.. ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १५ ..
|| ॐ श्री परमात्मने नमः ||
अध्याय पंधरावा |
पुरुषोत्तमयोगः |
आतां हृदय हें आपुलें| चौफाळुनियां भलें| वरी बैसऊं पाउलें| श्रीगुरूंचीं || १||
ऐक्यभावाची अंजुळी| सर्वेंद्रिय कुड्मुळी| भरूनियां पुष्पांजुळी| अर्घ्यु देवों || २||
अनन्योदकें धुवट| वासना जे तन्निष्ठ| ते लागलेसे अबोट| चंदनाचें || ३||
प्रेमाचेनि भांगारें| निर्वाळूनि नूपरें| लेवऊं सुकुमारें| पदें तियें || ४||
घणावली आवडी| अव्यभिचारें चोखडी| तिये घालूं जोडी| आंगोळिया || ५||
आनंदामोदबहळ| सात्त्विकाचें मुकुळ| तें उमललें अष्टदळ| ठेऊं वरी || ६||
तेथे अहं हा धूप जाळूं| नाहं तेजें वोवाळूं| सामरस्यें पोटाळूं| निरंतर || ७||
माझी तनु आणि प्राण| इया दोनी पाउवा लेऊं श्रीगुरुचरण| करूं भोगमोक्ष निंबलोण| पायां तयां || ८||
इया श्रीगुरुचरणसेवा| हों पात्र तया दैवा| जे सकळार्थमेळावा| पाटु बांधे || ९||
ब्रह्मींचें विसवणेंवरी| उन्मेख लाहे उजरी| जें वाचेतें इयें करी| सुधासिंधु || १०||
पूर्णचंद्राचिया कोडी| वक्तृत्वा घापें कुरोंडी| तैसी आणी गोडी| अक्षरांतें || ११||
सूर्यें अधिष्ठिली प्राची| जगा राणीव दे प्रकाशाची| तैशी वाचा श्रोतयां ज्ञानाची| दिवाळी करी || १२||
नादब्रह्म खुजें| कैवल्यही तैसें न सजे| ऐसा बोलु देखिजे| जेणें दैवें || १३||
श्रवणसुखाच्या मांडवीं| विश्व भोगी माधवीं| तैसी सासिन्नली बरवी| वाचावल्ली || १४||
ठावो न पवता जयाचा| मनेंसी मुरडली वाचा| तो देवो होय शब्दाचा| चमत्कारु || १५||
जें ज्ञानासि न चोजवे| ध्यानासिही जें नागवे| तें अगोचर फावे| गोठीमाजीं || १६||
येवढें एक सौभग| वळघे वाचेचें आंग| श्रीगुरुपादपद्मपराग| लाहे जैं कां || १७||
तरी बहु बोलूं काई| आजि तें आनीं ठाईं| मातेंवाचूनि नाहीं| ज्ञानदेवो म्हणे || १८||
जे तान्हेनि मियां अपत्यें| आणि माझे गुरु एकलौतें| म्हणौनि कृपेंसि एकहातें| जालें तिये || १९||
पाहा पां भरोवरी आघवी| मेघ चातकांसी रिचवी| मजलागीं गोसावी| तैसें केलें || २०||
म्हणौनि रिकामें तोंड| करूं गेलें बडबड| कीं गीता ऐसें गोड| आतुडलें || २१||
होय अदृष्ट आपैतें| तैं वाळूचि रत्नें परते| उजू आयुष्य तैं मारितें| लोभु करी || २२||
आधणीं घातलिया हरळ| होती अमृताचे तांदुळ| जरी भुकेची राखे वेळ| श्रीजगन्नाथु || २३||
तयापरी श्रीगुरु| करिती जैं अंगीकारु| तैं होऊनि ठाके संसारु| मोक्षमय आघवा || २४||
पाहा पां श्रीनारायणें| तया पांडवांचें उणें| कीजेचि ना पुराणें| विश्ववंद्यें ? || २५||
तैसें श्रीनिवृत्तिराजें| अज्ञानपण हें माझें| आणिलें वोजें| ज्ञानाचिया || २६||
परी हें असो आतां| प्रेम रुळतसे बोलतां| कें गुरुगौरव वर्णितां| उन्मेष असे ? || २७||
आतां तेणेंचि पसायें| तुम्हां संताचे मी पायें| वोळगेन अभिप्रायें| गीतेचेनि || २८||
तरी तोचि प्रस्तुतीं| चौदाविया अध्यायाच्या अंतीं| निर्णयो कैवल्यपती| ऐसा केला || २९||
जें ज्ञान जयाच्या हातीं| तोचि समर्थु मुक्ति| जैसा शतमख संपत्ती| स्वर्गींचिये || ३०||
कां शत एक जन्मां| जो जन्मोनि ब्रह्मकर्मा| करी तोचि ब्रह्मा| आनु नोहे || ३१||
नाना सूर्याचा प्रकाशु| लाहे जेवीं डोळसु| तेवीं ज्ञानेंचि सौरसु| मोक्षाचा तो || ३२||
तरी तया ज्ञानालागीं| कवणा पां योग्यता आंगीं| हें पाहतां जगीं| देखिला एकु || ३३||
जें पाताळींचेंही निधान| दावील कीर अंजन| परी होआवे लोचन| पायाळाचे || ३४||
तैसें मोक्ष देईल ज्ञान| येथें कीर नाहीं आन| परी तेंचि थारे ऐसें मन| शुद्ध होआवें || ३५||
तरी विरक्तीवांचूनि कहीं| ज्ञानासि तगणेंचि नाहीं| हें विचारूनि ठाईं| ठेविलें देवें || ३६||
आतां विरक्तीची कवण परी| जे येऊनि मनातें वरी| हेंही सर्वज्ञें श्रीहरी| देखिलें असे || ३७||
जे विषें रांधिली रससोये| जैं जेवणारा ठाउवी होये| तैं तो ताटचि सांडूनि जाये| जयापरी || ३८||
तैसी संसारा या समस्ता| जाणिजे जैं अनित्यता| तैं वैराग्य दवडितां| पाठी लागे || ३९||
आतां अनित्यत्व या कैसें| तेंचि वृक्षाकारमिषें| सांगिजत असे विश्वेशें| पंचदशीं || ४०||
उपडिलें कवतिकें| झाड येरिमोहरा ठाके| तें वेगें जैसें सुके| तैसें हें नोहे || ४१||
यातें एकेपरी| रूपकाचिया कुसरी| सारीतसे वारी| संसाराची || ४२||
करूनि संसार वावो| स्वरूपीं अहंते ठावो| होआवया अध्यावो| पंधरावा हा || ४३||
आतां हेंचि आघवें| ग्रंथगर्भींचें चांगावें| उपलविजेल जीवें| आकर्णिजे || ४४||
तरी महानंद समुद्र| जो पूर्ण पूर्णीमा चंद्र| तो द्वारकेचा नरेंद्र| ऐसें म्हणे || ४५||
अगा पैं पंडुकुमरा| येतां स्वरूपाचिया घरा| करीतसे आडवारा| विश्वाभासु जो || ४६||
तो हा जगडंबरु| नोहे येथ संसारु| हा जाणिजे महातरु| थांवला असे || ४७||
परी येरां रुखांसारिखा| हा तळीं मूळें वरी शाखा| तैसा नोहे म्हणौनि लेखा| नयेचि कवणा || ४८||
आगी कां कुऱ्हाडी| होय रिगावा जरी बुडीं| तरी हो कां भलतेवढी| वरिचील वाढी || ४९||
जे तुटलिया मूळापाशीं| उलंडेल कां शाखांशीं| परी तैशी गोठी कायशी| हा सोपा नव्हे || ५०||
अर्जुना हें कवतिक| सांगतां असे अलौकिक| जे वाढी अधोमुख| रुखा यया || ५१||
जैसा भानू उंची नेणों कें| रश्मिजाळ तळीं फांके| संसार हें कावरुखें| झाड तैसें || ५२||
आणि आथी नाथी तितुकें| रुंधलें असे येणेंचि एकें| कल्पांतींचेनि उदकें| व्योम जैसें || ५३||
कां रवीच्या अस्तमानीं| आंधारेनि कोंदे रजनी| तैसा हाचि गगनीं| मांडला असे || ५४||
यया फळ ना चुंबितां| फूल ना तुरंबितां| जें कांहीं पंडुसुता| तें रुखुचि हा || ५५||
हा ऊर्ध्वमूळ आहे| परी उन्मूळिला नोहे| येणेंचि हा होये| शाड्वळु गा || ५६||
आणि ऊर्ध्वमूळ ऐसें| निगदिलें कीर असे| परी अधींही असोसें| मूळें यया || ५७||
प्रबळला चौमेरी| पिंपळा कां वडाचिया परी| जे पारंबियांमाझारीं| डहाळिया असती || ५८||
तेवींचि गा धनंजया| संसारतरु यया| अधींचि आथी खांदिया| हेंही नाहीं || ५९||
तरी ऊर्ध्वाहीकडे| शाखांचे मांदोडे| दिसताति अपाडें| सासिन्नलें || ६०||
जालें गगनचि पां वेलिये| कां वारा मांडला रुखाचेनि आयें| नाना अवस्थात्रयें| उदयला असे || ६१||
ऐसा हा एकु| विश्वाकार विटंकु| उदयला जाण रुखु| ऊर्ध्वमूळु || ६२||
आतां ऊर्ध्व या कवण| येथें मूळ तें किं लक्षण| कां अधोमुखपण| शाखा कैसिया || ६३||
अथवा द्रुमा यया| अधीं जिया मूळिया| तिया कोण कैसिया| ऊर्ध्व शाखा || ६४||
आणि अश्वत्थु हा ऐसी| प्रसिद्धी कायसी| आत्मविदविलासीं| निर्णयो केला || ६५||
हें आघवेंचि बरवें| तुझिये प्रतीतीसि फावे| तैसेनि सांगों सोलिंवें| विन्यासें गा || ६६||
परी ऐकें गा सुभगा| हा प्रसंगु असे तुजचि जोगा| कानचि करीं हो सर्वांगा| हियें आथिलिया || ६७||
ऐसें प्रेमरसें सुरफुरें| बोलिलें जंव यादववीरें| तंव अवधान अर्जुनाकारें| मूर्त जालें || ६८||
देव निरूपिती तें थेंकुलें| येवढें श्रोतेपण फांकलें| जैसे आकाशा खेंव पसरिलें| दाही दिशीं || ६९||
श्रीकृष्णोक्तिसागरा| हा अगस्तीचि दुसरा| म्हनौनि घोंटु भरों पाहे एकसरा| अवघेयाचा || ७०||
ऐसी सोय सांडूनि खवळिली| आवडी अर्जुनीं देवें देखिली| तेथ जालेनि सुखें केली| कुरवंडी तया || ७१||
श्रीभगवानुवाच |
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् |
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् || १||
मग म्हणे धनंजया| तें ऊर्ध्व गा तरू यया| येणें रुखेंचि कां जया| ऊर्ध्वता गमे || ७२||
एऱ्हवीं मध्योर्ध्व अध| हे नाहीं जेथ भेद| अद्वयासीं एकवद| जया ठायीं || ७३||
जो नाइकिजतां नादु| जो असौरभ्य मकरंदु| जो आंगाथिला आनंदु| सुरतेविण || ७४||
जया जें आऱ्हां परौतें| जया जें पुढें मागौतें| दिसतेविण दिसतें| अदृश्य जें || ७५||
उपाधीचा दुसरा| घालितां वोपसरा| नामरूपाचा संसारा| होय जयातें || ७६||
ज्ञातृज्ञेयाविहीन| नुसधेंचि जें ज्ञान| सुखा भरलें गगन| गाळींव जें || ७७||
जें कार्य ना कारण| जया दुजें ना एकपण| आपणयां जें जाण| आपणचि || ७८||
ऐसें वस्तु जें साचें| तें ऊर्ध्व गा यया तरूचें| तेथ आर घेणें मूळाचें| तें ऐसें असे || ७९||
तरी माया ऐसी ख्याती| नसतीच यया आथी| कां वांझेची संतती| वानणें जैशी || ८०||
तैशी सत ना असत होये| जे विचाराचें नाम न साहे| ऐसेया परीची आहे| अनादि म्हणती || ८१||
जे नानातत्त्वांंची मांदुस| जे जगदभ्राचें आकाश| जे आकारजाताचें दुस| घडी केलें || ८२||
जे भवद्रुमबीजिका| जे प्रपंचचित्र भूमिका| विपरीत ज्ञानदीपिका| सांचली जे || ८३||
ते माया वस्तूच्या ठायीं| असे जैसेनि नाहीं| मग वस्तुप्रभाचि पाही| प्रगट होये || ८४||
जेव्हां आपणया आली निद| करी आपणपें जेवीं मुग्ध| कां काजळी आणी मंद| प्रभा दीपीं || ८५||
स्वप्नीं प्रियापुढें तरुणांगी| निदेली चेववूनि वेगीं| आलिंगिलेनिवीण आलिंगी| सकामु करी || ८६||
तैसी स्वरूपीं जाली माया| आणी स्वरूप नेणे धनंजया| तेंचि रुखा यया| मूळ पहिलें || ८७||
वस्तूसी आपुला जो अबोधु| तो ऊर्ध्वीं आठुळैजे कंदु| वेदांतीं हाचि प्रसिद्धु| बीजभावो || ८८||
घन अज्ञान सुषुप्ती| तो बीजांकुरभावो म्हणती| येर स्वप्न हन जागृती| हा फळभावो तियेचा || ८९||
ऐसी यया वेदांतीं| निरूपणभाषाप्रतीती| परी तें असो प्रस्तुतीं| अज्ञान मूळ || ९०||
तें ऊर्ध्व आत्मा निर्मळें| अधोर्ध्व सूचिती मूळें| बळिया बांधोनि आळें| मायायोगाचें || ९१||
मग आधिलीं सदेहांतरें| उठती जियें अपारें| ते चौपासि घेऊनि आगारें| खोलावती || ९२||
ऐसें भवद्रुमाचें मूळ| हें ऊर्ध्वीं करी बळ| मग आणियांचें बेंचळ| अधीं दावी || ९३||
तेथ चिद्वृत्ति पहिलें| महत्तत्त्व उमललें| तें पान वाल्हेंदुल्हें| एक निघे || ९४||
मग सत्त्वरजतमात्मकु| त्रिविध अहंकारु जो एकु| तो तिवणा अधोमुखु| डिरु फुटे || ९५||
तो बुद्धीची घेऊनि आगारी| भेदाची वृद्धि करी| तेथे मनाचे डाळ धरी| साजेपणें || ९६||
ऐसा मूळाचिया गाढिका| विकल्परस कोंवळिका| चित्तचतुष्टय डाहाळिका| कोंभैजे तो || ९७||
मग आकाश वायु द्योतक| आप पृथ्वी हें पांच फोंक| महाभूतांचें सरोख| सरळे होती || ९८||
तैसीं श्रोत्रादि तन्मात्रें| तियें अंगवसां गर्भपत्रें| लुळलुळितें विचित्रें| उमळती गा || ९९||
तेथ शब्दांकुर वरिपडी| श्रोत्रा वाढी देव्हडी| होता करित कांडीं| आकांक्षेचीं || १००||
अंगत्वचेचे वेलपल्लव| स्पर्शांकुरीं घेती धांव| तेथ बांबळ पडे अभिनव| विकारांचें || १०१||
पाठीं रूपपत्र पालोवेलीं| चक्षु लांब तें कांडें घाली| ते वेळीं व्यामोहता भली| पाहाळीं जाय || १०२||
आणि रसाचें आंगवसें| वाढतां वेगें बहुवसें| जिव्हे आर्तीची असोसें| निघती बेंचें || १०३||
तैसेंचि कोंभैलेनि गंधें| घ्राणाची डिरी थांबुं बांधे| तेथ तळु घे स्वानंदें| प्रलोभाचा || १०४||
एवं महदहंबुद्धि| मनें महाभूतसमृद्धी| इया संसाराचिया अवधी| सासनिजे || १०५||
किंबहुना इहीं आठें| आंगीं हा अधिक फांटे| परी शिंपीचियेवढें उमटे| रुपें जेवीं || १०६||
कां समुद्राचेनि पैसारें| वरी तरंगता आसारे| तैसें ब्रह्मचि होय वृक्षाकारें| अज्ञानमूळ || १०७||
आतां याचा हाचि विस्तारु| हाचि यया पैसारु| जैसा आपणपें स्वप्नीं परिवारु| येकाकिया || १०८||
परी तें असो हें ऐसें| कावरें झाड उससे| यया महदादि आरवसें| अधोशाखा || १०९||
आणि अश्वत्थु ऐसें ययातें| म्हणती जे जाणते| तेंही परिस हो येथें| सांगिजैल || ११०||
तरी श्वः म्हणिजे उखा| तोंवरी एकसारिखा| नाहीं निर्वाहो यया रुखा| प्रपंचरूपा || १११||
जैसा न लोटतां क्षणु| मेघु होय नानावर्णु| कां विजु नसे संपूर्णु| निमेषभरी || ११२||
ना कांपतया पद्मदळा| वरीलिया बैसका नाहीं जळा| कां चित्त जैसें व्याकुळा| माणुसाचें || ११३||
तैसीचि ययाची स्थिती| नासत जाय क्षणक्षणाप्रती| म्हणौनि ययातें म्हणती| अश्वत्थु हा || ११४||
आणि अश्वत्थु येणें नांवें| पिंपळु म्हणती स्वभावें| परी तो अभिप्राय नव्हे| श्रीहरीचा || ११५||
एऱ्हवीं पिंपळु म्हणतां विखीं| मियां गति देखिली असे निकी| परी तें असो काय लौकिकीं| हेतु काज || ११६||
म्हणौनि हा प्रस्तुतु| अलौकिकु परियेसा ग्रंथु| तरी क्षणिकत्वेंचि अश्वत्थु| बोलिजे हा || ११७||
आणीकुही येकु थोरु| यया अव्ययत्वाचा डगरु| आथी परी तो भीतरु| ऐसा आहे || ११८||
जैसा मेघांचेनि तोंडें| सिंधु एके आंगें काढे| आणि नदी येरीकडे| भरितीच असती || ११९||
तेथ वोहटे ना चढे| ऐसा परिपूर्णुचि आवडे| परी ते फुली जंव नुघडे| मेघानदींची || १२०||
ऐसें या रुखाचें होणें जाणें| न तर्के होतेनि वहिलेपणें| म्हणौनि ययातें लोकु म्हणे| अव्ययु हा || १२१||
एऱ्हवीं दानशीळु पुरुषु| वेंचकपणेंचि संचकु| तैसा व्ययेंचि हा रुखु| अव्ययो गमे || १२२||
जातां वेगें बहुवसें| न वचे कां भूमीं रुतलें असे| रथाचें चक्र दिसे| जियापरी || १२३||
तैसें काळातिक्रमें जे वाळे| ते भूतशाखा जेथ गळे| तेथ कोडीवरी उमाळे| उठती आणिक || १२४||
परी येकी केधवां गेली| शाखाकोडी केधवां जाली| हें नेणवे जेवीं उमललीं| आषाढाभ्रें || १२५||
महाकल्पाच्या शेवटीं| उदेलिया उमळती सृष्टी| तैसेंचि आणिखीचें दांग उठी| सासिन्नलें || १२६||
संहारवातें प्रचंडें| पडती प्रळयांतींचीं सालडें| तंव कल्पादीचीं जुंबाडें| पाल्हेजती || १२७||
रिगे मन्वंतर मनूपुढें| वंशावरी वंशांचे मांडे| जैसी इक्षुवृद्धी कांडेंनकांडें| जिंके जेवीं || १२८||
कलियुगांतीं कोरडीं| चहुं युगांची सालें सांडी| तंव कृतयुगाची पेली देव्हडी| पडे पुढती || १२९||
वर्ततें वर्ष जाये| तें पुढिला मुळहारी होये| जैसा दिवसु जात कीं येत आहे| हें चोजवेना || १३०||
जैशा वारियाच्या झुळकां| सांदा ठाउवा नव्हे देखा| तैसिया उठती पडती शाखा| नेणों किती || १३१||
एकी देहाची डिरी तुटे| तंव देहांकुरीं बहुवी फुटे| ऐसेनि भवतरु हा वाटे| अव्ययो ऐसा || १३२||
जैसें वाहतें पाणी जाय वेगें| तैसेंचि आणिक मिळे मागें| येथ असंतचि असिजे जगें| मानिजे संत || १३३||
कां लागोनि डोळां उघडे| तंव कोडीवरी घडे मोडे| नेणतया तरंगु आवडे| नित्यु ऐसा || १३४||
वायसा एकें बुबुळें दोहींकडे| डोळा चाळीतां अपाडें| दोन्ही आथी ऐसा पडे| भ्रमु जेवीं जगा || १३५||
पैं भिंगोरी निधिये पडली| ते गमे भूमीसी जैसी जडली| ऐसा वेगातिशयो भुली| हेतु होय || १३६||
हें बहु असो झडती| आंधारें भोवंडितां कोलती| ते दिसे जैसी आयती| चक्राकार || १३७||
हा संसारवृक्षु तैसा| मोडतु मांडतु सहसा| न देखोनि लोकु पिसा| अव्ययो मानी || १३८||
परि ययाचा वेगु देखे| जो हा क्षणिक ऐसा वोळखे| जाणे कोडिवेळां निमिखें| होत जात || १३९||
नाहीं अज्ञानावांचूनि मूळ| ययाचें असिलेंपण टवाळ| ऐसें झाड सिनसाळ| देखिलें जेणें || १४०||
तयातें गा पंडुसुता| मी सर्वज्ञुही म्हणें जाणता| पैं वाग्ब्रह्म सिद्धांता| वंद्यु तोची || १४१||
योगजाताचें जोडलें| तया एकासीचि उपेगा गेलें| किंबहुना जियालें| ज्ञानही त्याचेनी || १४२||
हें असो बहु बोलणें| वानिजैल तो कवणें| जो भवरुखु जाणें| उखि ऐसा || १४३||
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः |
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके || २||
मग ययाचि प्रपंचरूपा| अधोशाखिया पादपा| डाहाळिया जाती उमपा| ऊर्ध्वाही उजू || १४४||
आणि अधीं फांकली डाळें| तिये होती मूळें| तयाही तळीं पघळे| वेल पालवु || १४५||
ऐसें जें आम्हीं| म्हणितलें उपक्रमीं| तेंही परिसें सुगमीं| बोलीं सांगों || १४६||
तरी बद्धमूळ अज्ञानें| महदादिकीं सासिनें| वेदांचीं थोरवनें| घेऊनियां || १४७||
परी आधीं तंव स्वेदज| जारज उद्भिज अंडज| हे बुडौनि महाभुज| उठती चारी || १४८||
यया एकैकाचेनि आंगवटें| चौऱ्यांशीं लक्षधा फुटे| ते वेळीं जीवशाखीं फांटे| सैंधचि होती || १४९||
प्रसवती शाखा सरळिया| नानासृष्टि डाहाळिया| आड फुटती माळिया| जातिचिया || १५०||
स्त्री पुरुष नपुंसकें| हे व्यक्तिभेदांचे टके| आंदोळती आंगिकें| विकारभारें || १५१||
जैसा वर्षाकाळु गगनीं| पाल्हेजे नवघनीं| तैसें आकारजात अज्ञानीं| वेलीं जाय || १५२||
