता| तिये नाम पंडुसुता| चेतना येथें ||१३४|| जे नखौनि केशवरी| उभी जागे शरीरीं| जे तिहीं अवस्थांतरी| पालटेना ||१३५|| मनबुद्ध्यादि आघवीं| जियेचेनि टवटवीं| प्रकृतिवनमाधवीं| सदांचि जे ||१३६|| जडाजडीं अंशीं| राहाटे जे सरिसी| ते चेतना गा तुजसी| लटिकें नाहीं ||१३७|| पैं रावो परिवारु नेणे| आज्ञाचि परचक्र जिणे| कां चंद्राचेनि पूर्णपणें| सिंधू भरती ||१३८|| नाना भ्रामकाचें सन्निधान| लोहो करी सचेतन| कां सूर्यसंगु जन| चेष्टवी गा ||१३९|| अगा मुख मेळेंवीण| पिलियाचें पोषण| करी निरीक्षण| कूर्मी जेवीं ||१४०|| पार्था तियापरी| आत्मसंगती इये शरीरीं| सजीवत्वाचा करी| उपेगु जडा ||४१|| मग तियेतें चेतना| म्हणिपे पैं अर्जुना| आतां धृतिविवंचना| भेदु आइक ||१४२|| तरी भूतां परस्परें| उघड जाति स्वभाववैरें| नव्हे पृथ्वीतें नीरें| न नाशिजे ? ||१४३|| नीरातें आटी तेज| तेजा वायूसि झुंज| आणि गगन तंव सहज| वायू भक्षी ||१४४|| तेवींचि कोणेही वेळे| आपण कायिसयाही न मिळे| आंतु रिगोनि वेगळें| आकाश हें ||१४५|| ऐसीं पांचही भूतें| न साहती एकमेकांतें| कीं तियेंही ऐक्यातें| देहासी येती ||१४६|| द्वंद्वाची उखिविखी| सोडूनि वसती एकीं| एकेकातें पोखी| निजगुणें गा ||१४७|| ऐसें न मिळे तयां साजणें| चळे धैर्यें जेणें| तयां नांव म्हणें| धृती मी गा ||१४८|| आणि जीवेंसी पांडवा| या छत्तिसांचा मेळावा| तो हा एथ जाणावा| संघातु पैं गा ||१४९|| एवं छत्तीसही भेद| सांगितले तुज विशद| यया येतुलियातें प्रसिद्ध| क्षेत्र म्हणिजे ||१५०|| रथांगांचा मेळावा| जेवीं रथु म्हणिजे पांडवा| कां अधोर्ध्व अवेवां| नांव देहो ||१५१|| करीतुरंगसमाजें| सेना नाम निफजे| कां वाक्यें म्हणिपती पुंजे| अक्षरांचे ||१५२|| कां जळधरांचा मेळा| वाच्य होय आभाळा| नाना लोकां सकळां| नाम जग ||१५३|| कां स्नेहसूत्रवन्ही| मेळु एकिचि स्थानीं| धरिजे तो जनीं| दीपु होय ||१५४|| तैसीं छत्तीसही इयें तत्त्वें| मिळती जेणें एकत्वें| तेणें समूह परत्वें| क्षेत्र म्हणिपे ||१५५|| आणि वाहतेनि भौतिकें| पाप पुण्य येथें पिके| म्हणौनि आम्ही कौतुकें| क्षेत्र म्हणों ||१५६|| आणि एकाचेनि मतें| देह म्हणती ययातें| परी असो हें अनंतें| नामें यया ||१५७|| पैं परतत्त्वाआरौतें| स्थावराआंतौतें| जें कांहीं होतें जातें| क्षेत्रचि हें ||१५८|| परि सुर नर उरगीं| घडत आहे योनिविभागीं| तें गुणकर्मसंगीं| पडिलें सातें ||१५९|| हेचि गुणविवंचना| पुढां म्हणिपैल अर्जुना| प्रस्तुत आतां तुज ज्ञाना| रूप दावूं ||१६०|| क्षेत्र तंव सविस्तर| सांगितलें सविकार| म्हणौनि आतां उदार| ज्ञान आइकें ||१६१|| जया ज्ञानालागीं| गगन गिळिताती योगी| स्वर्गाची आडवंगी| उमरडोनि ||१६२|| न करिती सिद्धीची चाड| न धरिती ऋद्धीची भीड| योगाऐसें दुवाड| हेळसिती ||१६३|| तपोदुर्गें वोलांडित| क्रतुकोटि वोवांडित| उलथूनि सांडित| कर्मवल्ली ||१६४|| नाना भजनमार्गी| धांवत उघडिया आंगीं| एक रिगताति सुरंगीं| सुषुम्नेचिये ||१६५|| ऐसी जिये ज्ञानीं| मुनीश्वरांची उतान्ही| वेदतरूच्या पानोवानीं| हिंडताती ||१६६|| देईल गुरुसेवा| इया बुद्धि पांडवा| जन्मशतांचा सांडोवा| टाकित जे ||१६७|| जया ज्ञानाची रिगवणी| अविद्ये उणें आणी| जीवा आत्मया बुझावणी| मांडूनि दे ||१६८|| जें इंद्रियांचीं द्वारें आडी| प्रवृत्तीचे पाय मोडी| जें दैन्यचि फेडी| मानसाचें ||१६९|| द्वैताचा दुकाळु पाहे| साम्याचें सुयाणें होये| जया ज्ञानाची सोये| ऐसें करी ||१७०|| मदाचा ठावोचि पुसी| जें महामोहातें ग्रासी| नेदी आपपरु ऐसी| भाष उरों ||१७१|| जें संसारातें उन्मूळी| संकल्पपंकु पाखाळी| अनावरातें वेंटाळी| ज्ञेयातें जें ||१७२|| जयाचेनि जालेपणें| पांगुळा होईजे प्राणें| जयाचेनि विंदाणें| जग हें चेष्टें ||१७३|| जयाचेनि उजाळें| उघडती बुद्धीचे डोळे| जीवु दोंदावरी लोळे| आनंदाचिया ||१७४|| ऐसें जें ज्ञान| पवित्रैकनिधान| जेथ विटाळलें मन| चोख कीजे ||१७५|| आत्मया जीवबुद्धी| जे लागली होती क्षयव्याधी| ते जयाचिये सन्निधी| निरुजा कीजे ||१७६|| तें अनिरूप्य कीं निरूपिजे| ऐकतां बुद्धी आणिजे| वांचूनि डोळां देखिजे| ऐसें नाहीं ||१७७|| मग तेचि इये शरीरीं| जैं आपुला प्रभावो करी| तैं इंद्रियांचिया व्यापारीं| डोळांहि दिसे ||१७८|| पैं वसंताचें रिगवणें| झाडांचेनि साजेपणें| जाणिजे तेवीं करणें| सांगती ज्ञान ||१७९|| अगा वृक्षासि पाताळीं| जळ सांपडे मुळीं| तें शाखांचिये बाहाळीं| बाहेर दिसे ||१८०|| कां भूमीचें मार्दव| सांगे कोंभाची लवलव| नाना आचारगौरव| सुकुलीनाचें ||१८१|| अथवा संभ्रमाचिया आयती| स्नेहो जैसा ये व्यक्ती| कां दर्शनाचिये प्रशस्तीं| पुण्यपुरुष ||१८२|| नातरी केळीं कापूर जाहला| जेवीं परिमळें जाणों आला| कां भिंगारीं दीपु ठेविला| बाहेरी फांके ||१८३|| तैसें हृदयींचेनि ज्ञानें| जियें देहीं उमटती चिन्हें| तियें सांगों आतां अवधानें| चागें आइक ||१८४|| अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् | आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ||७|| तरी कवणेही विषयींचें| साम्य होणें न रुचे| संभावितपणाचें| वोझे जया ||१८५|| आथिलेचि गुण वानितां| मान्यपणें मानितां| योग्यतेचें येतां| रूप आंगा ||१८६|| तैं गजबजों लागे कैसा| व्याधें रुंधला मृगु जैसा| कां बाहीं तरतां वळसा| दाटला जेवीं ||१८७|| पार्था तेणें पाडें| सन्मानें जो सांकडे| गरिमेतें आंगाकडे| येवोंचि नेदी ||१८८|| पूज्यता डोळां न देखावी| स्वकीर्ती कानीं नायकावी| हा अमुका ऐसी नोहावी| सेचि लोकां ||१८९|| तेथ सत्काराची कें गोठी| कें आदरा देईल भेटी| मरणेंसीं साटी| नमस्कारितां ||१९०|| वाचस्पतीचेनि पाडें| सर्वज्ञता तरी जोडे| परी वेडिवेमाजीं दडे| महमेभेणें ||१९१|| चातुर्य लपवी| महत्त्व हारवी| पिसेपण मिरवी| आवडोनि ||१९२|| लौकिकाचा उद्वेगु| शास्त्रांवरी उबगु| उगेपणीं चांगु| आथी भरु ||१९३|| जगें अवज्ञाचि करावी| संबंधीं सोयचि न धरावी| ऐसी ऐसी जीवीं| चाड बहु ||१९४|| तळौटेपण बाणे| आंगीं हिणावो खेवणें| तें तेंचि करणें| बहुतकरुनी ||१९५|| हा जीतु ना नोहे| लोक कल्पी येणें भावें| तैसें जिणें होआवें| ऐसी आशा ||१९६|| पै चालतु कां