॥ श्रीविष्णु एवं श्रीलक्ष्मि अभेदता ॥
श्रीविष्णुपुराणम्-प्रथमांशः/अध्यायः ८
पराशर उवाच ।
कथितस्तामसः सर्गो ब्रह्मणस्ते महामुने
रुद्रसर्ग प्रवक्ष्यामि तन्मे निगदतः श्वृगु ॥ ८. १ ॥
कल्पादावात्मनस्तुल्य सुतं प्रध्यायतस्ततः ।
प्रादुरासीत् प्रभोरङ्क कुमारो नीललोहितः ॥ ८. २ ॥
रुदन् वै सुस्वरं सोऽथ द्रवंश्च द्रिजसतम ।
किं रोदिषीति तं ब्रह्मा रुदन्तं प्रत्युवाच ह ॥ ८. ३ ॥
नाम देहीति तं सोऽथ प्रत्युवाच प्रजापतिम् ।
रुद्रस्त्वं देव नाम्नासि मा रोदीर्धैर्य मावह ॥ ८. ४ ॥
एवमुक्तः पुनः सोऽथ सप्तकृत्वो रुरोद वै ।
ततोऽन्यानि तदौ तस्मै सप्त नामानि वै प्रभुः ।
स्थानानि चैषामष्टानां पत्नीः पुत्रांश्च वै प्रभुः ॥ ८. ५ ॥
भवं सर्व्व महेशानं तथा पशुपतिं द्रिज ।
भममुग्रं महादेवं उवाच स पितामहः ॥ ८. ६ ॥
चक्र नामान्यथ तानि स्थानान्येषां चकार सः ।
सूर्य्यो जलं मही वह्निर्वायुराकाशमेव च ।
दीक्षितो ब्राह्मणः सोम इत्येतास्तनवः क्रमात् ॥ ८. ७ ॥
सुवर्चला तथैवोमा सुकेशी चापरा शिवा ।
स्वाहा दिशस्तथा दीक्षा रोहणी च यथाक्रमम् ॥ ८. ८ ॥
सूर्य्यदीनां नरश्वेष्ठ रुद्राद्य नैमिभिः सह ।
पल्यः स्मृता महाभाग तदपत्यानि मे श्वृणु ।
येषां सूतिप्रसूतैर्वा इदमापूरितं जगत् ॥ ८. ९ ॥
शनैश्वरस्तथा शुक्रो लोहिताङ्गो मनोजवः ।
स्कन्दः खर्गोऽथ सन्तानो बुधश्वानुक्रमात् सुताः ॥ ८. १० ॥
एवम्प्रकारो रुद्रोऽसौ सतीं भार्य्यामविन्दत ।
दक्षकोपाज्व तत्याज सा सती स्वं कलेवरम् ॥ ८. ११ ॥
हिमवद्दु हिता साभून्मेनायां द्रिजसतम ।
उपयेमे पुनश्वोमामनन्यां भगवात् भवः ॥ ८. १२ ॥
देवौ धातृविधातारौ भृगोः ख्यातिरसूयत ।
श्वियञ्च देवदेवस्य पली नारायणस्य या ॥ ८. १३ ॥
मैत्रेय उवाच ।
क्षीराब्धौ श्रीः समुत्पन्ना श्रू यतेऽमृतमन्थने ।
भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्नेत्येतदाह कथं भवान् ॥ ८. १४ ॥
पराशर उवाच ।
नित्यैव सा जगन्माता बिष्णोः श्रीरनपायिनी ।
यथा सर्वगतो विष्णुस्तथैवेयं द्रिजोत्तम ॥ ८. १५ ॥
अर्थो विष्णुरिय वाणी नीतिरेषा नयो हरिः ।
बोधो विष्णुरियं बुद्धिर्धम्मोऽसौ सतक्रिया त्वियम् ॥ ८. १६ ॥
स्त्रष्टा विश्णुंरियं सृष्टिः श्रीर्भूमिर्भूधरो हरिः ।
सन्तोषो भगवान् लक्ष्मीस्तुष्टिर्मैत्रेय शाश्वती ॥ ८. १७ ॥
इच्छा श्रीर्भगवान् कामो यज्ञोऽसौ दक्षिणा तुसा ।
आज्याहुतिरसौ देवी पुरोडाशो जनार्द्द नः ॥ ८. १८ ॥
पलीशाला मुने लक्ष्मीः प्राग्वंशो मधुसूदनः ।