मग शाखांचेनि आंगभारें| लवोनि गुंफिती परस्परें| गुणक्षोभाचे वारे| उदयजती || १५३||
तेथ तेणें अचाटें| गुणांचेनि झडझडाटें| तिहीं ठायीं हा फांटे| ऊर्ध्वमूळ || १५४||
ऐसा रजाचिया झुळुका| झडाडितां आगळिका| मनुष्यजाती शाखा| थोरावती || १५५||
तिया ऊर्ध्वीं ना अधीं| माझारींचि कोंदाकोंदी| आड फुटती खांदी| चतुर्वर्णांच्या || १५६||
तेथ विधिनिषेध सपल्लव| वेदवाक्यांचें अभिनव| पालव डोलती बरव| नीच नवे || १५७||
अर्थु कामु पसरे| अग्रवनें घेती थारे| तेथ क्षणिकें पदांतरें| इहभोगाचीं || १५८||
तेथ प्रवृत्तीचेनि वृद्धिलोभें| खांकरेजती शुभाशुभें| नानाकर्मांचे खांबे| नेणों किती || १५९||
तेवींचि भोगक्षीणें मागिलें| पडती देहांतींचीं बुडसळें| तंव पुढां वाढी पेले| नवेया देहांची || १६०||
आणि शब्दादिक सुहावे| सहज रंगें हवावे| विषयपल्लव नवे| नीत्य होती || १६१||
ऐसे रजोवातें प्रचंडें| मनुष्यशाखांचे मांदोडे| वाढती तो एथ रुढे| मनुष्यलोकु || १६२||
तैसाचि तो रजाचा वारा| नावेक धरी वोसरा| मग वाजों लागे घोरा| तमाचा तो || १६३||
तेधवां याचिया मनुष्यशाखा| नीच वासना अधीं देखा| पल्हेजती डाहाळिका| कुकर्माचिया || १६४||
अप्रवृत्तींचे खणुवाळे| कोंभ निघती सरळे| घेत पान पालव डाळे| प्रमादाचीं || १६५||
बोलती निषेधनियमें| जिया ऋचा यजुःसामें| तो पाला तया घुमें| टकेयावरी || १६६||
प्रतिपादिती अभिचार| आगम जे परमार| तिहीं पानीं घेती प्रसर| वासना वेली || १६७||
तंव तंव होतीं थोराडें| अकर्मांचीं तळबुडें| आणि जन्मशाखा पुढें पुढें| घेती धांव || १६८||
तेथ चांडाळादि निकृष्टा| दोषजातीचा थोर फांटा| जाळ पडे कर्मभ्रष्टां| भुलोनियां || १६९||
पशु पक्षी सूकर| व्याघ्र वृश्चिक विखार| हे आडशाखा प्रकार| पैसु घेती || १७०||
परी ऐशा शाखा पांडवा| सर्वांगींहि नित्य नवा| निरयभोग यावा| फळाचा तो || १७१||
आणि हिंसाविषयपुढारी| कुकर्मसंगें धुर धुरी| जन्मवरी आगारी| वाढतीचि असे || १७२||
ऐसे होती तरु तृण| लोह लोष्ट पाषाण| इया खांदिया तेवीं जाण| फळेंही हेंची || १७३||
अर्जुना गा अवधारीं| मनुष्यालागोनि इया परी| वृद्धि स्थावरांतवरी| अधोशाखांची || १७४||
म्हणौनि जीं मनुष्यडाळें| तियें जाणावीं अधींचि मूळें| जे एथूनि हा पघळे| संसारतरु || १७५||
एऱ्हवीं ऊर्ध्वींचें पार्था| मुद्दल मूळ पाहतां| अधींचिया मध्यस्था| शाखा इया || १७६||
परी तामसी सात्त्विकी| सुकृतदुष्कृतात्मकी| विरुढती या शाखीं| अधोर्ध्वींचिया || १७७||
आणि वेदत्रयाचिया पाना| नये अन्यत्र लागों अर्जुना| जे मनुष्यावांचूनि विधाना| विषय नाहीं || १७८||
म्हणौनि तनु मानुषा| इया ऊर्ध्वमूळौनि जरी शाखा| तरी कर्मवृद्धीसि देखा| इयेंचि मूळें || १७९||
आणि आनीं तरी झाडीं| शाखा वाढतां मुळें गाढीं| मूळ गाढें तंव वाढी| पैस आथी || १८०||
तैसेंचि इया शरीरा| कर्म तंव देहा संसारा| आणि देह तंव व्यापारा| ना म्हणोंचि नये || १८१||
म्हणौनि देहें मानुषें| इयें मुळें होती न चुके| ऐसें जगज्जनकें| बोलिलें तेणें || १८२||
मग तमाचें तें दारुण| स्थिरावलेया वाउधाण| सत्त्वाची सुटे सत्राण| वाहुटळी || १८३||
तैं याचि मनुष्याकारा| मुळीं सुवासना निघती आरा| घेऊनि फुटती कोंबारा| सुकृतांकुरीं || १८४||
उकलतेनि उन्मेखें| प्रज्ञाकुशलतेंची तिखें| डिरिया निघती निमिखें| बाबळैजुनी || १८५||
मतीचे सोट वांवे| घालिती स्फूर्तींचेनि थांवें| बुद्धि प्रकाश घे धांवे| विवेकावरी || १८६||
तेथ मेधारसें सगर्भ| अस्थापत्रीं सबोंब| सरळ निघती कोंभ| सद्वृत्तीचे || १८७||
सदाचाराचिया सहसा| टका उठती बहुवसा| घुमघुमिति घोषा| वेदपद्याच्या || १८८||
शिष्टागमविधानें| विविधयागवितानें| इये पानावरी पानें| पालेजती || १८९||
ऐशा यमदमीं घोंसाळिया| उठती तपाचिया डाहाळिया| देती वैराग्यशाखा कोंवळिया| वेल्हाळपणें || १९०||
विशिष्टां व्रतांचे फोक| धीराच्या अणगटी तिख| जन्मवेगें ऊर्ध्वमुख| उंचावती || १९१||
माजीं वेदांचा पाला दाट| तो करी सुविद्येचा झडझडाट| जंव वाजे अचाट| सत्त्वानिळु तो || १९२||
तेथ धर्मडाळ बाहाळी| दिसती जन्मशाखा सरळी| तिया आड फुटती फळीं| स्वर्गादिकीं || १९३||
पुढां उपरति रागें लोहिवी| धर्ममोक्षाची शाखा पालवी| पाल्हाजत नित्य नवी| वाढतीचि असे || १९४||
पैं रविचंद्रादि ग्रहवर| पितृ ऋषी विद्याधर| हे आडशाखा प्रकार| पैसु घेती || १९५||
याहीपासून उंचवडें| गुढले फळाचेनि बुडें| इंद्रादिक ते मांदोडे| थोर शाखांचे || १९६||
मग तयांही उपरी डाहाळिया| तपोज्ञानीं उंचावलिया| मरीचि कश्यपादि इया| उपरी शाखा || १९७||
एवं माळोवाळी उत्तरोत्तरु| ऊर्ध्वशाखांचा पैसारु| बुडीं साना अग्रीं थोरु| फळाढ्यपणें || १९८||
वरी उपरिशाखाही पाठीं| येती फळभार जे किरीटी| ते ब्रह्मेशांत अणगटीं| कोंभ निघती || १९९||
फळाचेनि वोझेपणें| ऊर्ध्वीं वोवांडें दुणें| जंव माघौतें बैसणें| मूळींचि होय || २००||
प्राकृताही तरी रुखा| जें फळें दाटलीं होय शाखा| ते वोवांडली देखा| बुडासि ये || २०१||
तैसें जेथूनि हा आघवा| संसारतरूचा उठावा| तियें मूळीं टेंकती पांडवा| वाढतेनि ज्ञानें || २०२||
म्हणौनि ब्रह्मेशानापरौतें| वाढणें नाहीं जीवातें| तेथूनि मग वरौतें| ब्रह्मचि कीं || २०३||
परी हें असो ऐसें| ब्रह्मादिक ते आंगवसें| ऊर्ध्वमुळासरिसें| न तुकती गा || २०४||
आणीकही शाखा उपरता| जिया सनकादिक नामें विख्याता| तिया फळीं मूळीं नाडळता| भरलिया ब्रह्मीं || २०५||
ऐसी मनुष्यापासूनि जाणावी| ऊर्ध्वीं ब्रह्मादिशेष पालवी| शाखांची वाढी बरवी| उंचावे पैं || २०६||
पार्था ऊर्ध्वींचिया ब्रह्मादि| मनुष्यत्वचि होय आदि| म्हणौनि इयें अधीं| म्हणितलीं मूळें || २०७||
एवं तुज अलौकिकु| हा अधोर्ध्वशाखु| सांगितला भवरुखु| ऊर्ध्वमूळु || २०८||
आणि अधींचीं हीं मूळें| उपपत्ती परिसविली सविवळें| आतां परिस उन्मूळें| कैसेनि हा || २०९||
न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा |
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा || ३||
परी तुझ्या हन पोटीं| ऐसें गमेल किरीटी| जे एवढें झाड उत्पाटी| ऐसें कायि असे ? || २१०||
कें ब्रह्मयाच्या शेवटवरी| ऊर्ध्व शाखांची थोरी| आणि मूळ तंव निराकारीं| ऊर्ध्वीं असे || २११||
हा स्थावराही तळीं| फांकत असे अधींच्या डाळीं| माजीं धांवतसे दुजा मूळीं| मनुष्यरूपीं || २१२||
ऐसा गाढा आणि अफाटु| आतां कोण करी यया शेवटु| तरी झणीं हा हळुवटु| धरिसी भावो || २१३||
परी हा उन्मूळावया दोषें| येथ सायासचि कायिसे| काय बाळा बागुल देशें| दवडावा आहे ? || २१४||
गंधर्वदुर्ग कायी पाडावे| काय शशविषाण मोडावें| होआवें मग तोडावें| खपुष्प कीं ? || २१५||
तैसा संसारु हा वीरा| रुख नाहीं साचोकारा| मा उन्मूळणीं दरारा| कायिसा तरी ? || २१६||
आम्हीं सांगितली जे परी| मूळडाळांची उजरी| ते वांझेचीं घरभरी| लेकुरें जैशीं || २१७||
कय कीजती चेइलेपणीं| स्वप्नींचीं तिये बोलणीं| तैशी जाण ते काहाणी| दुगळींचि ते || २१८||
वांचूनि आम्हीं निरूपिलें जैसें| ययाचे अचळ मूळ असे तैसें| आणि तैसाचि जरी हा असे| साचोकारा || २१९||
तरी कोणाचेनि संतानें| निपजती तया उन्मूळणें| काय फुंकिलिया गगनें| जाइजेल गा || २२०||
म्हणौनि पैं धनंजया| आम्हीं वानिलें रूप तें माया| कासवीचेनि तुपें राया| वोगरिलें जैसें || २२१||
मृगजळाचीं गा तळीं| तिये दिठी दुरूनि न्याहाळीं| वांचूनि तेणें पाणियें साळी केळी| लाविसी काई ? || २२२||
मूळ अज्ञानचि तंव लटिकें| मा तयाचें कार्य हें केतुकें| म्हणौनि संसाररुख सतुकें| वावोचि गा || २२३||
आणि अंतु यया नाहीं| ऐसें बोलिजे जें कांहीं| तेंही साचचि पाहीं| येकें परी || २२४||
तरी प्रबोधु जंव नोहे| तंव निद्रे काय अंतु आहे ? | कीं रात्री न सरे तंव न पाहे| तया आरौतें ? || २२५||
तैसा जंव पार्था| विवेकु नुधवी माथा| तंव अंतु नाहीं अश्वत्था| भवरूपा या || २२६||
वाजतें वारें निवांत| जंव न राहे जेथिंचें तेथ| तंव तरंगतां अनंत| म्हणावीचि कीं || २२७||