नोहे| कीं वारेनि जातु आहे| जना ऐसा भ्रमु जाये| तैसें होईजे ||१९७|| माझें असतेपण लोपो| नामरूप हारपो| मज झणें वासिपो| भूतजात ||१९८|| ऐसीं जयाचीं नवसियें| जो नित्य एकांता जातु जाये| नामेंचि जो जिये| विजनाचेनि ||१९९|| वायू आणि तया पडे| गगनेंसीं बोलों आवडे| जीवें प्राणें झाडें| पढियंतीं जया ||२००|| किंबहुना ऐसीं| चिन्हें जया देखसी| जाण तया ज्ञानेंसीं| शेज जाहली ||२०१|| पैं अमानित्व पुरुषीं| तें जाणावें इहीं मिषीं| आतां अदंभाचिया वोळखीसी| सौरसु देवों ||२०२|| तरी अदंभित्व ऐसें| लोभियाचें मन जैसें| जीवु जावो परी नुमसे| ठेविला ठावो ||२०३|| तयापरी किरीटी| पडिलाही प्राणसंकटीं| तरी सुकृत न प्रकटी| आंगें बोलें ||२०४|| खडाणें आला पान्हा| पळवी जेवीं अर्जुना| कां लपवी पण्यांगना| वडिलपण ||२०५|| आढ्यु आतुडे आडवीं| मग आढ्यता जेवीं हारवी| नातरी कुळवधू लपवी| अवेवांतें ||२०६|| नाना कृषीवळु आपुलें| पांघुरवी पेरिलें| तैसें झांकी निपजलें| दानपुण्य ||२०७|| वरिवरी देहो न पूजी| लोकांतें न रंजी| स्वधर्मु वाग्ध्वजीं| बांधों नेणे ||२०८|| परोपकारु न बोले| न मिरवी अभ्यासिलें| न शके विकूं जोडलें| स्फीतीसाठीं ||२०९|| शरीर भोगाकडे| पाहतां कृपणु आवडे| एऱ्हवीं धर्मविषयीं थोडें| बहु न म्हणे ||२१०|| घरीं दिसे सांकड| देहींची आयती रोड| परी दानीं जया होड| सुरतरूसीं ||२११|| किंबहुना स्वधर्मीं थोरु| अवसरीं उदारु| आत्मचर्चे चतुरु| एऱ्हवी वेडा ||२१२|| केळीचें दळवाडें| हळू पोकळ आवडे| परी फळोनियां गाढें| रसाळ जैसें ||२१३|| कां मेघांचें आंग झील| दिसे वारेनि जैसें जाईल| परी वर्षती नवल| घनवट तें ||२१४|| तैसा जो पूर्णपणीं| पाहतां धाती आयणी| एऱ्हवीं तरी वाणी| तोचि ठावो ||२१५|| हें असो या चिन्हांचा| नटनाचु ठायीं जयाच्या| जाण ज्ञान तयाच्या| हातां चढें ||२१६|| पैं गा अदंभपण| म्हणितलें तें हें जाण| आतां आईक खूण| अहिंसेची ||२१७|| तरी अहिंसा बहुतीं परीं| बोलिली असे अवधारीं| आपुलालिया मतांतरीं| निरूपिली ||२१८|| परी ते ऐसी देखा| जैशा खांडूनियां शाखा| मग तयाचिया बुडुखा| कूंप कीजे ||२१९|| कां बाहु तोडोनि पचविजे| मग भूकेची पीडा राखिजे| नाना देऊळ मोडोनि कीजे| पौळी देवा ||२२०|| तैसी हिंसाचि करूनि अहिंसा| निफजविजे हा ऐसा| पैं पूर्वमीमांसा| निर्णो केला ||२२१|| जे अवृष्टीचेनि उपद्रवें| गादलें विश्व आघवें| म्हणौनि पर्जन्येष्टी करावे| नाना याग ||२२२|| तंव तिये इष्टीचिया बुडीं| पशुहिंसा रोकडी| मग अहिंसेची थडी| कैंची दिसे ? ||२२३|| पेरिजे नुसधी हिंसा| तेथ उगवैल काय अहिंसा ? | परी नवल बापा धिंवसा| या याज्ञिकांचा ||२२४|| आणि आयुर्वेदु आघवा| तो याच मोहोरा पांडवा| जे जीवाकारणें करावा| जीवघातु ||२२५|| नाना रोगें आहाळलीं| लोळतीं भूतें देखिलीं| ते हिंसा निवारावया केली| चिकित्सा कां ||२२६|| तंव ते चिकित्से पहिलें| एकाचे कंद खणविले| एका उपडविलें| समूळीं सपत्रीं ||२२७|| एकें आड मोडविली| अजंगमाची खाल काढविली| एकें गर्भिणी उकडविली| पुटामाजीं ||२२८|| अजातशत्रु तरुवरां| सर्वांगीं देवविल्या शिरा| ऐसे जीव घेऊनि धनुर्धरा| कोरडे केले ||२२९|| आणि जंगमाही हात| लाऊनि काढिलें पित्त| मग राखिले शिणत| आणिक जीव ||२३०|| अहो वसतीं धवळारें| मोडूनि केलीं देव्हारें| नागवूनि वेव्हारें| गवांदी घातली ||२३१|| मस्तक पांघुरविलें| तंव तळवटीं उघडें पडलें| घर मोडोनि केले| मांडव पुढें ||२३२|| नाना पांघुरणें| जाळूनि जैसें तापणें| जालें आंगधुणें| कुंजराचें ||२३३|| नातरी बैल विकूनि गोठा| पुंसा लावोनि बांधिजे गांठा| इया करणी कीं चेष्टा ? | काइ हसों ||२३४|| एकीं धर्माचिया वाहणी| गाळूं आदरिलें पाणी| तंव गाळितया आहाळणीं| जीव मेले ||२३५|| एक न पचवितीचि कण| इये हिंसेचे भेण| तेथ कदर्थले प्राण| तेचि हिंसा ||२३६|| एवं हिंसाचि अहिंसा| कर्मकांडीं हा ऐसा| सिद्धांतु सुमनसा| वोळखें तूं ||२३७|| पहिलें अहिंसेचें नांव| आम्हीं केलें जंव| तंव स्फूर्ति बांधली हांव| इये मती ||२३८|| तरि कैसेनि इयेतें गाळावें| म्हणौनि पडिलें बोलावें| तेवींचि तुवांही जाणावें| ऐसा भावो ||२३९|| बहुतकरूनि किरीटी| हाचि विषो इये गोठी| एऱ्हवी कां आडवाटीं| धाविजैल गा ? ||२४०|| आणि स्वमताचिया निर्धारा- | लागोनियां धनुर्धरा| प्राप्तां मतांतरां| निर्वेचु कीजे ||२४१|| ऐसी हे अवधारीं| निरूपिती परी| आतां ययावरी| मुख्य जें गा ||२४२|| तें स्वमत बोलिजैल| अहिंसे रूप किजैल| जेणें उठलिया आंतुल| ज्ञान दिसे ||२४३|| परी तें अधिष्ठिलेनि आंगें| जाणिजे आचरतेनि बगें| जैसी कसवटी सांगे| वानियातें ||२४४|| तैसें ज्ञानामनाचिये भेटी| सरिसेंचि अहिंसेचें बिंब उठी| तेंचि ऐसें किरीटी| परिस आतां ||२४४|| तरी तरंगु नोलांडितु| लहरी पायें न फोडितु| सांचलु न मोडितु| पाणियाचा ||२४६|| वेगें आणि लेसा| दिठी घालूनि आंविसा| जळीं बकु जैसा| पाउल सुये ||२४७|| कां कमळावरी भ्रमर| पाय ठेविती हळुवार| कुचुंबैल केसर| इया शंका ||२४८|| तैसे परमाणु पां गुंतले| जाणूनि जीव सानुले| कारुण्यामाजीं पाउलें| लपवूनि चाले ||२४९|| ते वाट कृपेची करितु| ते दिशाचि स्नेह भरितु| जीवातळीं आंथरितु| आपुला जीवु ||२५०|| ऐसिया जतना| चालणें जया अर्जुना| हें अनिर्वाच्य परिमाणा| पुरिजेना ||२५१|| पैं मोहाचेनि सांगडें| लासी पिलीं धरी तोंडें| तेथ दांतांचे आगरडे| लागती जैसे ||२५२|| कां स्नेहाळु माये| तान्हयाची वास पाहे| तिये दिठी आहे| हळुवार जें ||२५३|| नाना कमळदळें| डोलविजती ढाळें| तो जेणें पाडें बुबुळें| वारा घेपे ||२५४|| तैसेनि मार्दवें पाय| भूमीवरी न्यसीतु जाय| लागती तेथ होय| जीवां सुख ||२५५|| ऐसिया लघिमा चालतां| कृमि कीटक पंडुसुता| देखे तरी माघौता| हळूचि निघे ||२५६|| म्हणे पावो धडफडील| तरी स्वामीची निद्रा मोडैल| रचलेपणा पडैल| झोती हन ||२५७|| इया काकुळती| वाहणी घे माघौती| कोणेही व्यक्ती| न वचे वरी ||२५८|| जीवाचेनि नांवें| तृणातेंही नोलांडवे| मग न लेखितां जावें| हे कें गोठी ? ||२५९|| मुंगिये मेरु नोलांडवे| मशका सिंधु न तरवे| तैसा भेटलियां न करवे| अतिक्रमु ||२६०|| ऐसी जयाची चाली| कृपाफळी फळा आली| देखसी जियाली| दया