चितिर्लक्ष्मीर्हरिर्यूप इध्मा श्रीर्भगवान् कुशः ॥ ८. १९ ॥
सामखरूपी भगवानुदगीतिः कमलालया।
चितिर्लक्ष्मीर्जगन्नाथो वासुदेवो हुताशनः ॥ ८. २० ॥
शङ्गरो भगवाञ्छौरिर्भूतिर्गौरी द्रिजोत्तम ।
मैत्रेय कैशवः सूर्य्यस्ततूप्रभा कमालालया ॥ ८. २१ ॥
विष्णुः पितृगणः पझा स्वधा शाश्वततुष्टिदा ।
द्यौः श्रीः सर्व्वात्मको विष्णुरवकाशोऽतिविस्तरः ॥ ८. २२ ॥
शशाङ्कः श्रीधरः कान्तिः श्रीस्तस्थैवानपायिनी ।
धृतिर्सक्ष्मीर्जगज्वेष्टा वायुः सर्व्वन्नगो हरिः ॥ ८. २३ ॥
जलधिर्द्रिज गोविन्दस्तद्रलो श्रीर्महामते ।
लक्ष्मीस्वरूपमिन्द्राणी देवन्द्रो मधुसूदनः ॥ ८. २४ ॥
यमश्वक्रधरः साक्षादू धूमोर्णा कमलालया ।
ऋद्धिः श्रीः श्रीधरो देवः स्वयमेव धनेश्वरः ॥ ८. २५ ॥
गौरी लक्ष्मीर्महाभागा केशवो वरुणः स्वयम् ।
श्रीर्देवसेना विप्रेन्द्र देवसेनापतिर्हरिः ॥ ८. २६ ॥
अवष्टम्भो गदापाणिः शक्तिर्लक्ष्मीर्द्रिजोत्तम ।
काष्ठा लक्ष्मीर्निमेषोऽसौ मुहूर्त्तोऽसौ कला तु सा ॥ ८. २७ ॥
ज्योत्स्ना लक्ष्मीः प्रदीपोऽसौ सर्व्वः सर्व्वेश्वरो हरिः ।
लताभूता जगनामाता श्रीविंष्णुर्द्रुमसंस्थितः ॥ ८. २८ ॥
विभावरी श्रीर्दिवसो देवश्चक्रगदाधरः ।
वरप्रदो वरोविष्णर्वधूः पझवनालया ॥ ८. २९ ॥
नदस्वरूपी भगवाञ्छोर्नदीरूपसंस्थितिः ।
ध्वजश्च पुण्डरीकाक्षः पताका कमालालया ॥ ८. ३० ॥
तृष्णालक्ष्मीर्जगत्स्वामी लोभो नारायणः परः ।
रति-रागौ च धर्मज्ञ लक्ष्मीर्गोविन्द एव च ॥ ८. ३१ ॥
किञ्चातिबहुनोक्तन संक्षेपेणेदमुच्यते ।
देवतिर्य्यङूमनुष्यादौ पुंनाम्नि भगवान् हरिः ।
स्त्रोनाम्नि लक्ष्मीर्मैत्रेय नानयोर्बिद्यते परम् ॥ ८. ३२ ॥
श्रीविष्णुपुराण प्रथमांश आठवाँ अध्याय
श्री विष्णू भगवान ओर् जगन्माता श्री एवं लक्ष्मीजी की अभेदता
श्रीपराशरजी बोले-हे महामुने । मैने तुमसे ब्रह्माजीके तामस-सर्गका
वर्णन किया, अब मैं रुद्रसर्गका वर्णन करता हूँ, सो सुनो ॥ ८. १ ॥
कल्पके आदिमें अपने समान पुत्र उत्पन्न होनेके लिये चिन्तन करते हुए
ब्रह्माजीकी गोदमें नीललोहति वर्णके एक कुमारका प्रादुर्भाव हुआ ॥ ८. २ ॥
हे द्विजोत्तम । जन्मके अनन्तर ही वह जोर जोरसे रोने और
इधर-उधर दौडने लगा । उसे रोता देख ब्रह्माजीने उससे
पूछ-' ' तू क्यों रोता है ? ' ' ॥ ८. ३ ॥
उसने कहा-' ' मेरा नाम रखो।' ' तब ब्रह्माजी बोले-' हे देव । तेरा
नाम रुद्र है, अब तू मत रो, धैर्य धारण कर ।' ऐसा कहनेपर
भी वह सात बार और रोया ॥ ८. ४ ॥