म्हणौनि सूर्यु जैं हारपे| तैं मृगजळाभासु लोपे| कां प्रभा जाय दीपें| मालवलेनि || २२८||
तैसें मूळ अविद्या खाये| तें ज्ञान जैं उभें होये| तैंचि यया अंतु आहे| एऱ्हवीं नाहीं || २२९||
तेवींचि हा अनादी| ऐसी ही आथी शाब्दी| तो आळु नोहे अनुरोधी| बोलातें या || २३०||
जें संसारवृक्षाच्या ठायीं| साचोकार तंव नाहीं| मा नाहीं तया आदि काई| कोण होईल ? || २३१||
जो साच जेथूनि उपजे| तयातें आदि हें साजे| आतां नाहींचि तो म्हणिजे| कोठूनियां ? || २३२||
म्हणौनि जन्मे ना आहे| ऐसिया सांगों कवण माये| यालागीं नाहींपणेंचि होये| अनादि हा || २३३||
वांझेचिया लेंका| कैंची जन्मपत्रिका| नभीं निळी भूमिका| कें कल्पूं पां || २३४||
व्योमकुसुमांचा पांडवा| कवणें देंठु तोडावा| म्हणौनि नाहीं ऐसिया भवा| आदि कैंची ? || २३५||
जैसें घटाचें नाहींपण| असतचि असे केलेनिवीण| तैसा समूळ वृक्षु जाण| अनादि हा || २३६||
अर्जुना ऐसेनि पाहीं| आद्यंतु ययासि नाहीं| माजीं स्थिती आभासे कांहीं| परी टवाळ ते || २३७||
ब्रह्मगिरीहूनि न निगे| आणि समुद्रींही कीर न रिगे| माजीं दिसे वाउगें| मृगांबु जैसें || २३८||
तेसा आद्यंती कीर नाहीं| आणि साचही नोहे कहीं| परी लटिकेपणाची नवाई| पडिभासे गा || २३९||
नाना रंगीं गजबजे| जैसें इंद्रधनुष्य देखिजे| तैसा नेणतया आपजे| आहे ऐसा || २४०||
ऐसेनि स्थितीचिये वेळे| भुलवी अज्ञानाचे डोळे| लाघवी हरी मेखळे| लोकु जैसा || २४१||
आणि नसतीचि श्यामिका| व्योमीं दिसे तैसी दिसो कां| तरी दिसणेंही क्षणा एका| होय जाय || २४२||
स्वप्नींही मानिलें लटिकें| तरी निर्वाहो कां एकसारिखें| तेवीं आभासु हा क्षणिकें| रिताचि गा || २४३||
देखतां आहे आवडें| घेऊं जाइजे तरी नातुडे| जैसा टिकु कीजे माकडें| जळामाजीं || २४४||
तरंगभंगु सांडीं पडे| विजूही न पुरे होडे| आभासासि तेणें पाडें| होणें जाणें गा || २४५||
जैसा ग्रीष्मशेषींचा वारा| नेणिजे समोर कीं पाठीमोरा| तैसी स्थिती नाहीं तरुवरा| भवरूपा यया || २४६||
एवं आदि ना अंतु स्थिती| ना रूप ययासि आथी| आतां कायसी कुंथाकुंथी| उन्मूळणी गा || २४७||
आपुलिया अज्ञानासाठीं| नव्हता थांवला किरीटी| तरी आतां आत्माज्ञानाच्या लोटीं| खांडेनि गा || २४८||
वांचूणि ज्ञानेवीण ऐकें| उपाय करिसी जितुके| तिहीं गुंफसि अधिकें| रुखीं इये || २४९||
मग किती खांदोखांदीं| यया हिंडावें ऊर्ध्वीं अधीं| म्हणौनि मूळचि अज्ञान छेदीं| सम्यक ज्ञानें || २५०||
एऱ्हवीं दोरीचिया उरगा| डांगा मेळवितां पैं गा| तो शिणुचि वाउगा| केला होय || २५१||
तरावया मृगजळाची गंगा| डोणीलागीं धांवतां दांगा- | माजीं वोहळें बुडिजे पैं गा| साच जेवीं || २५२||
तेवीं नाथिलिया संसारा| उपाईं जाचतया वीरा| आपणपें लोपे वारा| विकोपीं जाय || २५३||
म्हणौनि स्वप्नींचिया घाया| ओखद चेवोचि धनंजया| तेवीं अज्ञानमूळा यया| ज्ञानचि खड्ग || २५४||
परी तेचि लीला परजवे| तैसें वैराग्याचें नवें| अभंगबळ होआवें| बुद्धीसी गा || २५५||
उठलेनि वैराग्यें जेणें| हा त्रिवर्गु ऐसा सांडणें| जैसें वमुनियां सुणें| आतांचि गेलें || २५६||
हा ठायवरी पांडवा| पदार्थजातीं आघवा| विटवी तो होआवा| वैराग्य लाठु || २५७||
मग देहाहंतेचें दळें| सांडूनि एकेचि वेळे| प्रत्यक्बुद्धी करतळें| हातवसावें || २५८||
निसळें विवेकसाहणें| जें ब्रह्माहमस्मिबोधें सणाणें| मग पुरतेनि बोधें उटणें| एकलेचि || २५९||
परी निश्चयाचें मुष्टिबळ| पाहावें एकदोनी वेळ| मग तुळावें अति चोखाळ| मननवरी || २६०||
पाठीं हतियेरां आपणयां| निदिध्यासें एक जालिया| पुढें दुजें नुरेल घाया- | पुरतें गा || २६१||
तें आत्मज्ञानाचें खांडें| अद्वैतप्रभेचेनि वाडें| नेदील उरों कवणेकडे| भववृक्षासी || २६२||
शरदागमींचा वारा| जैसा केरु फेडी अंबरा| का उदयला रवी आंधारा| घोंटु भरी || २६३||
नाना उपवढ होतां खेंवो| नुरे स्वप्नसंभ्रमाचा ठावो| स्वप्नप्रतीतिधारेचा वाहो| करील तैसें || २६४||
तेव्हां ऊर्ध्वींचें मूळ| कां अधींचें हन शाखाजाळ| तें कांहींचि न दिसे मृगजळ| चादिणां जेवीं || २६५||
ऐसेनि गा वीरनाथा| आत्मज्ञानाचिया खड्गलता| छेदुनिया भवाश्वत्था| ऊर्ध्वमूळातें || २६६||
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन गता न निवर्तन्ति भूयः |
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी || ४||
मग इदंतेसि वाळलें| जें मीपणेंवीण डाहारलें| तें रूप पाहिजे आपलें| आपणचि || २६७||
परी दर्पणाचेनि आधारें| एकचि करून दुसरें| मुख पाहाती गव्हारें| तैसें नको हो || २६८||
हें पाहाणें ऐसें असे वीरा| जैसा न बोडलिया विहिरा| मग आपलिया उगमीं झरा| भरोनि ठाके || २६९||
नातरी आटलिया अंभ| निजबिंबीं प्रतिबिंब| निहटे कां नभीं नभ| घटाभावीं || २७०||
नाना इंधनांशु सरलेया| वन्हि परते जेवीं आपणपयां| तैसें आपेंआप धनंजया| न्याहाळणें जें गा || २७१||
जिव्हे आपली चवी चाखणें| चक्षू निज बुबुळ देखणें| आहे तया ऐसें निरीक्षणें| आपुलें पैं || २७२||
कां प्रभेसि प्रभा मिळे| गगन गगनावरी लोळे| नाना पाणी भरलें खोळे| पाणियाचिये || २७३||
आपणचि आपणयातें| पाहिजे जें अद्वैतें| तें ऐसें होय निरुतें| बोलिजतु असे || २७४||
जें पाहिजतेनवीण पाहिजे| कांहीं नेणणाचि जाणिजे| आद्यपुरुष कां म्हणिजे| जया ठायातें || २७५||
तेथही उपाधीचा वोथंबा| घेऊनि श्रुति उभविती जिभा| मग नामरूपाचा वडंबा| करिती वायां || २७६||
पैं भवस्वर्गा उबगले| मुमुक्षु योगज्ञाना वळघले| पुढती न यों इया निगाले| पैजा जेथ || २७७||
संसाराचिया पायां पुढां| पळती वीतराग होडा| ओलांडोनि ब्रह्मपदाचा कर्मकडा| घालिती मागां || २७८||
अहंतादिभावां आपुलियां| झाडा देऊनि आघवेया| पत्र घेती ज्ञानिये जया| मूळघरासी || २७९||
पैं जेथुनी हे एवढी| विश्वपरंपरेची वेलांडी| वाढती आशा जैशी कोरडी| निदैवाची || २८०||
जिये कां वस्तूचें नेणणें| आणिलें थोर जगा जाणणें| नाहीं तें नांदविलें जेणें| मी तूं जगीं || २८१||
पार्था तें वस्तु पहिलें| आपणपें आपुलें| पाहिजे जैसें हिंवलें| हिंव हिंवें || २८२||
आणीकही एक तया| वोळखण असे धनंजया| तरी जया कां भेटलिया| येणेंचि नाहीं || २८३||
परी तया भेटती ऐसें| जे ज्ञानें सर्वत्र सरिसे| महाप्रळयांबूचे जैसें| भरलेपण || २८४||
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः |
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् || ५||
जया पुरुषांचें कां मन| सांडोनि गेलें मोह मान| वर्षांतीं जैसें घन| आकाशातें || २८५||
निकवड्या निष्ठुरा| उबगिजे जेवीं सोयरा| तैसें नागवती विकारां| वेटाळूं जे || २८६||
फळली केळी उन्मूळे| तैसी आत्मलाभें प्रबळे| तयाची क्रिया ढाळेंढाळें| गळती आहे || २८७||
आगी लगलिया रुखीं| देखोनि सैरा पळती पक्षी| तैसें सांडिलें अशेखीं| विकल्पीं जे || २८८||
आइकें सकळ दोषतृणीं| अंकुरिजती जिये मेदिनी| तिये भेदबुद्धीची काहाणी| नाहीं जयातें || २८९||
सूर्योदयासरिसी| रात्री पळोनि जाय अपैसी| गेली देहअहंता तैसी| अविद्येसवें || २९०||
पैं आयुष्यहीना जीवातें| शरीर सांडी जेवीं अवचितें| तेवीं निदसुरें द्वैतें| सांडिले जे || २९१||
लोहाचें साम्कडें परिसा| न जोडे अंधारु रवि जैसा| द्वैतबुद्धीचा तैसा| सदा दुकाळ जया || २९२||
अगा सुखदुःखाकारें| द्वंद्वें देहीं जियें गोचरें| तियें जयां कां समोरें| होतीचिना || २९३||
स्वप्नींचें राज्य कां मरण| नोहे हर्षशोकांसि कारण| उपवढलिया जाण| जियापरी || २९४||
तैसेम सुखदुःखरूपीं| द्वंद्वीं जे पुण्यपापीं| न घेपिजती सर्पीं| गरुड जैसें || २९५||
आणि अनात्मवर्गनीर| सांडूनि आत्मरसाचें क्षीर| चरताति जे सविचार| राजहंसु || २९६||
जैसा वर्षोनि भूतळीं| आपला रसु अंशुमाळी| मागौता आणी रश्मिजाळीं| बिंबासीचि || २९७||
तैसें आत्मभ्रांतीसाठीं| वस्तु विखुरली बारावाटीं| ते एकवटिती ज्ञानदृष्टी| अखंड जे || २९८||
किंबहुना आत्मयाचा| निर्धारीं विवेकु जयांचा| बुडाला वोघु गंगेचा| सिंधूमाजीं जैसा || २९९||