वाचे ||२६१|| स्वयें श्वसणेंचि सुकुमार| मुख मोहाचें माहेर| माधुर्या जाहले अंकुर| दशन तैसे ||२६२|| पुढां स्नेह पाझरे| माघां चालती अक्षरें| शब्द पाठीं अवतरे| कृपा आधीं ||२६३|| तंव बोलणेंचि नाहीं| बोलों म्हणे जरी कांहीं| तरी बोल कोणाही| खुपेल कां ||२६४|| बोलतां अधिकुही निघे| तरी कोण्हाही वर्मीं न लगे| आणि कोण्हासि न रिघे| शंका मनीं ||२६५|| मांडिली गोठी हन मोडैल| वासिपैल कोणी उडैल| आइकोनिचि वोवांडिल| कोण्ही जरी ||२६६|| तरी दुवाळी कोणा नोहावी| भुंवई कवणाची नुचलावी| ऐसा भावो जीवीं| म्हणौनि उगा ||२६७|| मग प्रार्थिला विपायें| जरी लोभें बोलों जाये| तरी परिसतया होये| मायबापु ||२६८|| कां नादब्रह्मचि मुसे आलें| कीं गंगापय असललें| पतिव्रते आलें| वार्धक्य जैसे ||२६९|| तैसें साच आणि मवाळ| मितले आणि रसाळ| शब्द जैसे कल्लोळ| अमृताचे ||२७०|| विरोधुवादुबळु| प्राणितापढाळु| उपहासु छळु| वर्मस्पर्शु ||२७१|| आटु वेगु विंदाणु| आशा शंका प्रतारणु| हे संन्यासिले अवगुणु| जया वाचा ||२७२|| आणि तयाचि परी किरीटी| थाउ जयाचिये दिठी| सांडिलिया भ्रुकुटी| मोकळिया ||२७३|| कां जे भूतीं वस्तु आहे| तियें रुपों शके विपायें| म्हणौनि वासु न पाहे| बहुतकरूनी ||२७४|| ऐसाही कोणे एके वेळे| भीतरले कृपेचेनि बळें| उघडोनियां डोळे| दृष्टी घाली ||२७५|| तरी चंद्रबिंबौनि धारा| निघतां नव्हती गोचरा| परि एकसरें चकोरां| निघती दोंदें ||२७६|| तैसें प्राणियांसि होये| जरी तो कहींवासु पाहे| तया अवलोकनाची सोये| कूर्मींही नेणे ||२७७|| किंबहुना ऐसी| दिठी जयाची भूतांसी| करही देखसी| तैसेचि ते ||२७८|| तरी होऊनियां कृतार्थ| राहिले सिद्धांचे मनोरथ| तैसे जयाचे हात| निर्व्यापार ||२७९|| अक्षमें आणि संन्यासिलें| कीं निरिंधन आणि विझालें| मुकेनि घेतलें| मौन जैसें ||२८०|| तयापरी कांहीं| जयां करां करणें नाहीं| जे अकर्तयाच्या ठायीं| बैसों येती ||२८१|| आसुडैल वारा| नख लागेल अंबरा| इया बुद्धी करां| चळों नेदी ||२८२|| तेथ आंगावरिलीं उडवावीं| कां डोळां रिगतें झाडावीं| पशुपक्ष्यां दावावीं| त्रासमुद्रा ||२८३|| इया केउतिया गोठी| नावडे दंडु काठी| मग शस्त्राचें किरीटी| बोलणें कें ? ||२८४|| लीलाकमळें खेळणें| कांपुष्पमाळा झेलणें| न करी म्हणे गोफणें| ऐसें होईल ||२८५|| हालवतील रोमावळी| यालागीं आंग न कुरवाळी| नखांची गुंडाळी| बोटांवरी ||२८६|| तंव करणेयाचाचि अभावो| परी ऐसाही पडे प्रस्तावो| तरी हातां हाचि सरावो| जे जोडिजती ||२८७|| कां नाभिकारा उचलिजे| हातु पडिलियां देइजे| नातरी आर्तातें स्पर्शिजे| अळुमाळु ||२८८|| हेंही उपरोधें करणें| तरी आर्तभय हरणें| नेणती चंद्रकिरणें| जिव्हाळा तो ||२८९|| पावोनि तो स्पर्शु| मलयानिळु खरपुसु| तेणें मानें पशु| कुरवाळणें ||२९०|| जे सदा रिते मोकळे| जैशी चंदनांगें निसळें| न फळतांही निर्फळें| होतीचिना ||२९१|| आतां असो हें वाग्जाळ| जाणें तें करतळ| सज्जनांचे शीळ| स्वभाव जैसे ||२९२|| आतां मन तयाचें| सांगों म्हणों जरी साचें| तरी सांगितले कोणाचे| विलास हे ? ||२९३|| काइ शाखा नव्हे तरु ? | जळेंवीण असे सागरु ? | तेज आणि तेजाकारु| आन काई ? ||२९४|| अवयव आणि शरीर| हे वेगळाले कीर ? | कीं रसु आणि नीर| सिनानीं आथी ? ||२९५|| म्हणौनि हे जे सर्व| सांगितले बाह्य भाव| ते मनचि गा सावयव| ऐसें जाणें ||२९६|| जें बीज भुईं खोंविलें| तेंचि वरी रुख जाहलें| तैसें इंद्रियाद्वारीं फांकलें| अंतरचि कीं ||२९७|| पैं मानसींचि जरी| अहिंसेची अवसरी| तरी कैंची बाहेरी| वोसंडेल ? ||२९८|| आवडे ते वृत्ती किरीटी| आधीं मनौनीचि उठी| मग ते वाचे दिठी| करांसि ये ||२९९|| वांचूनि मनींचि नाहीं| तें वाचेसि उमटेल काई ? | बींवीण भुईं| अंकुर असे ? ||३००|| म्हणौनि मनपण जैं मोडे| तैं इंद्रिय आधींचि उबडें| सूत्रधारेंवीण साइखडें| वावो जैसें ||३०१|| उगमींचि वाळूनि जाये| तें वोघीं कैचें वाहे| जीवु गेलिया आहे| चेष्टा देहीं ? ||३०२|| तैसें मन हें पांडवा| मूळ या इंद्रियभावा| हेंचि राहटे आघवां| द्वारीं इहीं ||३०३|| परी जिये वेळीं जैसें| जें होऊनि आंतु असे| बाहेरी ये तैसें| व्यापाररूपें ||३०४|| यालागी साचोकारें| मनीं अहिंसा थांवे थोरें| पिकली द्रुती आदरें| बोभात निघे ||३०५|| म्हणौनि इंद्रियें तेचि संपदा| वेचितां हीं उदावादा| अहिंसेचा धंदा| करितें आहाती ||३०६|| समुद्रीं दाटे भरितें| तैं समुद्रचि भरी तरियांते| तैसें स्वसंपत्ती चित्तें| इंद्रियां केलें ||३०७|| हें बहु असो पंडितु| धरुनि बाळकाचा हातु| वोळी लिही व्यक्तु| आपणचि ||३०८|| तैसें दयाळुत्व आपुलें| मनें हातापायां आणिलें| मग तेथ उपजविलें| अहिंसेतें ||३०९|| याकारणें किरीटी| इंद्रियांचिया गोठी| मनाचिये राहाटी| रूप केलें ||३१०|| ऐसा मनें देहें वाचा| सर्व संन्यासु दंडाचा| जाहला ठायीं जयाचा| देखशील ||३११|| तो जाण वेल्हाळ| ज्ञानाचें वेळाउळ| हें असो निखळ| ज्ञानचि तो ||३१२|| जे अहिंसा कानें ऐकिजे| ग्रंथाधारें निरूपिजे| ते पाहावी हें उपजे| तैं तोचि पाहावा ||३१३|| ऐसें म्हणितलें देवें| तें बोलें एकें सांगावें| परी फांकला हें उपसाहावें| तुम्हीं मज ||३१४|| म्हणाल हिरवें चारीं गुरूं| विसरे मागील मोहर धरूं| कां वारेलगें पांखिरूं| गगनीं भरे ||३१५|| तैसिया प्रेमाचिया स्फूर्ती| फावलिया रसवृत्तीं| वाहविला मती| आकळेना ||३१६|| तरि तैसें नोहे अवधारा| कारण असें विस्तारा| एऱ्हवीं पद तरी अक्षरां| तिहींचेंचि ||३१७|| अहिंसा म्हणतां थोडी| परी ते तैंचि होय उघडी| जैं लोटिजती कोडी| मतांचिया ||३१८|| एऱ्हवीं प्राप्तें मतांतरें| थातंबूनि आंगभरें| बोलिजैल ते न सरे| तुम्हांपाशीं ||३१९|| रत्नपारखियांच्या गांवीं| जाईल गंडकी तरी सोडावी| काश्मीरीं न करावी| मिडगण जेवीं ||३२०|| काइसा वासु कापुरा| मंद जेथ अवधारा| पिठाचा विकरा| तिये सातें ? ||३२१|| म्हणौनि इये सभे| बोलकेपणाचेनि क्षोभें| लाग सरूं न लभे| बोला प्रभु ||३२२|| सामान्या आणि विशेषा| सकळै कीजेल देखा| तरी कानाचेया मुखा- | कडे न्याल ना तुम्ही ||३२३|| शंकेचेनि गदळें| जैं शुद्ध प्रमेय मैळे| तैं मागुतिया पाउलीं पळे| अवधान येतें ||३२४|| कां करूनि बाबुळियेची