तब भगवान् ब्रह्माजीने उसके सात नाम और रखे; तथा उन आठोंके
स्थान, स्त्री और पुत्र भी निश्र्चित किये ॥ ८. ५ ॥
हे द्विज । प्रजापतिने उसे भव, शर्व, ईशान, पशुपति, भीम,
उग्र और महादेव कहकर सम्बोधन किया ॥ ८. ६ ॥
यही उसके नाम रखे और इनके स्थान भी निश्र्चित किये । सूर्य,
जल, पृथिवी, वायु, अग्नि, आकाश, [ यज्ञमें ] दीक्षित ब्राह्नण
और चन्द्रमा-दे क्रमशः उनकी मूर्तियाँ हैं ॥ ८. ७ ॥
हे द्विजश्रेष्ठ । रुद्र आदि नामोंके साथ उन सूर्य आदि मूर्तियोंकी
क्रमशः सुवर्चला, ऊषा, विकेशी, अपरा, शिवा, स्वाहा, दिशा, दीक्षा
और रोहिणी नामकी पत्नियाँ हैं । हे महाभाग । अब उनके पुत्रोंके
नाम सुनो; उन्हींके पुत्र-पौत्रादिकोंसे यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण
है ॥ ८. ८-१० ॥
शनैश्र्चर, शुक्र, लेहिताङ्ग, मनोजव, स्कन्द, सर्ग, सन्तान
और बुध-ये क्रमशः उनके पुत्र हैं ॥ ८. ११ ॥
ऐसे भगवान् रुद्रने प्रजापति दक्षकी अनिन्दिता पुत्री सतीको अपनी
भार्यारूपसे ग्रहण किया ॥ ८. १२ ॥
हे द्विजसत्तम । उस सतीने दक्षपर कुपित होनेके कारण अपना
शरीर त्याग दिया था । फिर वह मेनाके गर्भसे हिमाचलकी पुत्री
(उमा ) हुई । भगवान् शंकरने उस अनन्यपरायणा उमासे फिर भी
विवाह किया ॥ ८. १३-१४ ॥
भृगुके द्वारा ख्यातिने धाता और विधातानामक दो देवताओंको तथा
लक्ष्मीजीको जन्म दिया जो भगवान् विष्णुकी पत्नी हुईं ॥ ८. १५ ॥
श्रीमैत्रेयजी बोले-भगवन् । सुना जाता है कि लक्ष्मीजी तो
अमृत-मन्थनके समय क्षीर-सागरसे उत्पन्न हुई थीं, फिर आप
ऐसा कैसे कहते हैं कि वे भृगुके द्वारा ख्यातिसे उत्पन्न हुईं ॥ ८. १६ ॥
श्रीपराशरजी बोले-हे द्वेजोत्तम । भगवानका कभी संग न
छोडनेवाली जगज्जननी लक्ष्मीजी तो नित्य ही हैं और जिस प्रकार
श्रीविष्णुभगवान् सर्वव्यापक हैं वैसे ही ये भी हैं ॥ ८. १७ ॥
विष्णु अर्थ हैं और ये वाणी हैं, हरि नियम हैं और ये नीति हैं,
भगवान् विष्णु बोध हैं और ये बुद्धि हैं तथा वे धर्म हैं और
ये सत्क्रिया हैं ॥ ८. १८ ॥
हे मैत्रेय । भगवान् जगतके स्त्रष्टा हैं और लक्ष्मीजी सृष्टि
हैं, श्रीहरि भूधर (पर्वत अथवा राजा ) हैं और लक्ष्मीजी
भूमि हैं तथा भगवान् सन्तोष हैं और लक्ष्मीजी नित्य-तुष्टि
हैं ॥ ८. १९ ॥
भगवान् काम हैं और लक्ष्मीजी इच्छी हैं, वे यज्ञ हैं और ये
दक्षिणा हैं, श्रीजनार्दन पुरोडाश हैं और देवी लक्ष्मीजी आज्याहुति
(घृतकी आहुति ) हैं ॥ ८. २० ॥
हे मुने । मधुसूदन यजमानगृह हैं और लक्ष्मीजी पत्नीशाला हैं,
