हरितालक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावलिः

हरितालक्ष्म्यष्टोत्तरशतनामावलिः

यह स्तोत्र हरितवर्णा, वनस्वामिनी, करुणारूपिणी, औषधिशक्ति और भूमिशक्तिरूपी हरिताभ लक्ष्मी को समर्पित है । इस स्तोत्र में देवी लक्ष्मी को पृथ्वी की हरियाली, जीवनदायिनी ऊर्जा, समृद्धि और शान्ति की एवं सृष्टि की-आधारशक्तिरूप में भावना की गई है । १. ॐ ह्रीं श्रीं हरिताभायै नमः । २. ॐ हरिताभायै लक्ष्म्यै मरकतप्रभायै नमः । वनलक्ष्म्यै तुलस्यै च भूम्यै च औषधेश्वर्यै नमः । हरिता लक्ष्मी के पूर्ण १०८ नाममाला, जप के लिए उपयुक्त। नामावली । प्रत्येक नाम में हरित-वर्णा, वनस्पतिशक्ति, औषधिशक्ति, भूमिशक्ति, अन्नशक्ति, शान्ति, वृष्टि और जीवनदायिनी लक्ष्मी के रूपों का स्तवन है । १. ॐ श्रीं ह्रीं हरितायै नमः । २. ॐ श्रीं ह्रीं हरित-वनलक्ष्म्यै नमः । ३. ॐ श्रीं ह्रीं औषधिरूपिण्यै नमः । ४. ॐ श्रीं ह्रीं भूमिप्रदायै नमः । ५. ॐ श्रीं ह्रीं अन्नपूर्णायै नमः । ६. ॐ श्रीं ह्रीं शीतलच्छायायै नमः । ७. ॐ श्रीं ह्रीं वृक्षवल्लरीमातृकायै नमः । ८. ॐ श्रीं ह्रीं तुलसीवासिन्यै नमः । ९. ॐ श्रीं ह्रीं धरणीशक्त्यै नमः । १०. ॐ श्रीं ह्रीं जीवनदायिन्यै नमः । ११. ॐ श्रीं ह्रीं हरितगात्रायै नमः । १२. ॐ श्रीं ह्रीं पल्लविनीशक्त्यै नमः । १३. ॐ श्रीं ह्रीं वृक्षदेवतायै नमः । १४. ॐ श्रीं ह्रीं वनदेवतायै नमः । १५. ॐ श्रीं ह्रीं औषधिमातृकायै नमः । १६. ॐ श्रीं ह्रीं स्थावरलक्ष्म्यै नमः । १७. ॐ श्रीं ह्रीं सञ्जीवनीदेव्यै नमः । १८. ॐ श्रीं ह्रीं अमृता शक्त्यै नमः । १९. ॐ श्रीं ह्रीं वृष्टिरूपिण्यै नमः । २०. ॐ श्रीं ह्रीं धरणीतनयायै नमः । २१. ॐ श्रीं ह्रीं हरिप्रिया लक्ष्म्यै नमः । २२. ॐ श्रीं ह्रीं पीपलवासिन्यै नमः । २३. ॐ श्रीं ह्रीं कदम्बगन्धिन्यै नमः । २४. ॐ श्रीं ह्रीं अशोकप्रियायै नमः । २५. ॐ श्रीं ह्रीं वटमूलनिलयायै नमः । २६. ॐ श्रीं ह्रीं दूर्वाशक्त्यै नमः । २७. ॐ श्रीं ह्रीं तुलसीमालिन्यै नमः । २८. ॐ श्रीं ह्रीं गोधूमवर्णायै नमः । २९. ॐ श्रीं ह्रीं सप्तधान्यै नमः । ३०. ॐ श्रीं ह्रीं हरेः प्राणवल्लभायै नमः । ३१. ॐ श्रीं ह्रीं कुशशक्त्यै नमः । ३२. ॐ श्रीं ह्रीं कुशाम्बिकायै नमः । ३३. ॐ श्रीं ह्रीं मृत्तिकेधारिण्यै नमः । ३४. ॐ श्रीं ह्रीं हरिद्राप्रिया लक्ष्म्यै नमः । ३५. ॐ श्रीं ह्रीं सप्तपर्णप्रियायै नमः । ३६. ॐ श्रीं ह्रीं हरिपद्मालयायै नमः । ३७. ॐ श्रीं ह्रीं कनकवल्लरीमातृकायै नमः । ३८. ॐ श्रीं ह्रीं नीलपर्णायै नमः । ३९. ॐ श्रीं ह्रीं कर्पूरवल्लभायै नमः । ४०. ॐ श्रीं ह्रीं अमलकीप्रियायै नमः । ४१. ॐ श्रीं ह्रीं बिल्वेश्वरप्रियायै नमः । ४२. ॐ श्रीं ह्रीं सप्तवर्णलक्ष्म्यै नमः । ४३. ॐ श्रीं ह्रीं नित्यवनलक्ष्म्यै नमः । ४४. ॐ श्रीं ह्रीं नवलता-लसत्यै नमः । ४५. ॐ श्रीं ह्रीं लतावल्लरीसेव्यै नमः । ४६. ॐ श्रीं ह्रीं भूमि-धारिण्यै नमः । ४७. ॐ श्रीं ह्रीं पुष्पिण्यै नमः । ४८. ॐ श्रीं ह्रीं सस्यलक्ष्म्यै नमः । ४९. ॐ श्रीं ह्रीं अनाजवल्लभायै नमः । ५०. ॐ श्रीं ह्रीं सौम्यदायिन्यै नमः । ५१. ॐ श्रीं ह्रीं कारुण्यरूपिण्यै नमः । ५२. ॐ श्रीं ह्रीं वसुधासुतायै नमः । ५३. ॐ श्रीं ह्रीं जलनिधिनिलयायै नमः । ५४. ॐ श्रीं ह्रीं निर्झरिण्यै नमः । ५५. ॐ श्रीं ह्रीं नदीदेवतायै नमः । ५६. ॐ श्रीं ह्रीं चन्द्रिका-प्रभायै नमः । ५७. ॐ श्रीं ह्रीं अनग्निस्वरूपायै नमः । ५८. ॐ श्रीं ह्रीं वातरूपायै नमः । ५९. ॐ श्रीं ह्रीं हरिद्राप्रतिष्ठायै नमः । ६०. ॐ श्रीं ह्रीं गङ्गा-गौरीलक्ष्म्यै नमः । ६१. ॐ श्रीं ह्रीं सौभाग्यप्रदायै नमः । ६२. ॐ श्रीं ह्रीं आरोग्यदायिन्यै नमः । ६३. ॐ श्रीं ह्रीं सन्ततिप्रदायै नमः । ६४. ॐ श्रीं ह्रीं धनधान्यदायै नमः । ६५. ॐ श्रीं ह्रीं यशोवृद्धिप्रदायै नमः । ६६. ॐ श्रीं ह्रीं सौन्दर्यलक्ष्म्यै नमः । ६७. ॐ श्रीं ह्रीं वटवल्लरीलक्ष्म्यै नमः । ६८. ॐ श्रीं ह्रीं महौषधिलक्ष्म्यै नमः । ६९. ॐ श्रीं ह्रीं देववनप्रियायै नमः । ७०. ॐ श्रीं ह्रीं अरुणप्रभायै नमः । ७१. ॐ श्रीं ह्रीं हरिवल्लभायै नमः । ७२. ॐ श्रीं ह्रीं श्रीवल्लभायै नमः । ७३. ॐ श्रीं ह्रीं हरिता प्रसीदायै नमः । ७४. ॐ श्रीं ह्रीं ब्रह्माण्डशक्त्यै नमः । ७५. ॐ श्रीं ह्रीं श्रीसृष्टिकल्पायै नमः । ७६. ॐ श्रीं ह्रीं पुण्यवृक्षवासिन्यै नमः । ७७. ॐ श्रीं ह्रीं कल्पवृक्षायै नमः । ७८. ॐ श्रीं ह्रीं कल्पलतायै नमः । ७९. ॐ श्रीं ह्रीं विष्णुपत्न्यै नमः । ८०. ॐ श्रीं ह्रीं जगद्धात्र्यै