पैं आघवेंचि आपुलेंपणें| नुरेचि जया अभिलाषणें| जैसें येथूनि पऱ्हां जाणें| आकाशा नाहीं || ३००||
जैसा अग्नीचा डोंगरु| नेघे कोणी बीज अंकुरु| तैसा मनीं जयां विकारु| उदैजेना || ३०१||
जैसा काढिलिया मंदराचळु| राहे क्षीराब्धि निश्चळु| तैसा नुठी जयां सळु| कामोर्मीचा || ३०२||
चंद्रमा कळीं धाला| न दिसे कोणें आंगी वोसावला| तेवीं अपेक्षेचा अवखळा| न पडे जयां || ३०३||
हें किती बोलूं असांगडें| जेवीं परमाणु नुरे वायूपुढें| तैसें विषयांचें नावडे| नांवचि जयां || ३०४||
एवं जे जे कोणी ऐसे| केले ज्ञानाग्नि हुताशें| ते तेथ मिळती जैसें| हेमीं हेम || ३०५||
तेथ म्हणिजे कवणें ठाईं| ऐसेंही पुससी कांहीं| तरी तें पद गा नाहीं| वेंचु जया || ३०६||
दृश्यपणें देखिजे| कां ज्ञेयत्वें जाणिजे| अमुकें ऐसें म्हणिजे| तें जें नव्हे || ३०७||
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पवकः |
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम || ६||
पैं दीपाचिया बंबाळीं| कां चंद्र हन जें उजळी| हें काय बोलों अंशुमाळी| प्रकाशी जें || ३०८||
तें आघवेंचि दिसणें| जयाचें कां न देखणें| विश्व भासतसे जेणें| लपालेनी || ३०९||
जैसें शिंपीपण हारपे| तंव तंव खरें होय रुपें| कां दोरी लोपतां सापें| फार होइजे || ३१०||
तैसीं चंद्रसूर्यादि थोरें| इयें तेजें जियें फारें| तियें जयाचेनि आधारें| प्रकाशती || ३११||
ते वस्तु कीं तेजोराशी| सर्वभूतात्मक सरिसी| चंद्रसूर्याच्या मानसीं| प्रकाशे जे || ३१२||
म्हणौनि चंद्रसूर्य कडवसां| पडती वस्तूच्या प्रकाशा| यालागीं तेज जें तेजसा| तें वस्तूचें आंग || ३१३||
आणि जयाच्या प्रकाशीं| जग हारपे चंद्रार्केंसीं| सचंद्र नक्षत्रें जैसीं| दिनोदयीं || ३१४||
नातरी प्रबोधलिये वेळे| ते स्वप्नींची डिंडीमा मावळे| कां नुरेचि सांजवेळे| मृगतृष्णिका || ३१५||
तैसा जिये वस्तूच्या ठायीं| कोण्हीच कां आभासु नाहीं| तें माझें निजधाम पाहीं| पाटाचें गा || ३१६||
पुढती जे तेथ गेले| ते न घेती माघौतीं पाउलें| महोदधीं कां मिनले| स्रोत जैसे || ३१७||
कां लवणाची कुंजरी| सूदलिया लवणसागरीं| होयचि ना माघारी| परती जैसी || ३१८||
नाना गेलिया अंतराळा| न येतीचि वन्हिज्वाळा| नाहीं तप्तलोहौनि जळा| निघणें जेवीं || ३१९||
तेवीं मजसीं एकवट| जे जाले ज्ञानें चोखट| तयां पुनरावृत्तीची वाट| मोडली गा || ३२०||
तेथ प्रज्ञापृथ्वीचा रावो| पार्थु म्हणे जी जी पसावो| परी विनंती एकी देवो| चित्त देतु || ३२१||
तरी देवेंसि स्वयें एक होती| मग माघौते जे न येती| ते देवेंसि भिन्न आथी| कीं अभिन्न जी || ३२२||
जरी भिन्नचि अनादिसिद्ध| तरी न येती हें असंबद्ध| जे फुलां गेलें षट्पद| ते फुलेंचि होती पां || ३२३||
पैं लक्ष्याहूनि अनारिसे| बाण लक्ष्यीं शिवोनि जैसें| मागुते पडती तैसे| येतीचि ते || ३२४||
नातरी तूंचि ते स्वभावें| तरी कोणें कोणासि मिळावें| आपणयासी आपण रुपावें| शस्त्रें केवीं ? || ३२५||
म्हणौनि तुजसी अभिन्नां जीवां| तुझा संयोगवियोगु देवा| नये बोलों अवयवां| शरीरेंसीं || ३२६||
आणि जे सदां वेगळें तुजसीं| तयां मिळणीं नाहीं कोणे दिवशीं| मा येती न येती हे कायसी| वायबुद्धि ? || ३२७||
तरी कोण गा ते तूंतें| पावोनि न येती माघौते| हें विश्वतोमुखा मातें| बुझावीं जी || ३२८||
इये आक्षेपीं अर्जुनाच्या| तो शिरोमणि सर्वज्ञांचा| तोषला बोध शिष्याचा| देखोनियां || ३२९||
मग म्हणे गा महामती| मातें पावोनि न येती पुढती| ते भिन्नाभिन्न रिती| आहाती दोनी || ३३०||
जैं विवेकें खोलें पाहिजे| तरी मी तेचि ते सहजें| ना आहाचवाहाच तरी दुजे| ऐसेही गमती || ३३१||
जैसे पाणियावरी वेगळ| तळपतां दिसती कल्लोळ| एऱ्हवीं तरी निखिळ| पाणीचि तें || ३३२||
कां सुवर्णाहुनि आनें| लेणीं गमती भिन्नें| मग पाहिजे तंव सोनें| आघवेंचि तें || ३३३||
तैसें ज्ञानाचिये दिठी| मजसीं अभिन्नचि ते किरीटी| येर भिन्नपण तें उठी| अज्ञानास्तव || ३३४||
आणि साचोकारेनि वस्तुविचारें| कैचें मज एकासि दुसरें| भिन्नाभिन्नव्यवहारें| उमसिजेल || ३३५||
आघवेंचि आकाश सूनि पोटीं| बिंबचि जैं आते खोटी| तैं प्रतिबिंब कें उठी| कें रश्मि शिरे ? || ३३६||
कां कल्पांतींचिया पाणिया| काय वोत भरिती धनंजया ? | म्हणौनि कैंचें अंश अविक्रिया| एका मज || ३३७||
परी ओघाचेनि मेळें| पाणी उजू परी वांकुडें जालें| रवी दुजेपण आलें| तोयबगें || ३३८||
व्योम चौफळें कीं वाटोळें| हें ऐसें कायिसयाही मिळे| परी घटमठीं वेंटाळें| तैसेंही आथी || ३३९||
हां गा निद्रेचेनि आधारें| काय एकलेनि जग न भरे ? | स्वप्नींचेनि जैं अवतरे| रायपणें || ३४०||
कां मिनलेनि किडाळें| वानिभेदासि ये सोळें| तैसा स्वमाये वेंटाळें| शुद्ध जैं मी || ३४१||
तैं अज्ञान एक रूढे| तेणें कोऽहंविकल्पाचें मांडे| मग विवरूनि कीजे फुडें| देहो मी ऐसें || ३४२||
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः |
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति || ७||
ऐसें शरीराचि येवढें| जै आत्मज्ञान वेगळें पडे| तैं माझा अंशु आवडे| थोडेपणें || ३४३||
समुद्र कां वायुवशें| तरंगाकार उल्लसें| तो समुद्रांशु ऐसा दिसे| सानिवा जेवीं || ३४४||
तेवीं जडातें जीवविता| देहाहंता उपजविता| मी जीव गमें पंडुसुता| जीवलोकीं || ३४५||
पैं जीवाचिया बोधा| गोचरु जो हा धांदा| तो जीवलोकशब्दा| अभिप्रावो || ३४६||
अगा उपजणें निमणें| हें साचचि जे कां मानणें| तो जीवलोकु मी म्हणे| संसारु हन || ३४७||
एवंविध जीवलोकीं| तूं मातें ऐसा अवलोकीं| जैसा चंद्रु कां उदकीं| उदकातीत || ३४८||
पैं काश्मीराचा रवा| कुंकुमावरी पांडवा| आणिका गमे लोहिवा| तो तरी नव्हे || ३४९||
तैसें अनादिपण न मोडे| माझें अक्रियत्व न खंडे| परी कर्ता भोक्ता ऐसें आवडे| ते जाण गा भ्रांती || ३५०||
किंबहुना आत्मा चोखटु| होऊनि प्रकृतीसी एकवटु| बांधे प्रकृतिधर्माचा पाटु| आपणपयां || ३५१||
पैं मनादि साही इंद्रियें| श्रोत्रादि प्रकृतिकार्यें| तियें माझीं म्हणौनि होये| व्यापारारूढ || ३५२||
जैसें स्वप्नीं परिव्राजें| आपणपयां आपण कुटुंब होईजे| मग तयाचेनि धांविजे| मोहें सैरा || ३५३||
तैसा आपलिया विस्मृती| आत्मा आपणचि प्रकृती- | सारिखा गमोनि पुढती| तियेसीचि भजे || ३५४||
मनाच्या रथीं वळघे| श्रवणाचिया द्वारें निघे| मग शब्दाचिया रिघे| रानामाजीं || ३५५||
तोचि प्रकृतीचा वागोरा| त्वचेचिया मोहरा| आणि स्पर्शाचिया घोरा| वना जाय || ३५६||
कोणे एके अवसरीं| रिघोनि नेत्राच्या द्वारीं| मग रूपाच्या डोंगरीं| सैरा हिंडे || ३५७||
कां रसनेचिया वाटा| निघोनि गा सुभटा| रसाचा दरकुटा| भरोंचि लागे || ३५८||
नातरी येणेंचि घ्राणें| जैं देहांशु करी निघणें| मग गंधाची दारुणें| आडवें लंघी || ३५९||
ऐसेनि देहेंद्रियनायकें| धरूनि मन जवळिकें| भोगिजती शब्दादिकें| विषयभरणें || ३६०||
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः |
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् || ८||
परी कर्ता भोक्ता ऐसें| हें जीवाचे तैंचि दिसे| जैं शरीरीं कां पैसे| एकाधिये || ३६१||
जैसा आथिला आणि विलासिया| तैंचि वोळखों ये धनंजया| जैं राजसेव्या ठाया| वस्तीसि ये || ३६२||
तैसा अहंकर्तृत्वाचा वाढु| कां विषयेंद्रियांचा धुमाडु| हा जाणिजे तैं निवाडु| जैं देह पाविजे || ३६३||
अथवा शरीरातें सांडी| तऱ्ही इंद्रियांची तांडी| हे आपणयांसवें काढी| घेऊनि जाय || ३६४||
जैसा अपमानिला अतिथी| ने सुकृताची संपत्ति| कां साइखडेयाची गती| सूत्रतंतू || ३६५||
नाना मावळतेनि तपनें| नेइजेती लोकांचीं दर्शनें| हें असो द्रुती पवनें| नेईजे जैसी || ३६६||
तेवीं मनःषष्ठां ययां| इंद्रियांतें धनंजया| देहराजु ने देहा- | पासूनि गेला || ३६७||
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च |
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते || ९||