श्रीहरि यूप हैं और लक्ष्मीजी चिति हैं तथा भगवान् कुशा हैं
और लक्ष्मीजी इध्मा हैं ॥ ८. २१ ॥
भगवान् सामस्वरूप हैं और श्रीकमलादेवी उद्गीति हैं, जगत्पति
भगवान् वासुदेव हुताशन हैं और लक्ष्मीजी स्वाहा हैं ॥ ८. २२ ॥
हे द्विजोत्तम । भगवान् विष्णु शंकर हैं और श्रीलक्ष्मीजी गौरी
हैं तथा हे मैत्रेय । श्रीकेशव सूर्य हैं और कमलवासिनी
श्रीलक्ष्मीजी उनकी प्रभा हैं ॥ ८. २३ ॥
श्रीविष्णु पितृगण हैं और श्रीकमला नित्य पुष्टिदायिनी स्वधा हैं,
विष्णु अति विस्तीर्ण सर्वात्मक अवकाश हैं और लक्ष्मीजी स्वर्गलोक
हैं ॥ ८. २४ ॥
भगवान् श्रीधर चन्द्रमा हैं और श्रीलक्ष्मीजी उनकी अक्षय कान्ति
हैं, हरि सर्वगामी वायु हैं और लक्ष्मीजी जगञ्चेष्टा (जगतकी
गति ) और धृति (आधार ) हैं ॥ ८. २५ ॥
हे महामुने । श्रीगोविन्द समुद्र हैं और हे द्विज । लक्ष्मीजी उसकी
तरङ्ग हैं, भगवान् मधुसूदन देवराज इन्द्र हैं और लक्ष्मीजी
इन्द्राणी हैं ॥ ८. २६ ॥
चक्रपाणि भगवान् यम हैं और श्रीकमला यमपत्नी धूमोर्णा हैं,
देवाधिदेव श्रीविष्णु कुबेर हैं और श्रीलक्ष्मीजी साक्षात् ऋद्धि
हैं ॥ ८. २७ ॥
श्रीकेशव स्वयं वरुण हैं और महाभागा लक्ष्मीजी गौरी हैं, हे
द्विजराज । श्रीहरि देवसेनापति स्वामिकार्तिकेय हैं और श्रीलक्ष्मीजी
देवसेना हैं ॥ ८. २८ ॥
हे द्वेजोत्तम । भगवान् गदाधर आश्रय हैं और लक्ष्मीजी शक्ति
हैं, भगवान् निमेष हैं और लक्ष्मीजी काष्ठा हैं, वे मुहूर्त हैं
और ये कला हैं ॥ ८. २९ ॥
सर्वेश्र्वर सर्वरूप श्रीहरि दीपक हैं और श्रीलक्ष्मीजी ज्योति हैं,
श्रीविष्णु वृक्षरूप हैं और जगन्माता श्रीलक्ष्मीजी लता हैं,
॥ ८. ३० ॥
चक्रगदाधरदेव श्रीविष्णु दिन हैं और लक्ष्मीजी रात्रि हैं,
वरदायक श्रीहरि वर हैं और पट्ननिवासिनी श्रीलक्ष्मीजी वधू
हैं ॥ ८. ३१ ॥
भगवान् नद हैं और श्रीजी नदी हैं, कमलनयन भगवान् ध्वजा
हैं और कमलालया लक्ष्मीजी पताका हैं ॥ ८. ३२ ॥
जगदीश्र्वर परमात्मा नारायण लोभ हैं और लक्ष्मीजी तृष्णा
हैं तथा हे मैत्रेय । रति और राग भी साक्षात् श्रीलक्ष्मी और
गोविन्दरूप ही हैं ॥ ८. ३३ ॥
अधिक क्या कहा जाय ? संक्षेपमें, यह कहना चाहिये कि देव, तिर्यक्
और मनुष्य आदिमें पुरुषवाची भगवान् हरि हैं और स्त्रीवाची
श्रीलक्ष्मीजी, इनके परे और कोई नहीं है ॥ ८. ३४-३५ ॥
shrIviShNupurANam-prathamAMshaH adhyAyaH 8
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