॥ रामाष्टकम् ३ ॥

भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम् । स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम् ॥ १॥ जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकम् । स्वभक्तभीतिभङ्जनं भजे ह राममद्वयम् ॥ २॥ निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम् । समं शिवं निरञ्जनं भजे ह राममद्वयम् ॥ ३॥ सहप्रपञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम् । निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम् ॥ ४॥ निष्प्रपञ्चनिर्विकल्पनिर्मलं निरामयम्॥ चिदेकरूपसन्ततं भजे ह राममद्वयम् ॥ ५॥ भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम् । गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम् ॥ ६॥ महावाक्यबोधकैर्विराजमनवाक्पदैः । परब्रह्म व्यापकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ७॥ शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम् । विराजमानदैशिकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ८॥ रामाष्टकं पठति यः सुकरं सुपुण्यं व्यासेन भाषितमिदं शृणुते मनुष्यः । विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥ ९॥ ॥ इति श्रीव्यासविरचितं रामाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
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% Latest update         : December 28, 2012
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