मग येथ अथवा स्वर्गीं| जेथ जें देह आपंगी| तेथ तैसेंचि पुढती पांगी| मनादिक || ३६८||
जैसा मालवलिया दिवा| प्रभेसी जाय पांडवा| मग उजळिजे तेथ तेधवां| तैसाचि फांके || ३६९||
तरी ऐसैसिया राहाटी| अविवेकियांचे दिठी| येतुलें हें किरीटी| गमेचि गा || ३७०||
जे आत्मा देहासि आला| आणि विषयो येणेंचि भोगिला| अथवा देहोनि गेला| हें साचचि मानिती || ३७१||
एऱ्हवीं येणें आणि जाणें| कां करणें हा भोगणें| हें प्रकृतीचें तेणें| मानियेलें || ३७२||
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितं |
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः || १०||
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितं |
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः || ११||
परी देहाचे मोटकें उभें| आणि चेतना तेथ उपलभे| तिये चळवळेचेनि लोभें| आला म्हणती || ३७३||
तैसेंचि तयां संगती| इंद्रियें आपुलाल्या अर्थीं वर्तती| तया नांव सुभद्रापती| भोगणें जया || ३७४||
पाठीं भोगक्षीण आपैसे| देह गेलिया ते न दिसे| तेथें गेला गेला ऐसें| बोभाती गा || ३७५||
पैं रुखु डोलतु देखावा| तरी वारा वाजतु मानावा| रुखु नसे तेथें पांडवा| नाहीं तो गा ? || ३७६||
कां आरिसा समोर ठेविजे| आणि आपणपें तेथ देखिजे| तरी तेधवांचि जालें मानिजे| काय आधीं नाहीं ? || ३७७||
कां परता केलिया आरिसा| लोपु जाला तया आभासा| तरी आपणपें नाहीं ऐसा| निश्चयो करावा ? || ३७८||
शब्द तरी आकाशाचा| परी कपाळीं पिटे मेघाचा| कां चंद्रीं वेगु अभ्राचा| अरोपिजे || ३७९||
तैसें होइजे जाइजे देहें| तें आत्मसत्ते अविक्रिये| निष्टंकिती गा मोहें| आंधळे ते || ३८०||
येथ आत्मा आत्मयाच्या ठायीं| देखिजे देहींचा धर्मु देहीं| ऐसें देखणें तें पाहीं| आन आहाती || ३८१||
ज्ञानें कां जयाचे डोळे| देखोनि न राहती देहींचे खोळे| सूर्यरश्मी आणियाळे| ग्रीष्मीं जैसें || ३८२||
तैसे विवेकाचेनि पैसें| जयांची स्फूर्ती स्वरूपीं बैसे| ते ज्ञानिये देखती ऐसें| आत्मयातें || ३८३||
जैसें तारांगणीं भरलें| गगन समुद्रीं बिंबलें| परी तें तुटोनि नाहीं पडिलें| ऐसें निवडे || ३८४||
गगन गगनींचि आहे| हें आभासे तें वाये| तैसा आत्मा देखती देहें| गंवसिलाही || ३८५||
खळाळाच्या लगबगीं| फेडूनि खळाळाच्या भागीं| देखिजे चंद्रिका कां उगी| चंद्रीं जेवीं || ३८६||
कां नाडरचि भरे शोषें| सूर्यु तो जैसा तैसाचि असे| देह होतां जातां तैसें| देखती मातें || ३८७||
घटु मठु घडले| तेचि पाठीं मोडले| परी आकाश तें संचलें| असतचि असे || ३८८||
तैसें अखंडे आत्मसत्ते| अज्ञानदृष्टि कल्पितें| हें देहचि होतें जातें| जाणती फुडें || ३८९||
चैतन्य चढे ना वोहटे| चेष्टवी ना चेष्टे| ऐसें आत्मज्ञानें चोखटें| जाणती ते || ३९०||
आणि ज्ञानही आपैतें होईल| प्रज्ञा परमाणुही उगाणा घेईल| सकळ शास्त्रांचें येईल| सर्वस्व हातां || ३९१||
परी ते व्युत्पत्ति ऐसी| जरी विरक्ति न रिगे मानसीं| तरी सर्वात्मका मजसीं| नव्हेचि भेटी || ३९२||
पैं तोंड भरो कां विचारा| आणि अंतःकरणीं विषयांसि थारा| तरी नातुडें धनुर्धरा| त्रिशुद्धी मी || ३९३||
हां गा वोसणतयाच्या ग्रंथीं| काई तुटती संसारगुंती ? | कीं परिवसिलिया पोथी| वाचिली होय ? || ३९४||
नाना बांधोनियां डोळे| घ्राणीं लाविजती मुक्ताफळें| तरी तयांचें काय कळे| मोल मान ? || ३९५||
तैसा चित्तीं अहंते ठावो| आणि जिभे सकळशास्त्रांचा सरावो| ऐसेनि कोडी एक जन्म जावो| परी न पविजे मातें || ३९६||
जो एक मी कां समस्तीं| व्यापकु असें भूतजातीं| ऐक तिये व्याप्ती| रूप करूं || ३९७||
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् |
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् || १२||
तरी सूर्यासकट आघवी| हे विश्वरचना जे दावी| ते दीप्ति माझी जाणावी| आद्यंतीं आहे || ३९८||
जल शोषूनि गेलिया सविता| ओलांश पुरवीतसे जे माघौता| ते चंद्रीं पंडुसुता| ज्योत्स्ना माझी || ३९९||
आणि दहन- पाचनसिद्धी| करीतसे जें निरवधी| ते हुताशीं तेजोवृद्धी| माझीचि गा || ४००||
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा |
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः || १३||
मी रिगालों असें भूतळीं| म्हणौनि समुद्र महाजळीं| हे पांसूचि ढेंपुळी| विरेचिना || ४०१||
आणी भूतेंही चराचरें| हे धरितसे जियें अपारें| तियें मीचि धरी धरे| रिगोनियां || ४०२||
गगनीं मी पंडुसुता| चंद्राचेनि मिसें अमृता| भरला जालों चालता| सरोवरु || ४०३||
तेथूनि फांकती रश्मिकर| ते पाट पेलूनि अपार| सर्वौषधींचे आगर| भरित असें मी || ४०४||
ऐसेनि सस्यादिकां सकळां| करी धान्यजाती सुकाळा| दें अन्नद्वारां जिव्हाळा| भूतजातां || ४०५||
आणि निपजविलें अन्न| तरी तैसें कैचें दीपन| जेणें जिरूनि समाधान| भोगिती जीव || ४०६||
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः |
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् || १४||
म्हणौनि प्राणिजातांच्या घटीं| करूनि कंदावरी आगिठी| दीप्ति जठरींही किरीटी| मीचि जालों || ४०७||
प्राणापानाच्या जोडभातीं| फुंकफुंकोनियां अहोराती| आटीतसें नेणों किती| उदरामाजीं || ४०८||
शुष्कें अथवा स्निग्धें| सुपक्वें कां विदग्धें| परी मीचि गा चतुर्विधें| अन्नें पचीं || ४०९||
एवं मीचि आघवें जन| जना निरवितें मीचि जीवन| जीवनीं मुख्य साधन| वन्हिही मीचि || ४१०||
आतां ऐसियाहीवरी काई| सांगों व्याप्तीची नवाई| येथ दुजें नाहींचि घेईं| सर्वत्र मी गा || ४११||
तरी कैसेनि पां वेखें| सदा सुखियें एकें| एकें तियें बहुदुःखें| क्रांत भूतें || ४१२||
जैसी सगळिये पाटणीं| एकेंचि दीपें दिवेलावणी| जालिया कां न देखणी| उरलीं एकें || ४१३||
ऐसी हन उखिविखी| करित आहासि मानसीं कीं| तरी परिस तेही निकी| शंका फेडुं || ४१४||
पैं आघवा मीचि असें| येथ नाहीं कीर अनारिसें| परी प्राणियांचिया उल्लासें| बुद्धि ऐसा || ४१५||
जैसें एकचि आकाशध्वनी| वाद्यविशेषीं आनानीं| वाजावें पडे भिन्नीं| नादांतरीं || ४१६||
कां लोकचेष्टीं वेगळालां| जो हा एकचि भानु उदैला| तो आनानी परी गेला| उपयोगासी || ४१७||
नाना बीजधर्मानुरूप| झाडीं उपजविलें आप| तैसें परिणमलें स्वरूप| माझें जीवां || ४१८||
अगा नेणा आणि चतुरा| पुढां निळयांचा दुसरा| नेणा सर्पत्वें जाला येरा| सुखालागीं || ४१९||
हें असो स्वातीचें उदक| शुक्तीं मोतीं व्याळीं विख| तैसा सज्ञानांसी मी सुख| दुःख तों अज्ञानांसी || ४२०||
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च |
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेवचाहम् || १५||
एऱ्हवीं सर्वांच्या हृदयदेशीं| मी अमुका आहें ऐसी| जे बुद्धि स्फुरे अहर्निशीं| ते वस्तु गा मी || ४२१||
परी संतासवें वसतां| योगज्ञानीं पैसतां| गुरुचरण उपासितां| वैराग्येंसीं || ४२२||
येणेंचि सत्कर्में| अशेषही अज्ञान विरमे| जयांचें अहं विश्रामे| आत्मरूपीं || ४२३||
ते आपेआप देखोनि देखीं| मियां आत्मेनि सदा सुखी| येथें मीवांचून अवलोकीं| आन हेतु असे ? || ४२४||
अगा सूर्योदयो जालिया| सूर्यें सूर्यचि पहावा धनंजया| तेवीं मातें मियां जाणावया| मीचि हेतु || ४२५||
ना शरीरपरातें सेवितां| संसारगौरवचि ऐकतां| देहीं जयांची अहंता| बुडोनि ठेली || ४२६||
ते स्वर्गसंसारालागीं| धांवतां कर्ममार्गीं| दुःखाच्या सेलभागीं| विभागी होती || ४२७||
परी हेंही होणें अर्जुना| मजचिस्तव तया अज्ञाना| जैसा जागताचि हेतु स्वप्ना| निद्रेतें होय || ४२८||
पैं अभ्रें दिवसु हरपला| तोहि दिवसेंचि जाणों आला| तेवीं मी नेणोनि विषयो देखिला| मजचिस्तव भूतीं || ४२९||
एवं निद्रा कां जागणिया| प्रबोधुचि हेतु धनंजया| तेवीं ज्ञाना अज्ञाना जीवां यां| मीचि मूळ || ४३०||
जैसें सर्पत्वा कां दोरा| दोरुचि मूळ धनुर्धरा| तैसा ज्ञाना अज्ञानाचिया संसारा| मियांचि सिद्धु || ४३१||
म्हणौनि जैसा असें तैसया| मातें नेणोनि धनंजया| वेदु जाणों गेला तंव तया| जालिया शाखा || ४३२||