बुंथी| जळें जियें ठाती| तयांची वास पाहाती| हंसु काई ? ||३२५|| कां अभ्रापैलीकडे| जैं येत चांदिणें कोडें| तैं चकोरें चांचुवडें| उचलितीना ||३२६|| तैसें तुम्ही वास न पाहाल| ग्रंथु नेघा वरी कोपाल| जरी निर्विवाद नव्हैल| निरूपण ||३२७|| न बुझावितां मतें| न फिटे आक्षेपाचें लागतें| तें व्याख्यान जी तुमतें| जोडूनि नेदी ||३२८|| आणि माझें तंव आघवें| ग्रथन येणेचि भावें| जे तुम्हीं संतीं होआवें| सन्मुख सदां ||३२९|| एऱ्हवीं तरी साचोकारें| तुम्ही गीतार्थाचे सोइरे| जाणोनि गीता एकसरें| धरिली मियां ||३३०|| जें आपुलें सर्वस्व द्याल| मग इयेतें सोडवूनि न्याल| म्हणौनि ग्रंथु नव्हे वोल| साचचि हे ||३३१|| कां सर्स्वाचा लोभु धरा| वोलीचा अव्हेरु करा| तरी गीते मज अवधारा| एकचि गती ||३३२|| किंबहुना मज| तुमचिया कृपा काज| तियेलागीं व्याज| ग्रंथाचें केलें ||३३३|| तरी तुम्हां रसिकांजोगें| व्याख्यान शोधावें लागे| म्हणौनि जी मतांगें| बोलों गेलों ||३३४|| तंव कथेसि पसरु जाहला| श्लोकार्थु दूरी गेला| कीजो क्षमा यया बोला| अपत्या मज ||३३५|| आणि घांसाआंतिल हरळु| फेडितां लागे वेळु| ते दूषण नव्हें खडळु| सांडावा कीं ||३३६|| कां संवचोरा चुकवितां| दिवस लागलिया माता| कोपावें कीं जीविता| जिताणें कीजे ? ||३३७|| परी यावरील हें नव्हे| तुम्हीं उपसाहिलें तेंचि बरवें| आतां अवधारिजो देवें| बोलिलें ऐसें ||३३८|| म्हणे उन्मेखसुलोचना| सावध होईं अर्जुना| करूं तुज ज्ञाना| वोळखी आतां ||३३९|| तरी ज्ञान गा तें एथें| वोळख तूं निरुतें| आक्रोशेंवीण जेथें| क्षमा असे ||३४०|| अगाध सरोवरीं| कमळिणी जियापरी| कां सदैवाचिया घरीं| संपत्ति जैसी ||३४१|| पार्था तेणें पाडें| क्षमा जयातें वाढे| तेही लक्षे तें फुडें| लक्षण सांगों ||३४२|| तरी पढियंते लेणें| आंगीं भावें जेणें| धरिजे तेवीं साहणें| सर्वचि जया ||३४३|| त्रिविध मुख्य आघवे| उपद्रवांचे मेळावे| वरी पडिलिया नव्हे| वांकुडा जो ||३४४|| अपेक्षित पावे| तें जेणें तोषें मानवें| अनपेक्षिताही करवे| तोचि मानु ||३४५|| जो मानापमानातें साहे| सुखदुःख जेथ सामाये| निंदास्तुती नोहे| दुखंडु जो ||३४६|| उन्हाळेनि जो न तपे| हिमवंती न कांपे| कयसेनिही न वासिपे| पातलेया ||३४७|| स्वशिखरांचा भारु| नेणें जैसा मेरु| कीं धरा यज्ञसूकरु| वोझें न म्हणे ||३४८|| नाना चराचरीं भूतीं| दाटणी नव्हे क्षिती| तैसा नाना द्वंद्वीं प्राप्तीं| घामेजेना ||३४९|| घेऊनी जळाचे लोट| आलिया नदीनदांचे संघाट| करी वाड पोट| समुद्र जेवीं ||३५०|| तैसें जयाचिया ठायीं| न साहणें काहींचि नाहीं| आणि साहतु असे ऐसेंही| स्मरण नुरे ||३५१|| आंगा जें पातलें| तें करूनि घाली आपुलें| येथ साहतेनि नवलें| घेपिजेना ||३५२|| हे अनाक्रोश क्षमा| जयापाशीं प्रियोत्तमा| जाण तेणें महिमा| ज्ञानासि गा ||३५३|| तो पुरुषु पांडवा| ज्ञानाचा वोलावा| आतां परिस आर्जवा| रूप करूं ||३५४|| तरी आर्जव तें ऐसें| प्राणाचें सौजन्य जैसें| आवडे तयाही दोषें| एकचि गा ||३५५|| कां तोंड पाहूनि प्रकाशु| न करी जेवीं चंडांशु| जगा एकचि अवकाशु| आकाश जैसें ||३५६|| तैसें जयाचें मन| माणुसाप्रति आन आन| नव्हे आणि वर्तन| ऐसें पैं तें ||३५७|| जे जगेंचि सनोळख| जगेंसीं जुनाट सोयरिक| आपपर हें भाख| जाणणें नाहीं ||३५८|| भलतेणेंसीं मेळु| पाणिया ऐसा ढाळु| कवणेविखीं आडळु| नेघे चित्त ||३५९|| वारियाची धांव| तैसे सरळ भाव| शंका आणि हांव| नाहीं जया ||३६०|| मायेपुढें बाळका| रिगतां न पडे शंका| तैसें मन देतां लोकां| नालोची जो ||३६१|| फांकलिया इंदीवरा| परिवारु नाहीं धनुर्धरा| तैसा कोनकोंपरा| नेणेचि जो ||३६२|| चोखाळपण रत्नाचें| रत्नावरी किरणाचें| तैसें पुढां मन जयाचें| करणें पाठीं ||३६३|| आलोचूं जो नेणे| अनुभवचि जोगावणें| धरी मोकळी अंतःकरणें| नव्हेचि जया ||३६४|| दिठी नोहे मिणधी| बोलणें नाहीं संदिग्धी| कवणेंसीं हीनबुद्धी| राहाटीजे ना ||३६५|| दाही इंद्रियें प्रांजळें| निष्प्रपंचें निर्मळें| पांचही पालव मोकळे| आठही पाहर ||३६६|| अमृताची धार| तैसें उजूं अंतर| किंबहुना जो माहेर| या चिन्हांचें ||३६७|| तो पुरुष सुभटा| आर्जवाचा आंगवटा| जाण तेथेंचि घरटा| ज्ञानें केला ||३६८|| आतां ययावरी| गुरुभक्तीची परी| सांगों गा अवधारीं| चतुरनाथा ||३६९|| आघवियाचि दैवां| जन्मभूमि हे सेवा| जे ब्रह्म करी जीवा| शोच्यातेंहि ||३७०|| हें आचार्योपास्ती| प्रकटिजैल तुजप्रती| बैसों दे एकपांती| अवधानाची ||३७१|| तरी सकळ जळसमृद्धी| घेऊनि गंगा निघाली उदधी| कीं श्रुति हे महापदीं| पैठी जाहाली ||३७२|| नाना वेंटाळूनि जीवितें| गुणागुण उखितें| प्राणनाथा उचितें| दिधलें प्रिया ||३७३|| तैसें सबाह्य आपुलें| जेणें गुरुकुळीं वोपिलें| आपणपें केलें| भक्तीचें घर ||३७४|| गुरुगृह जये देशीं| तो देशुचि वसे मानसीं| विरहिणी कां जैसी| वल्लभातें ||३७५|| तियेकडोनि येतसे वारा| देखोनि धांवे सामोरा| आड पडे म्हणे घरा| बीजें कीजो ||३७६|| साचा प्रेमाचिया भुली| तया दिशेसीचि आवडे बोली| जीवु थानपती करूनि घाली| गुरुगृहीं जो ||३७७|| परी गुरुआज्ञा धरिलें| देह गांवीं असे एकलें| वांसरुवा लाविलें| दावें जैसें ||३७८|| म्हणे कैं हें बिरडें फिटेल| कैं तो स्वामी भेटेल| युगाहूनि वडील| निमिष मानी ||३७९|| ऐसेया गुरुग्रामींचें आलें| कां स्वयें गुरूंनींचि धाडिलें| तरी गतायुष्या जोडलें| आयुष्य जैसें ||३८०|| कां सुकतया अंकुरा- | वरी पडलिया पीयूषधारा| नाना अल्पोदकींचा सागरा| आला मासा ||३८१|| नातरी रंकें निधान देखिलें| कां आंधळिया डोळे उघडले| भणंगाचिया आंगा आलें| इंद्रपद ||३८२|| तैसें गुरुकुळाचेनि नांवें| महासुखें अति थोरावे| जें कोडेंही पोटाळवें| आकाश कां ||३८३|| पैं गुरुकुळीं ऐसी| आवडी जया देखसी| जाण ज्ञान तयापासीं| पाइकी करी ||३८४|| आणि अभ्यंतरीलियेकडे| प्रेमाचेनि पवाडे| श्रीगुरूंचें रूपडें| उपासी ध्यानीं ||३८५|| हृदयशुद्धीचिया आवारीं| आराध्यु तो निश्चल ध्रुव करी| मग सर्व भावेंसी परिवारीं| आपण होय ||३८६|| कां चैतन्यांचिये पोवळी- | माजीं आनंदाचिया राउळीं| श्रीगुरुलिंगा ढाळी| ध्यानामृत ||३८७|| उदयिजतां बोधार्का| बुद्धीची डाळ सात्त्विका| भरोनियां त्र्यंबका| लाखोली वाहे ||३८८|| काळशुद्धी त्रिकाळीं| जीवदशा धूप जाळीं| न्यानदीपें वोंवाळी| निरंतर ||३८९|| सामरस्याची रससोय| अखंड अर्पितु जाय| आपण भराडा होय| गुरु तो लिंग ||३९०|| नातरी जीवाचिये सेजे| गुरु कांतु करूनि भुंजे| ऐसीं प्रेमाचेनि भोजें| बुद्धी वाहे ||३९१|| कोणेएके अवसरीं| अनुरागु भरे अंतरीं| कीं तया नाम करी| क्षीराब्धी ||३९२|| तेथ ध्येयध्यान बहु सुख| तेंचि शेषतुका निर्दोख| वरी जलशयन देख| भावी गुरु ||३९३|| मग वोळगती पाय| ते लक्ष्मी आपण होय| गरुड होऊनि उभा राहे| आपणचि ||३९४|| नाभीं आपणचि जन्मे| ऐसें गुरुमूर्तिप्रेमें| अनुभवी मनोधर्में| ध्यानसुख ||३९५|| एकाधिये वेळें| गुरु माय करी भावबळें| मग स्तन्यसुखें लोळे| अंकावरी ||३९६|| नातरी गा किरीटी| चैतन्यतरुतळवटीं| गुरु धेनु आपण पाठीं| वत्स होय ||३९७|| गुरुकृपास्नेहसलिलीं| आपण होय मासोळी| कोणे एके वेळीं| हेंचि भावीं ||३९८|| गुरुकृपामृताचे वडप| आपण सेवावृत्तीचें होय रोप| ऐसेसे संकल्प| विये मन ||३९९|| चक्षुपक्षेवीण| पिलूं होय आपण| कैसें पैं अपारपण| आवडीचें ||४००|| गुरूतें पक्षिणी करी| चारा घे चांचूवरी| गुरु तारू धरी| आपण कांस ||४०१|| ऐसें प्रेमाचेनि थावें| ध्यानचि ध्यानातें प्रसवे| पूर्णसिंधु हेलावे| फुटती जैसे ||४०२|| किंबहुना यापरी| श्रीगुरुमूर्ती अंतरीं| भोगी आतां अवधारीं| बाह्यसेवा ||४०३|| तरी जिवीं ऐसे आवांके| म्हणे दास्य करीन निकें| जैसें गुरु कौतुकें| माग म्हणती ||४०४|| तैसिया साचा उपास्ती| गोसावी प्रसन्न होती| तेथ मी विनंती| ऐसी करीन ||४०५|| म्हणेन तुमचा देवा| परिवारु जो आघवा| तेतुलें रूपें होआवा| मीचि एकु ||४०६|| आणि उपकरतीं आपुलीं| उपकरणें आथि जेतुलीं| माझीं रूपें तेतुलीं| होआवीं स्वामी ||४०७|| ऐसा मागेन वरु| तेथ हो म्हणती श्रीगुरु| मग तो परिवारु| मीचि होईन ||४०८|| उपकरणजात सकळिक| तें मीचि होईन एकैक| तेव्हां उपास्तीचें कवतिक| देखिजैल ||४०९|| गुरु बहुतांची माये| परी एकलौती होऊनि ठाये| तैसें करूनि आण वायें| कृपे तिये ||४१०|| तया अनुरागा वेधु लावीं| एकपत्नीव्रत घेववीं| क्षेत्रसंन्यासु करवीं| लोभाकरवीं ||४११|| चतुर्दिक्षु वारा| न लाहे निघों बाहिरा| तैसा गुरुकृपें पांजिरा| मीचि होईन ||४१२|| आपुलिया गुणांचीं लेणीं| करीन गुरुसेवे स्वामिणी| हें असो होईन गंवसणी| मीचि भक्तीसी ||४१३|| गुरुस्नेहाचिये वृष्टी| मी पृथ्वी होईन तळवटीं| ऐसिया मनोरथांचिया सृष्टी| अनंता रची ||४१४|| म्हणे श्रीगुरूंचें भुवन| आपण मी होईन| आणि दास होऊनि करीन| दास्य तेथिंचें ||४१५|| निर्गमागमीं दातारें| जे वोलांडिजती उंबरे| ते मी होईन आणि द्वारें| द्वारपाळु ||४१६|| पाउवा मी होईन| तियां मीचि लेववीन| छत्र मी आणि करीन| बारीपण ||४१७|| मी तळ उपरु जाणविता| चंवरु धरु हातु देता| स्वामीपुढें खोलता| होईन मी ||४१८|| मीचि होईन सागळा| करूं सुईन गुरुळां| सांडिती तो नेपाळा| पडिघा मीचि ||४१९|| हडप मी वोळगेन| मीचि उगाळु घेईन| उळिग मी करीन| आंघोळीचें ||४२०|| होईन गुरूंचें आसन| अलंकार परिधान| चंदनादि होईन| उपचार ते ||४२१|| मीचि होईन सुआरु| वोगरीन उपहारु| आपणपें श्रीगुरु| वोंवाळीन ||४२२|| जे वेळीं देवो आरोगिती| तेव्हां पांतीकरु मीचि पांतीं| मीचि होईन पुढती| देईन विडा ||४२३|| ताट मी काढीन| सेज मी झाडीन| चरणसंवाहन| मीचि करीन ||४२४|| सिंहासन होईन आपण| वरी श्रीगुरु करिती आरोहण| होईन पुरेपण| वोळगेचें ||४२५|| श्रीगुरूंचें मन| जया देईल अवधान| तें मी पुढां होईन| चमत्कारु ||४२६|| तया श्रवणाचे आंगणीं| होईन शब्दांचिया आक्षौहिणी| स्पर्श होईन घसणी| आंगाचिया ||४२७|| श्रीगुरूंचे डोळे| अवलोकनें स्नेहाळें| पाहाती तियें सकळें| होईन रूपें ||४२८|| तिये रसने जो जो रुचेल| तो तो रसु म्यां होईजैल| गंधरूपें कीजेल| घ्राणसेवा ||४२९|| एवं बाह्यमनोगत| श्रीगुरुसेवा समस्त| वेंटाळीन वस्तुजात| होऊनियां ||४३०|| जंव देह हें असेल| तंव वोळगी ऐसी कीजेल| मग देहांतीं नवल| बुद्धि आहे ||४३१|| इये शरीरींची माती| मेळवीन तिये क्षिती| जेथ श्रीचरण उभे ठाती| श्रीगुरूंचे ||४३२|| माझा स्वामी कवतिकें| स्पर्शीजति जियें उदकें| तेथ लया नेईन निकें| आपीं आप ||४३३|| श्रीगुरु वोंवाळिजती| कां भुवनीं जे उजळिजती| तयां दीपांचिया दीप्तीं| ठेवीन तेज ||४३४|| चवरी हन विंजणा| तेथ लयो करीन प्राणा| मग आंगाचा वोळंगणा| होईन मी ||४३५|| जिये जिये अवकाशीं| श्रीगुरु असती परिवारेंसीं| आकाश लया आकाशीं| नेईन तिये ||४३६|| परी जीतु मेला न संडीं| निमेषु लोकां न धाडीं| ऐसेनि गणावया कोडी| कल्पांचिया ||४३७|| येतुलेंवरी धिंवसा| जयाचिया मानसा| आणि करूनियांहि तैसा| अपारु जो ||४३८|| रात्र दिवस नेणे| थोडें बहु न म्हणें| म्हणियाचेनि दाटपणें| साजा होय ||४३९|| तो व्यापारु येणें नांवें| गगनाहूनि थोरावे| एकला करी आघवें| एकेचि काळीं ||४४०|| हृदयवृत्ती पुढां| आंगचि घे दवडा| काज करी होडा| मानसेंशीं ||४४१|| एकादियां वेळा| श्रीगुरुचिया खेळा| लोण करी सकळा| जीविताचें ||४४२|| जो गुरुदास्यें कृशु| जो गुरुप्रेमें सपोषु| गुरुआज्ञे निवासु| आपणचि जो ||४४३|| जो गुरु कुळें सुकुलीनु| जो गुरुबंधुसौजन्यें सुजनु| जो गुरुसेवाव्यसनें सव्यसनु| निरंतर ||४४४|| गुरुसंप्रदायधर्म| तेचि जयाचे वर्णाश्रम| गुरुपरिचर्या नित्यकर्म| जयाचें गा ||४४५|| गुरु क्षेत्र गुरु देवता| गुरु माय गुरु पिता| जो गुरुसेवेपरौता| मार्ग नेणें ||४४६|| श्रीगुरूचे द्वार| तें जयाचें सर्वस्व सार| गुरुसेवकां सहोदर| प्रेमें भजे ||४४७|| जयाचें वक्त्र| वाहे गुरुनामाचे मंत्र| गुरुवाक्यावांचूनि शास्त्र| हातीं न शिवे ||४४८|| शिवतलें गुरुचरणीं| भलतैसें हो पाणी| तया सकळ तीर्थें आणी| त्रैलोक्यींचीं ||४४९|| श्रीगुरूचें उशिटें| लाहे जैं अवचटें| तैं तेणें लाभें विटे| समाधीसी ||४५०|| कैवल्यसुखासाठीं| परमाणु घे किरीटी| उधळती पायांपाठीं| चालतां जे ||४५१|| हें असो सांगावें किती| नाहीं पारु गुरुभक्ती| परी गा उत्क्रांतमती| कारण हें ||४५२|| जया इये भक्तीची चाड| जया इये विषयींचें कोड| जो हे सेवेवांचून गोड| न मनी कांहीं ||४५३|| तो