तरी तिहीं शाखाभेदीं| मीचि जाणिजे त्रिशुद्धी| जैसा पूर्वापरा नदी| समुद्रचि ठी || ४३३||
आणि महासिद्धांतापासीं| श्रुति हारपतीं शब्देंसीं| जैसिया सगंधा आकाशीं| वातलहरी || ४३४||
तैसें समस्तही श्रुतिजात| ठाके लाजिले ऐसें निवांत| तें मीचि करीं यथावत| प्रकटोनियां || ४३५||
पाठीं श्रुतिसकट अशेष| जग हारपे जेथ निःशेष| तें निजज्ञानही चोख| जाणता मीचि || ४३६||
जैसें निदेलिया जागिजे| तेव्हां स्वप्नींचे कीर नाहीं दुजें| परी एकत्वही देखों पाविजे| आपलेंचि || ४३७||
तैसें आपलें अद्वयपण| मी जाणतसें दुजेनवीण| तयाही बोधाकारण| जाणता मीचि || ४३८||
मग आगी लागलिया कापुरा| ना काजळी ना वैश्वानरा| उरणें नाहीं वीरा| जयापरी || ४३९||
तेवीं समूळ अविद्या खाये| तें ज्ञानही जैं बुडोनि जाये| तऱ्ही नाहीं कीर नोहे| आणि न साहे असणेंही || ४४०||
पैं विश्व घेऊनि गेला मागेंसीं| तया चोरातें कवण कें गिंवसी ? | जे कोणी एकी दशा ऐसी| शुद्ध ते मी || ४४१||
ऐसी जडाजडव्याप्ती| रूप करितां कैवल्यपती| ठी केली निरुपहितीं| आपुल्या रूपीं || ४४२||
तो आघवाचि बोधु सहसा| अर्जुनीं उमटला कैसा| व्योमींचा चंद्रोदयो जैसा| क्षीरार्णवीं || ४४३||
कां प्रतिभिंती चोखटे| समोरील चित्र उमटे| तैसा अर्जुनें आणि वैकुंठें| नांदतसे बोधु || ४४४||
तरी बाप वस्तुस्वभावो| फावे तंव तंव गोडिये थांवो| म्हणौनि अनुभवियांचा रावो| अर्जुन म्हणे || ४४५||
जी व्यापकपण बोलतां| निरुपाधिक जें आतां| स्वरूप प्रसंगता| बोलिले देवो || ४४६||
ते एक वेळ अव्यंगवाणें| कीजो कां मजकारणें| तेथ द्वारकेचा नाथु म्हणे| भलें केलें || ४४७||
पैं अर्जुना आम्हांहि वाडेंकोडें| अखंडा बोलों आवडे| परी काय कीजे न जोडे| पुसतें ऐसें || ४४८||
आजि मनोरथांसि फळ| जोडलासि तूं केवळ| जे तोंड भरूनि निखळ| आलासि पुसों || ४४९||
जें अद्वैताहीवरी भोगिजे| तें अनुभवींच तूं विरजे| पुसोनि मज माझें| देतासि सुख || ४५०||
जैसा आरिसा आलिया जवळां| दिसे आपणपें आपला डोळा| तैसा संवादिया तूं निर्मळा| शिरोमणी || ४५१||
तुवां नेणोनि पुसावें| मग आम्ही परिसऊं बैसावें| तो गा हा पाडु नव्हे| सोयरेया || ४५२||
ऐसें म्हणौनि आलिंगिलें| कृपादृष्टी अवलोकिलें| मग देवो काय बोलिले| अर्जुनेंसीं || ४५३||
पैं दोहीं वोठीं एक बोलणें| दोहीं चरणीं एक चालणें| तैसें पुसणें सांगणें| तुझें माझें || ४५४||
एवं आम्ही तुम्ही येथें| देखावें एका अर्थातें| सांगतें पुसतें येथें| दोन्ही एक || ४५५||
ऐसा बोलत देवो भुलला मोहें| अर्जुनातें आलिंगूनि ठाये| मग बिहाला म्हणे नोहें| आवडी हे || ४५६||
जाले इक्षुरसाचें ढाळ| तरी लवण देणें किडाळ| जे संवादसुखाचें रसाळ| नासेल थितें || ४५७||
आधींच आम्हां यया कांहीं| नरनारायणासी भिन्न नाहीं| परी आतां जिरो माझ्या ठाईं| वेगु हा माझा || ४५८||
इया बुद्धी सहसा| श्रीकृष्ण म्हणे वीरेशा| पैं गा तो तुवां कैसा| प्रश्नु केला ? || ४५९||
जो अर्जुन श्रीकृष्णीं विरत होता| तो परतोनि मागुता| प्रश्नावळीची कथा| ऐकों आला || ४६०||
तेथ सद्गदें बोलें| अर्जुनें जी जी म्हणितलें| निरुपाधिक आपुलें| रूप सांगा || ४६१||
यया बोला तो शारङ्गी| तेंचि सांगावयालागीं| उपाधी दोहीं भागीं| निरूपीत असे || ४६२||
पुसिलिया निरुपहित| उपाधि कां सांगे येथ| हें कोण्हाही प्रस्तुत| गमे जरी || ४६३||
तरी ताकाचें अंश फेडणें| याचि नांव लोणी काढणें| चोखाचिये शुद्धी तोडणें| कीडचि जेवीं || ४६४||
बाबुळीचि सारावी हातें| परी पाणी तंव असे आइतें| अभ्रचि जावें गगन तें| सिद्धचि कीं || ४६५||
वरील कोंडियाचा गुंडाळा| झाडूनि केलिया वेगळा| कणु घेतां विरंगोळा| असे काई ? || ४६६||
तैसा उपाधि उपहितां| शेवटु जेथ विचारितां| तें कोणातेंही न पुसतां| निरुपाधिक || ४६७||
जैसें न सांगणेंवरी| बाळा पतीसी रूप करी| बोल निमालेपणें विवरी| अचर्चातें || ४६८||
पैं सांगणेया जोगें नव्हे| तेथींचें सांगणें ऐसें आहे| म्हणौनि उपाधि लक्ष्मीनाहे| बोलिजे आदीं || ४६९||
पाडिव्याची चंद्ररेखा| निरुती दावावया शाखा| दाविजे तेवीं औपाधिका| बोली इया || ४७०||
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च |
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते || १६||
मग तो म्हणे गा सव्यसाची| पैं इये संसारपाटणींची| वस्ती साविया टांची| दुपुरुषीं || ४७१||
जैसी आघवांचि गगनीं| नांदत दिवोरात्री दोन्ही| तैसे संसार राजधानीं| दोन्हीचि हे || ४७२||
आणिकही तिजा पुरुष आहे| परी तो या दोहींचें नांव न साहे| जो उदेला गांवेंसीं खाये| दोहींतें ययां || ४७३||
परी ते तंव गोठी असो| आधीं दोन्हींची हे परियेसों| जें संसारग्रामा वसों| आले असती || ४७४||
एक आंधळा वेडा पंगु| येर सर्वांगें पुरता चांगु| परी ग्रामगुणें संगु| घडला दोघां || ४७५||
तया एका नाम क्षरु| येरातें म्हणती अक्षरु| इहीं दोहींचि परी संसारु| कोंदला असे || ४७६||
आतां क्षरु तो कवणु| अक्षरु तो किं लक्षणु| हा अभिप्रायो संपूर्णु| विवंचूं गा || ४७७||
तरी महदहंकारा- | लागुनियां धनुर्धरा| तृणांतींचा पांगोरा- | वरी पैं गा || ४७८||
जें कांहीं सानें थोर| चालतें अथवा स्थिर| किंबहुना गोचर| मनबुद्धींसि जें || ४७९||
जेतुलें पांचभौतिक घडतें| जें नामरूपा सांपडतें| गुणत्रयाच्या पडतें| कामठां जें || ४८०||
भूताकृतीचें नाणें| घडत भांगारें जेणें| काळासि जूं खेळणें| जिहीं कवडां || ४८१||
जाणणेंचि विपरीतें| जें जें कांहीं जाणिजेतें| जें प्रतिक्षणीं निमतें| होऊनियां || ४८२||
अगा काढूनि भ्रांतीचे दांग| उभवी सृष्टीचें आंग| हें असो बहु जग| जया नाम || ४८३||
पैं अष्टधा भिन्न ऐसें| जें दाविलें प्रकृतिमिसें| जें क्षेत्रद्वारां छत्तिसें| भागी केलें || ४८४||
हें मागील सांगों किती| अगा आतांचि जें प्रस्तुतीं| वृक्षाकार रूपाकृती| निरूपिलें || ४८५||
तें आघवेंचि साकारें| कल्पुनी आपणपयां पुरे| जालें असें तदनुसारें| चैतन्यचि || ४८६||
जैसा कुहां आपणचि बिंबें| सिंह प्रतिबिंब पाहतां क्षोभे| मग क्षोभला समारंभें| घाली तेथ || ४८७||
कां सलिलीं असतचि असे| व्योमावरी व्योम बिंबे जैसें| अद्वैत होऊनि तैसें| द्वैत घेपे || ४८८||
अर्जुना गा यापरी| साकार कल्पूनि पुरीं| आत्मा विस्मृतीचि करी| निद्रा तेथ || ४८९||
पैं स्वप्नीं सेजार देखिजे| मग पहुडणें जैसें तेथ कीजे| तैसें पुरीं शयन देखिजे| आत्मयासी || ४९०||
पाठीं तिये निद्रेचेनि भरें| मी सुखी दुःखी म्हणत घोरें| अहंममतेचेनि थोरें| वोसणायें सादें || ४९१||
हा जनकु हे माता| हा मी गौर हीन पुरता| पुत्र वित्त कांता| माझें हें ना || ४९२||
ऐसिया वेंघोनि स्वप्ना| धांवत भवस्वर्गाचिया राना| तया चैतन्या नाम अर्जुना| क्षर पुरुषु गा || ४९३||
आतां ऐक क्षेत्रज्ञु येणें| नामें जयातें बोलणें| जग जीवु कां म्हणे| जिये दशेतें || ४९४||
जो आपुलेनि विसरें| सर्व भूतत्वें अनुकरें| तो आत्मा बोलिजे क्षरें| पुरुष नामें || ४९५||
जे तो वस्तुस्थिती पुरता| म्हणौनि आली पुरुषता| वरी देहपुरीं निदैजतां| पुरुषनामें || ४९६||
आणि क्षरपणाचा नाथिला| आळु यया ऐसेनि आला| जे उपाधींचि आतला| म्हणौनियां || ४९७||
जैसी खळाळीचिया उदका- | सरसीं आंदोळे चंद्रिका| तैसा विकारां औपाधिका| ऐसाचि गमे || ४९८||
कां खळाळु मोटका शोषे| आणि चंद्रिका तैं सरिसींच भ्रंशे| तैसा उपाधिनाशीं न दिसे| उपाधिकु || ४९९||
ऐसें उपाधीचेनि पाडें| क्षणिकत्व यातें जोडे| तेणें खोंकरपणें घडे| क्षर हें नाम || ५००||
एवं जीवचैतन्य आघवें| हें क्षर पुरुष जाणावें| आतां रूप करूं बरवें| अक्षरासी || ५०१||
तरी अक्षरु जो दुसरा| पुरुष पैं धनुर्धरा| तो मध्यस्थु गा गिरिवरां| मेरु जैसा || ५०२||
जे तो पृथ्वी पाताळ स्वर्गीं| इहीं न भेदे तिहीं भागीं| तैसा दोहीं ज्ञानाज्ञानांगीं| पडेना जो || ५०३||
ना यथार्थज्ञानें एक होणें| ना अन्यथात्वें दुजें घेणें| ऐसें निखिळ जें नेणणें| तेंचि तें रूप || ५०४||
पांसुता निःशेष जाये| ना घटभांडादि होये| तया मृत्पिंडा ऐसें आहे| मध्यस्थ जें || ५०५||
पैं आटोनि गेलिया सागरु| मग तरंगु ना नीरु| तया ऐशी अनाकारु| जे दशा गा || ५०६||
पार्था जागणें तरी बुडे| परी स्वप्नाचें कांहीं न मांडे| तैसिये निद्रे सांगडें| न्याहाळणें जें || ५०७||
विश्व आघवेंचि मावळे| आणि आत्मबोधु तरी नुजळे| तिये अज्ञानदशे केवळे| अक्षरु नाम || ५०८||
सर्वां कळीं सांडिलें जैसें| चंद्रपण उरे अंवसे| रूप जाणावें तैसें| अक्षराचें || ५०९||
पैं सर्वोपाधिविनाशें| हे जीवदशा जेथ पैसे| फळपाकांत जैसें| झाड बीजीं || ५१०||
तैसें उपाधी उपहित| थोकोनि ठाके जेथ| तयातें अव्यक्त| बोलती गा || ५११||
घन अज्ञान सुषुप्ती| तो बीजभावो म्हणती| येर स्वप्न हन जागृती| फळभावो तयाचा || ५१२||
जयासी कां बीजभावो| वेदांतीं केला ऐसा आवो| तो तया पुरुषा ठावो| अक्षराचा || ५१३||
जेथूनि अन्यथाज्ञान| फांकोनि जागृति स्वप्न| नानाबुद्धीचें रान| रिगालें असे || ५१४||
जीवत्व जेथुनी किरीटी| विश्व उठतचि उठी| ते उभय भेदांची मिठी| अक्षरु पुरुषु || ५१५||
येरु क्षर पुरुषु कां जनीं| जिहीं खेळे जागृतीं स्वप्नीं| तिया अवस्था जो दोन्ही| वियाला गा || ५१६||
पैं अज्ञानघनसुषुप्ती| ऐसैसी जे कां ख्याती| या उणी एकी प्राप्ती| ब्रह्माची जे || ५१७||
साचचि पुढती वीरा| जरी न येतां स्वप्न जागरा| तरी ब्रह्मभावो साचोकारा| म्हणों येता || ५१८||
परी प्रकृतिपुरुषें दोनी| अभ्रें जालीं जियें गगनीं| क्षेत्रक्षेत्रज्ञु स्वप्नीं| देखिला जियें || ५१९||
हें असो अधोशाखा| या संसाररूपा रुखा| मूळ तें रूप पुरुषा| अक्षराचें || ५२०||
हा पुरुषु कां म्हणिजे| जे पूर्णपणेंचि निजें| पैं मायापुरीं पहुडिजे| तेणेंही बोलें || ५२१||
आणि विकारांची जे वारी| ते विपरीत ज्ञानाची परी| नेणिजे जिये माझारीं| ते सुषुप्ती गा हा || ५२२||
म्हणौनि यया आपैसें| क्षरणें या नसे| आणिकेंही हा न नाशे| ज्ञानाउणें || ५२३||
यालागीं हा अक्षरु| ऐसा वेदांतीं डगरु| केला देशी थोरु| सिद्धांताच्या || ५२४||
ऐसें जीवकार्य कारण| जया मायासंगुचि लक्षण| अक्षर पुरुषु जाण| चैतन्य तें || ५२५||
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः || यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः || १७||
आतां अन्यथाज्ञानीं| या दोनी अवस्था जया जनीं| तया हरपती घनीं| अज्ञानतत्त्वीं || ५२६||
तें अज्ञान ज्ञानीं बुडालिया| ज्ञानें कीर्तिमुखत्व केलिया| जैसा वन्हि काष्ठ जाळूनियां| स्वयें जळे || ५२७||
तैसें अज्ञान ज्ञानें नेलें| आपण वस्तु देऊनि गेलें| ऐसें जाणणेंनिवीण उरलें| जाणतें जें || ५२८||
तें तो गा उत्तम पुरुषु| जो तृतीय कां निष्कर्षु| दोहींहून आणिकु| मागिला जो || ५२९||
सुषुप्तीं आणि स्वप्ना- | पासूनि बहुवें अर्जुना| जागणें जैसें आना| बोधाचेंचि || ५३०||
कां रश्मी हन मृगजळा- | पासूनि अर्कमंडळा| अफाटु तेवीं वेगळा| उत्तमु गा || ५३१||
हें ना काष्ठींचा काष्ठाहुनी| अनारिसा जैसा वन्ही| तैसा क्षराक्षरापासुनी| आनचि तो || ५३२||
पैं ग्रासूनि आपली मर्यादा| एक करीत नदीनदां| उठी कल्पांतीं उदावादा| एकार्णवाचा || ५३३||
तैसें स्वप्न ना सुषुप्ती| ना जागराची गोठी आथी| जैसी गिळिली दिवोराती| प्रळयतेजें || ५३४||
मग एकपण ना दुजें| असें नाहीं हें नेणिजे| अनुभव निर्बुजे| बुडाला जेथें || ५३५||
ऐसें आथि जें कांहीं| तें तो उत्तम पुरुषु पाहीं| जें परमात्मा इहीं| बोलिजे नामीं || ५३६||
तेंही एथ न मिसळतां| बोलणें जीवत्वें पंडुसुता| जैसी बुडणेयाची वार्ता| थडियेचा कीजे || ५३७||
तैसें विवेकाचिये कांठीं| उभें ठाकलिया किरीटी| परावराचिया गोठी| करणें वेदां || ५३८||
म्हणौनि पुरुषु क्षराक्षरु| दोन्ही देखोनि अवरु| यातें म्हणती परु| आत्मरूप || ५३९||
अर्जुना ऐसिया परी| परमात्मा शब्दवरी| सूचिजे गा अवधारीं| पुरुषोत्तमु || ५४०||
एऱ्हवीं न बोलणेंचि बोलणें| जेथिंचें सर्व नेणिवा जाणणें| कांहींच न होनि होणें| जे वस्तु गा || ५४१||
सोऽहं तेंही अस्तवलें| जेथ सांगतेंचि सांगणें जालें| द्रष्टत्वेंसी गेलें| दृश्य जेथ || ५४२||
आतां बिंबा आणि प्रतिबिंबा- | माजीं कैंची हें म्हणों नये प्रभा ? | जऱ्ही कैसेनि हे लाभा| जायेचि ना || ५४३||
कां घ्राणा फुला दोहीं| द्रुती असे जे माझारिलां ठायीं| ते न दिसे तरी नाहीं| ऐसें बोलों नये || ५४४||
तैसें द्रष्टा दृश्य हें जाये| मग कोण म्हणे काय आहे| हेंचि अनुभवें तेंचि पाहें| रूप तया || ५४५||
जो प्रकाश्येंवीण प्रकाशु| ईशितव्येंवीण ईशु| आपणेंनीचि अवकाशु| वसवीत असे जो || ५४६||
जो नादें ऐकिजता नादु| स्वादें चाखिजता स्वादु| जो भोगिजतसे आनंदु| आनंदेंचि || ५४७||
जो पूर्णतेचा परिणामु| पुरुषु गा पुरुषोत्तमु| विश्रांतीचाही विश्रामु| विराला जेथें || ५४८||
सुखासि सुख जोडिलें| जें तेज तेजासि सांपडलें| शून्यही बुडालें| महाशून्यीं जिये || ५४९||
जो विकासाहीवरी उरता| ग्रासातेंही ग्रासूनि पुरता| जो बहुतें पाडें बहुतां- | पासूनि बहु || ५५०||
पैं नेणतयाप्रती| रुपेपणाची प्रतीती| रुपें न होनि शुक्ती| दावी जेवीं || ५५१||
कां नाना अलंकारदशे| सोनें न लपत लपालें असे| विश्व न होनियां तैसें| विश्व जो धरी || ५५२||
हें असो जलतरंगा| नाहीं सिनानेपण जेवीं गा| तेवीं दिसता प्रकाशु जगा| आपणचि जो || ५५३||
आपुलिया संकोचविकाशा| आपणचि रूप वीरेशा| हा जळीं चंद्र हन जैसा| समग्र गा || ५५४||
तैसा विश्वपणें कांहीं होये| विश्वलोपीं कहीं न जाये| जैसा रात्रीं दिवसें नोहे| द्विधा रवि || ५५५||
तैसा कांहींचि कोणीकडे| कायिसेनिहि वेंचीं न पडे| जयाचें सांगडें| जयासीचि || ५५६||
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः |
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः || १८||
जो आपणपेंचि आपणया| प्रकाशीतसे धनंजया| काय बहु बोलों जया| नाहीं दुजें || ५५७||
तो गा मी निरुपाधिकु| क्षराक्षरोत्तमु एकु| म्हणौनि म्हणे वेद लोकु| पुरुषोत्तमु || ५५८||
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् |
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत || १९||
परी हें असो ऐसिया| मज पुरुषोत्तमातें धनंजया| जाणे जो पाहलेया| ज्ञानमित्रें || ५५९||
चेइलिया आपुलें ज्ञान| जैसें नाहींचि होय स्वप्न| तैसें स्फुरतें त्रिभुवन| वावों जालें || ५६०||
कां हातीं घेतलिया माळा| फिटे सर्पाभासाचा कांटाळा| तैसा माझेनि बोधें टवाळा| नागवे तो || ५६१||
लेणें सोनेंचि जो जाणें| तो लेणेंपण तें वावो म्हणे| तेवीं मी जाणोनि जेणें| वाळिला भेदु || ५६२||
मग म्हणे सर्वत्र सच्चिदानंदु| मीचि एकु स्वतःसिद्धु| जो आपणेनसीं भेदु| नेणोनियां जाणे || ५६३||
तेणेंचि सर्व जाणितलें| हेंही म्हणणें थेंकुलें| जे तया सर्व उरलें| द्वैत नाहीं || ५६४||
म्हणौनि माझिया भजना| उचितु तोचि अर्जुना| गगन जैसें आलिंगना| गगनाचिया || ५६५||
क्षीरसागरा परगुणें| कीजे क्षीरसागरचिपणें| अमृतचि होऊनि मिळणें| अमृतीं जेवीं || ५६६||
साडेपंधरा मिसळावें| तैं साडेपंधरेंचि होआवें| तेवीं मी जालिया संभवे| भक्ति माझी || ५६७||
हां गा सिंधूसि आनी होती| तरी गंगा कैसेनि मिळती ? | म्हणौनि मी न होतां भक्ती| अन्वयो आहे ? || ५६८||
ऐसियालागीं सर्व प्रकारीं| जैसा कल्लोळु अनन्यु सागरीं| तैसा मातें अवधारीं| भजिन्नला जो || ५६९||
सूर्या आणि प्रभे| एकवंकी जेणें लोभें| तो पाडु मानूं लाभे| भजना तया || ५७०||
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ || एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात् कृतकृत्यश्च भारत || २०||
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुरुषोत्तम योगोनाम पंचदशोऽध्यायः || १५अ ||
एवं कथिलयादारभ्य| हें जें सर्व शास्त्रैकलभ्य| उपनिषदां सौरभ्य| कमळदळां जेवीं || ५७१||
हें शब्दब्रह्माचें मथितें| श्रीव्यासप