तत्त्वज्ञाचा ठावो| ज्ञाना तेणेंचि आवो| हें असो तो देवो| ज्ञान भक्तु ||४५४|| हें जाण पां साचोकारें| तेथ ज्ञान उघडेनि द्वारें| नांदत असे जगा पुरे| इया रीती ||४५५|| जिये गुरुसेवेविखीं| माझा जीव अभिलाखी| म्हणौनि सोयचुकी| बोली केली ||४५६|| एऱ्हवीं असतां हातीं खुळा| भजनावधानीं आंधळा| परिचर्येलागीं पांगुळा- | पासूनि मंदु ||४५७|| गुरुवर्णनीं मुका| आळशी पोशिजे फुका| परी मनीं आथि निका| सानुरागु ||४५८|| तेणेंचि पैं कारणें| हें स्थूळ पोसणें| पडलें मज म्हणे| ज्ञानदेवो ||४५९|| परि तो बोलु उपसाहावा| आणि वोळगे अवसरु देयावा| आतां म्हणेन जी बरवा| ग्रंथार्थुचि ||४६०|| परिसा परिसा श्रीकृष्णु| जो भूतभारसहिष्णु| तो बोलतसे विष्णु| पार्थु ऐके ||४६१|| म्हणे शुचित्व गा ऐसें| जयापाशीं दिसे| आंग मन जैसें| कापुराचें ||४६२|| कां रत्नाचें दळवाडें| तैसें सबाह्य चोखडें| आंत बाहेरि एकें पाडें| सूर्यु जैसा ||४६३|| बाहेरीं कर्में क्षाळला| भितरीं ज्ञानें उजळला| इहीं दोहीं परीं आला| पाखाळा एका ||४६४|| मृत्तिका आणि जळें| बाह्य येणें मेळें| निर्मळु होय बोलें| वेदाचेनी ||४६५|| भलतेथ बुद्धीबळी| रजआरिसा उजळी| सौंदणी फेडी थिगळी| वस्त्रांचिया ||४६६|| किंबहुना इयापरी| बाह्य चोख अवधारीं| आणि ज्ञानदीपु अंतरीं| म्हणौनि शुद्ध ||४६७|| एऱ्हवीं तरी पंडुसुता| आंत शुद्ध नसतां| बाहेरि कर्म तो तत्त्वतां| विटंबु गा ||४६८|| मृत जैसा शृंगारिला| गाढव तीर्थीं न्हाणिला| कडुदुधिया माखिला| गुळें जैसा ||४६९|| वोस गृहीं तोरण बांधिलें| कां उपवासी अन्नें लिंपिलें| कुंकुमसेंदुर केलें| कांतहीनेनें ||४७०|| कळस ढिमाचे पोकळ| जळो वरील तें झळाळ| काय करूं चित्रींव फळ| आंतु शेण ||४७१|| तैसें कर्मवरिचिलेंकडां| न सरे थोर मोलें कुडा| नव्हे मदिरेचा घडा| पवित्र गंगे ||४७२|| म्हणौनि अंतरीं ज्ञान व्हावें| मग बाह्य लाभेल स्वभावें| वरी ज्ञान कर्में संभवे| ऐसें कें जोडे ? ||४७३|| यालागी बाह्य विभागु| कर्में धुतला चांगु| आणि ज्ञानें फिटला वंगु| अंतरींचा ||४७४|| तेथ अंतर बाह्य गेले| निर्मळत्व एक जाहलें| किंबहुना उरलें| शुचित्वचि ||४७५|| म्हणौनि सद्भाव जीवगत| बाहेरी दिसती फांकत| जे स्फटिकगृहींचे डोलत| दीप जैसे ||४७६|| विकल्प जेणें उपजे| नाथिली विकृति निपजे| अप्रवृत्तीचीं बीजें| अंकुर घेती ||४७७|| तें आइके देखे अथवा भेटे| परी मनीं कांहींचि नुमटे| मेघरंगें न कांटे| व्योम जैसें ||४७८|| एऱ्हवीं इंद्रियांचेनि मेळें| विषयांवरी तरी लोळे| परी विकाराचेनि विटाळें| लिंपिजेना ||४७९|| भेटलिया वाटेवरी| चोखी आणि माहारी| तेथ नातळें तियापरी| राहाटों जाणें ||४८०|| कां पतिपुत्रांतें आलिंगी| एकचि ते तरुणांगी| तेथ पुत्रभावाच्या आंगीं| न रिगे कामु ||४८१|| तैसें हृदय चोख| संकल्पविकल्पीं सनोळख| कृत्याकृत्य विशेख| फुडें जाणें ||४८२|| पाणियें हिरा न भिजे| आधणीं हरळु न शिजे| तैसी विकल्पजातें न लिंपिजे| मनोवृत्ती ||४८३|| तया नांव शुचिपण| पार्था गा संपूर्ण| हें देखसी तेथ जाण| ज्ञान असे ||४८४|| आणि स्थिरता साचें| घर रिगाली जयाचें| तो पुरुष ज्ञानाचें| आयुष्य गा ||४८५|| देह तरी वरिचिलीकडे| आपुलिया परी हिंडे| परी बैसका न मोडे| मानसींची ||४८६|| वत्सावरूनि धेनूचें| स्नेह राना न वचे| नव्हती भोग सतियेचे| प्रेमभोग ||४८७|| कां लोभिया दूर जाये| परी जीव ठेविलाचि ठाये| तैसा देहो चाळितां नव्हे| चळु चित्ता ||४८८|| जातया अभ्रासवें| जैसें आकाश न धांवे| भ्रमणचक्रीं न भंवे| ध्रुव जैसा ||४८९|| पांथिकाचिया येरझारा| सवें पंथु न वचे धनुर्धरा| कां नाहीं जेवीं तरुवरा| येणें जाणें ||४९०|| तैसा चळणवळणात्मकीं| असोनि ये पांचभौतिकीं| भूतोर्मी एकी| चळिजेना ||४९१|| वाहुटळीचेनि बळें| पृथ्वी जैसी न ढळे| तैसा उपद्रव उमाळें| न लोटे जो ||४९२|| दैन्यदुःखीं न तपे| भवशोकीं न कंपे| देहमृत्यु न वासिपे| पातलेनी ||४९३|| आर्ति आशा पडिभरें| वय व्याधी गजरें| उजू असतां पाठिमोरें| नव्हे चित्त ||४९४|| निंदा निस्तेज दंडी| कामलोभा वरपडी| परी रोमा नव्हे वांकुडी| मानसाची ||४९५|| आकाश हें वोसरो| पृथ्वी वरि विरो| परि नेणे मोहरों| चित्तवृत्ती ||४९६|| हाती हाला फुलीं| पासवणा जेवीं न घाली| तैसा न लोटे दुर्वाक्यशेलीं| शेलिला सांता ||४९७|| क्षीरार्णवाचिया कल्लोळीं| कंपु नाहीं मंदराचळीं| कां आकाश न जळे जाळीं| वणवियाच्या ||४९८|| तैशा आल्या गेल्या ऊर्मी| नव्हे गजबज मनोधर्मीं| किंबहुना धैर्य क्षमी| कल्पांतींही ||४९९|| परी स्थैर्य ऐसी भाष| बोलिजे जे सविशेष| ते हे दशा गा देख| देखणया ||५००|| हें स्थैर्य निधडें| जेथ आंगें जीवें जोडे| तें ज्ञानाचें उघडें| निधान साचें ||५०१|| आणि इसाळु जैसा घरा| कां दंदिया हतियेरा| न विसंबे भांडारा| बद्धकु जैसा ||५०२|| कां एकलौतिया बाळका- | वरि पडौनि ठाके अंबिका| मधुविषीं मधुमक्षिका| लोभिणी जैसी ||५०३|| अर्जुना जो यापरी| अंतःकरण जतन करी| नेदी उभें ठाकों द्वारीं| इंद्रियांच्या ||५०४|| म्हणे काम बागुल ऐकेल| हे आशा सियारी देखैल| तरि जीवा टेंकैल| म्हणौनि बिहे ||५०५|| बाहेरी धीट जैसी| दाटुगा पति कळासी| करी टेहणी तैसी| प्रवृत्तीसीं ||५०६|| सचेतनीं वाणेपणें| देहासकट आटणें| संयमावरीं करणें| बुझूनि घाली ||५०७|| मनाच्या महाद्वारीं| प्रत्याहाराचिया ठाणांतरीं| जो यम दम शरीरीं| जागवी उभे ||५०८|| आधारीं नाभीं कंठीं| बंधत्रयाचीं घरटीं| चंद्रसूर्य संपुटीं| सुये चित्त ||५०९|| समाधीचे शेजेपासीं| बांधोनि घाली ध्यानासी| चित्त चैतन्य समरसीं| आंतु रते ||५१०|| अगा अंतःकरणनिग्रहो जो| तो हा हें जाणिजो| हा आथी तेथ विजयो| ज्ञानाचा पैं ||५११|| जयाची आज्ञा आपण| शिरीं वाहे अंतःकरण| मनुष्याकारें जाण| ज्ञानचि तो ||५१२|| इंद्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च | जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ||८|| आणि विषयांविखीं| वैराग्याची निकी| पुरवणी मानसीं कीं| जिती आथी ||५१३|| वमिलेया अन्ना| लाळ न घोंटी जेवीं रसना| कांआंग न सूये आलिंगना| प्रेताचिया ||५१४|| विष खाणें नागवे| जळत घरीं न रिगवे| व्याघ्रविवरां न वचवे| वस्ती जेवीं ||५१५|| धडाडीत लोहरसीं| उडी न घालवे जैसी| न करवे उशी| अजगराची ||५१६|| अर्जुना तेणें पाडें| जयासी विषयवार्ता नावडे| नेदी इंद्रियांचेनि तोंडें| कांहींच जावों ||५१७|| जयाचे मनीं आलस्य| देही अतिकार्श्य| शमदमीं सौरस्य| जयासि गा ||५१८|| तपोव्रतांचा मेळावा| जयाच्या ठायीं पांडवा| युगांत जया गांवा- | आंतु येतां ||५१९|| बहु योगाभ्यासीं हांव| विजनाकडे धांव| न साहे जो नांव| संघाताचें ||५२०|| नाराचांचीं आंथुरणें| पूयपंकीं लोळणें| तैसें लेखी भोगणें| ऐहिकींचें ||५२१|| आणि स्वर्गातें मानसें| ऐकोनि मानी ऐसें| कुहिलें पिशित जैसें| श्वानाचें कां ||५२२|| तें हें विषयवैराग्य| जें आत्मलाभाचें सभाग्य| येणें ब्रह्मानंदा योग्य| जीव होती ||५२३|| ऐसा उभयभोगीं त्रासु| देखसी जेथ बहुवसु| तेथ जाण रहिवासु| ज्ञानाचा तूं ||५२४|| आणि सचाडाचिये परी| इष्टापूर्तें करी| परी केलेंपण शरीरीं| वसों नेदी ||५२५|| वर्णाश्रमपोषकें| कर्में नित्यनैमित्तिकें| तयामाजीं कांहीं न ठके| आचरतां ||५२६|| परि हें मियां केलें| कीं हें माझेनि सिद्धी गेलें| ऐसें नाहीं ठेविलें| वासनेमाजीं ||५२७|| जैसें अवचितपणें| वायूसि सर्वत्र विचरणें| कां निरभिमान उदैजणें| सूर्याचें जैसें ||५२८|| कां श्रुति स्वभावता बोले| गंगा काजेंविण चाले| तैसें अवष्टंभहीन भलें| वर्तणें जयाचें ||५२९|| ऋतुकाळीं तरी फळती| परी फळलों हें नेणती| तयां वृक्षांचिये ऐसी वृत्ती| कर्मीं सदा ||५३०|| एवं मनीं कर्मीं बोलीं| जेथ अहंकारा उखी जाहली| एकावळीची काढिली| दोरी जैसी ||५३१|| संबंधेंवीण जैसीं| अभ्रें असती आकाशीं| देहीं कर्में तैसीं| जयासि गा ||५३२|| मद्यपाआंगींचें वस्त्र| लेपाहातींचें शस्त्र| बैलावरी शास्त्र| बांधलें आहे ||५३३|| तया पाडें देहीं| जया मी आहे हे सेचि नाहीं| निरहंकारता पाहीं| तया नांव ||५३४|| हें संपूर्ण जेथें दिसे| तेथेंचि ज्ञान असे| इयेविषीं अनारिसें| बोलों नये ||५३५|| आणि जन्ममृत्युजरादुःखें| व्याधिवार्धक्यकलुषें| तियें आंगा न येतां देखे| दुरूनि जो ||५३६|| साधकु विवसिया| कां उपसर्गु योगिया| पावे उणेयापुरेया| वोथंबा जेवीं ||५३७|| वैर जन्मांतरींचें| सर्पा मनौनि न वचे| तेवीं अतीता जन्माचें| उणें जो वाहे ||५३८|| डोळां हरळ न विरे| घाईं कोत न जिरे| तैसें काळींचें न विसरे| जन्मदुःख ||५३९|| म्हणे पूयगर्ते रिगाला| अहा मूत्ररंध्रें निघाला| कटा रे मियां चाटिला| कुचस्वेदु ||५४०|| ऐसाइसिया परी| जन्माचा कांटाळा धरी| म्हणे आतां तें मी न करीं| जेणें ऐसें होय ||५४१|| हारी उमचावया| जुंवारी जैसा ये डाया| कीं वैरा बापाचेया| पुत्र जचे ||५४२|| मारिलियाचेनि रागें| पाठीचा जेवीं सूड मागें| तेणें आक्षेपें लागे| जन्मापाठीं ||५४३|| परी जन्मती ते लाज| न सांडी जयाचें निज| संभाविता निस्तेज| न जिरे जेवीं ||५४४|| आणि मृत्यु पुढां आहे| तोचि कल्पांतीं कां पाहे| परी आजीचि होये| सावधु जो ||५४५|| माजीं अथांव म्हणता| थडियेचि पंडुसुता| पोहणारा आइता| कासे जेवीं ||५४६|| कां न पवतां रणाचा ठावो| सांभाळिजे जैसा आवो| वोडण सुइजे घावो| न लागतांचि ||५४७|| पाहेचा पेणा वाटवधा| तंव आजीचि होईजे सावधा| जीवु न वचतां औषधा| धांविजे जेवीं ||५४८|| येऱ्हवीं ऐसें घडे| जो जळतां घरीं सांपडे| तो मग न पवाडे| कुहा खणों ||५४९|| चोंढिये पाथरु गेला| तैसेनि जो बुडाला| तो बोंबेहिसकट निमाला| कोण सांगे ||५५०|| म्हणौनि समर्थेंसीं वैर| जया पडिलें हाडखाइर| तो जैसा आठही पाहर| परजून असे ||५५१|| नातरी केळवली नोवरी| का संन्यासी जियापरी| तैसा न मरतां जो करी| मृत्युसूचना ||५५२|| पैं गा जो ययापरी| जन्मेंचि जन्म निवारी| मरणें मृत्यु मारी| आपण उरे ||५५३|| तया घरीं ज्ञानाचें| सांकडें नाहीं साचें| जया जन्ममृत्युचें| निमालें शल्य ||५५४|| आणि तयाचिपरी जरा| न टेंकतां शरीरा| तारुण्याचिया भरा- | माजीं देखे ||५५५|| म्हणे आजिच्या अवसरीं| पुष्टि जे शरीरीं| ते पाहे होईल काचरी| वाळली जैसी ||५५६|| निदैव्याचे व्यवसाय| तैसे ठाकती हातपाय| अमंत्र्या राजाची परी आहे| बळा यया ||५५७|| फुलांचिया भोगा- | लागीं प्रेम टांगा| तें करेयाचा गुडघा| तैसें होईल ||५५८|| वोढाळाच्या खुरीं| आखरुआतें बुरी| ते दशा माझ्या शिरीं| पावेल गा ||५५९|| पद्मदळेंसी इसाळे| भांडताति हे डोळे| ते होती पडवळें| पिकलीं जैसीं ||५६०|| भंवईचीं पडळें| वोमथती सिनसाळे| उरु कुहिजैल जळें| आंसुवाचेनि ||५६१|| जैसें बाभुळीचें खोड| गिरबडूनि जाती सरड| तैसें पिचडीं तोंड| सरकटिजैल ||५६२|| रांधवणी चुलीपुढें| पऱ्हे उन्मादती खातवडे| तैसींचि यें नाकाडें| बिडबिडती ||५६३|| तांबुलें वोंठ रॐ| हांसतां दांत दॐ| सनागर मिरऊं| बोल जेणें ||५६४|| तयाचि पाहे या तोंडा| येईल जळंबटाचा लोंढा| इया उमळती दाढा| दातांसहित ||५६५|| कुळवाडी रिणें दाटली| कां वांकडिया ढोरें बैसलीं| तैसी नुठी कांहीं केली| जीभचि हे ||५६६|| कुसळें कोरडीं| वारेनि जाती बरडीं| तैसा आपदा तोंडीं| दाढियेसी ||५६७|| आषाढींचेनि जळें| जैसीं झिरपती शैलाचीं मौळें| तैसें खांडीहूनि लाळे| पडती पूर ||५६८|| वाचेसि अपवाडु| कानीं अनुघडु| पिंड गरुवा माकडु| होईल हा ||५६९|| तृणाचें बुझवणें| आंदोळे वारेनगुणें| तैसें येईल कांपणें| सर्वांगासी ||५७०|| पायां पडती वेंगडी| हात वळती मुरकुंडी| बरवपणा बागडी| नाचविजैल ||५७१|| मळमूत्रद्वारें| होऊनि ठाती खोंकरें| नवसियें होती इतरें| माझियां निधनीं ||५७२|| देखोनि थुंकील जगु| मरणाचा पडैल पांगु| सोइरियां उबगु| येईल माझा ||५७३|| स्त्रियां म्हणती विवसी| बाळें जाती मूर्छी| किंबहुना चिळसी| पात्र होईन ||५७४|| उभळीचा उजगरा| सेजारियां साइलिया घरा| शिणवील म्हणती म्हातारा| बहुतांतें हा ||५७५|| ऐसी वार्धक्याची सूचणी| आपणिया तरुणपणीं| देखे मग मनीं| विटे जो गा ||५७६|| म्हणे पाहे हें येईल| आणि आतांचें भोगितां जाईल| मग काय उरेल| हितालागीं ? ||५७७|| म्हणौनि नाइकणें पावे| तंव आईकोनि घाली आघवें| पंगु न होता जावें| तेथ जाय ||५७८|| दृष्टी जंव आहे| तंव पाहावें तेतुलें पाहे| मूकत्वा आधीं वाचा वाहे| सुभाषितें ||५७९|| हात होती खुळे| हें पुढील मोटकें कळे| आणि करूनि घाली सकळें| दानादिकें ||५८०|| ऐसी दशा येईल पुढें| तैं मन होईल वेडें| तंव चिंतूनि ठेवी चोखडें| आत्मज्ञान ||५८१|| जैं चोर पाहे झोंबती| तंव आजीचि रुसिजे संपत्ती| का झांकाझांकी वाती| न वचतां कीजे ||५८२|| तैसें वार्धक्य यावें| मग जें वायां जावें| तें आतांचि आघवें| सवतें करीं ||५८३|| आतां मोडूनि ठेलीं दुर्गें| कां वळित धरिलें खगें| तेथ उपेक्षूनि जो निघे| तो नागवला कीं ? ||५८४|| तैसें वृद्धाप्य होये| आलेपण तें वायां जाये| जे तो शतवृद्ध आहे| नेणों कैंचा ||५८५|| झाडिलींचि कोळें झाडी| तया न फळे जेवीं बोंडीं| जाहला अग्नि तरी राखोंडी| जाळील काई ? ||५८६|| म्हणौनि वार्धक्याचेनि आठवें| वार्धक्या जो नागवे| तयाच्या ठायीं जाणावें| ज्ञान आहे ||५८७|| तैसेंचि नाना रोग| पडिघाती ना जंव पुढां आंग| तंव आरोग्याचे उपेग| करूनि घाली ||५८८|| सापाच्या तोंडी| पडली जे उंडी| ते लाऊनि सांडी| प्रबुद्धु जैसा ||५८९|| तैसा वियोगें जेणें दुःखे| विपत्ति शोक पोखे| तें स्नेह सांडूनि सुखें| उदासु होय ||५९०|| आणि जेणें जेणें कडे| दोष सूतील तोंडें| तयां कर्मरंध्री गुंडे| नियमाचे दाटी ||५९१|| ऐसाइसिया आइती| जयाची परी असती| तोचि ज्ञानसंपत्ती- | गोसावी गा ||५९२|| आतां आणीकही एक| लक्षण अलौकिक| सांगेन आइक| धनंजया ||५९३|| असक्तिरनभिष्वंगः पुत्रदारगृहादिषु | नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ||९|| तरि जो या देहावरी| उदासु ऐसिया परी| उखिता जैसा बिढारीं| बैसला आहे ||५९४|| कां झाडाची साउली| वाटे जातां मीनली| घरावरी तेतुली| आस्था नाहीं ||५९५|| साउली सरिसीच असे| परी असे हें नेणिजे जैसें| स्त्रियेचें तैसें| लोलुप्य नाहीं ||५९६|| आणि प्रजा जे जाली| तियें वस्ती कीर आलीं| कां गोरुवें बैसलीं| रुखातळीं ||५९७|| जो संपत्तीमाजी असतां| ऐसा गमे पंडुसुता| जैसा कां वाटे जातां| साक्षी ठेविला ||५९८|| किंबहुना पुंसा| पांजरियामाजीं जैसा| वेदाज्ञेसी तैसा| बिहूनि असे ||५९९|| एऱ्हवीं दारागृहपुत्रीं| नाहीं जया मैत्री| तो जाण पां धात्री| ज्ञानासि गा ||६००|| महासिंधू जैसे| ग्रीष्मवर्षीं सरिसे| इष्टानिष्ट तैसें| जयाच्या ठायीं ||६०१|| कां तिन्ही काळ होतां| त्रिधा नव्हे सविता| तैसा सुखदुःखीं चित्ता| भेदु नाहीं ||६०२|| जेथ नभाचेनि पाडें| समत्वा उणें न पडे| तेथ ज्ञान रोकडें| वोळख तूं ||६०३|| मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी | विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ||१०|| आणि मीवांचूनि कांहीं| आणिक गोमटें नाहीं| ऐसा निश्चयोचि तिहीं| जयाचा केला ||६०४|| शरीर वाचा मानस| पियालीं कृतनिश्चयाचा कोश| एक मीवांचूनि वास| न पाहती आन ||६०५|| किंबहुना निकट निज| जयाचें जाहलें मज| तेणें आपणयां आम्हां सेज| एकी केली ||६०६|| रिगतां वल्लभापुढें| नाहीं आंगीं जीवीं सांकडें| तिये कांतेचेनि पाडें| एकसरला जो ||६०७|| मिळोनि मिळतचि असे| समुद्रीं गंगाजळ जैसें| मी होऊनि मज तैसें| सर्वस्वें भजती ||६०८|| सूर्याच्या होण्यां होईजे| कां सूर्यासवेंचि जाइजे| हें विकलेपण साजे| प्रभेसि जेवीं ||६०९|| पैं पाणियाचिये भूमिके| पाणी तळपे कौतुकें| ते लहरी म्हणती लौकिकें| एऱ्हवीं तें पाणी ||६१०|| जो अनन्यु यापरी| मी जाहलाहि मातें वरी| तोचि तो मूर्तधारी| ज्ञान पैं गा ||६११|| आणि तीर्थें धौतें तटें| तपोवनें चोखटें| आवडती कपाटें| वसवूं जया ||६१२|| शैलकक्षांचीं कुहरें| जळाशय परिसरें| अधिष्ठी जो आदरें| नगरा न ये ||६१३|| बहु एकांतावरी प्रीति| जया जनपदाची खंती| जाण मनुष्याकारें मूर्ती| ज्ञानाची तो ||६१४|| आणिकहि पुढती| चिन्हें गा सुमती| ज्ञानाचिये निरुती- | लागीं सांगों ||६१५|| अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् | एतद्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा ||११|| तरी परमात्मा ऐसें| जें एक वस्तु असे| तें जया दिसें| ज्ञानास्तव ||६१६|| तें एकवांचूनि आनें| जियें भवस्वर्गादि ज्ञानें| तें अज्ञान ऐसा मनें| निश्चयो केला ||६१७|| स्वर्गा जाणें हें सांडी| भवविषयीं कान झाडी| दे अध्यात्मज्ञानीं बुडी| सद्भावाची ||६१८|| भंगलिये वाटे| शोधूनिया अव्हांटे| निघिजे जेवीं नीटें| राजपंथें ||६१९|| तैसें ज्ञानजातां करी| आघवेंचि एकीकडे सारी| मग मन बुद्धि मोहरी| अध्यात्मज्ञानीं ||६२०|| म्हणे एक हेंचि आथी| येर जाणणें ते भ्रांती| ऐसी निकुरेंसी मती| मेरु होय ||६२१|| एवं निश्चयो जयाचा| द्वारीं आध्यात्मज्ञानाचा| ध्रुव देवो गगनींचा| तैसा राहिला ||६२२|| तयाच्या ठायीं ज्ञान| या बोला नाहीं आन| जे ज्ञानीं बैसलें मन| तेव्हांचि तें तो मी ||६२३|| तरी बैसलेपणें जें होये| बैसतांचि बोलें न होये| तरी ज्ञाना तया आहे| सरिसा पाडु ||६२४|| आणि तत्त्वज्ञान निर्मळ| फळे जें एक फळ| तें ज्ञेयही वरी सरळ| दिठी जया ||६२५|| एऱ्हवीं बोधा आलेनि ज्ञानें| जरी ज्ञेय न दिसेचि मनें| तरी ज्ञानलाभुही न मने| जाहला सांता ||६२६|| आंधळेनि हातीं दिवा| घेऊनि काय करावा ? | तैसा ज्ञाननिश्चयो आघवा| वायांचि जाय ||६२७|| जरि ज्ञानाचेनि प्रकाशें| परतत्त्वीं दिठी न पैसे| ते स्फूर्तीचि असे| अंध होऊनी ||६२८|| म्हणौनि ज्ञान जेतुलें दावीं| तेतुली वस्तुचि आघवी| तें देखे ऐशी व्हावी| बुद्धि चोख ||६२९|| यालागीं ज्ञानें निर्दोखें| दाविलें ज्ञेय देखे| तैसेनि उन्मेखें| आथिला जो ||६३०|| जेवढी ज्ञानाची वृद्धी| तेवढीच जयाची बुद्धी| तो ज्ञान हे शब्दीं| करणें न लगे ||६३१|| पैं ज्ञानाचिये प्रभेसवें| जयाची मती ज्ञेयीं पावे| तो हातधरणिया शिवे| परतत्त्वातें ||६३२|| तोचि ज्ञान हें बोलतां| विस्मो कवण पंडुसुता ? | काय सवितयातें सविता| म्हणावें असें ? ||६३३|| तंव श्रोतें म्हणती असो| न सांगें तयाचा अतिसो| ग्रंथोक्ती तेथ आडसो| घालितोसी कां ? ||६३४|| तुझा हाचि आम्हां थोरु| वक्तृत्वाचा पाहुणेरु| जे ज्ञानविषो फारु| निरोपिला ||६३५|| रसु होआवा अतिमात्रु| हा घेतासि कविमंत्रु| तरी अवंतूनि शत्रु| करितोसि कां गा ? ||६३६|| ठायीं बैसतिये वेळे| जे रससोय घेऊनि पळे| तियेचा येरु वोडव मिळे| कोणा अर्था ? ||६३७|| आघवाचि विषयीं भादी| परी सांजवणीं टेंकों ने