नमः । ८१. ॐ श्रीं ह्रीं अनघायै नमः । ८२. ॐ श्रीं ह्रीं विघ्ननाशिन्यै नमः । ८३. ॐ श्रीं ह्रीं दारिद्र्यदाहिन्यै नमः । ८४. ॐ श्रीं ह्रीं सौम्यवपुषे नमः । ८५. ॐ श्रीं ह्रीं मृदुलायै नमः । ८६. ॐ श्रीं ह्रीं कल्याणरूपिण्यै नमः । ८७. ॐ श्रीं ह्रीं वनराज्यै नमः । ८८. ॐ श्रीं ह्रीं सुरवन्द्यायै नमः । ८९. ॐ श्रीं ह्रीं भूतदायिन्यै नमः । ९०. ॐ श्रीं ह्रीं शुद्धसत्त्वमयी लक्ष्म्यै नमः । ९१. ॐ श्रीं ह्रीं योगमायायै नमः । ९२. ॐ श्रीं ह्रीं वटपत्रवासिन्यै नमः । ९३. ॐ श्रीं ह्रीं हरितवर्णायै नमः । ९४. ॐ श्रीं ह्रीं विराजायै नमः । ९५. ॐ श्रीं ह्रीं सौम्यप्रदायै नमः । ९६. ॐ श्रीं ह्रीं शान्तिदायिन्यै नमः । ९७. ॐ श्रीं ह्रीं सुगन्धलक्ष्म्यै नमः । ९८. ॐ श्रीं ह्रीं चन्दनगन्धिन्यै नमः । ९९. ॐ श्रीं ह्रीं प्रीतिकरायै नमः । १००. ॐ श्रीं ह्रीं नवसम्पदायै नमः । १०१. ॐ श्रीं ह्रीं शुद्धप्रभायै नमः । १०२. ॐ श्रीं ह्रीं ब्रह्मरूपिण्यै नमः । १०३. ॐ श्रीं ह्रीं वनलक्ष्म्यै नमः । १०४. ॐ श्रीं ह्रीं मूलधारस्थितायै नमः । १०५. ॐ श्रीं ह्रीं अनङ्गवल्लभायै नमः । १०६. ॐ श्रीं ह्रीं रसदायिन्यै नमः । १०७. ॐ श्रीं ह्रीं अखिलविघ्नहन्त्र्यै नमः । १०८. ॐ श्रीं ह्रीं हरिताभे लक्ष्म्यै नमः । ``हरिताभा लक्ष्मी स्तोत्र'' एक अत्यन्त मङ्गलकारी स्तोत्र है, जो देवी लक्ष्मी के हरितवर्णा, करुणामयी, और जीवनदायिनी स्वरूप की स्तुति हेतु द्बारा रचा गया है । यह स्तोत्र विशेष रूप से उन रूपों की महिमा का गान करता है जिनके माध्यम से माँ लक्ष्मी वनस्पति, औषधि, भूमि, वन और तुलसी जैसी पवित्र सजीव शक्तियों में सजीव होकर समस्त सृष्टि को पोषण, स्थिरता, समृद्धि और आरोग्य प्रदान करती हैं । इस स्तोत्र में ``मरकतप्रभा लक्ष्मी'', ``भूमि लक्ष्मी'', ``वनलक्ष्मी'', ``तुलसी लक्ष्मी'', ``वनस्पति लक्ष्मी'', और ``औषध लक्ष्मी'' जैसे विविधरूपों का आह्वान कर, साधक देवी की करुणा, हरियाली, और जीवनशक्ति को अपने जीवन में आकर्षित करता है । यह स्तोत्र जीवन में प्रकृति के साथ समरसता, चित्त की शान्ति, कृषि-सम्पन्नता, निरोगता, और आत्मिक उन्नति के लिए विशेष रूप से उपयोगी है । यह स्तोत्र केवल वैभव और धन की कामना नहीं करता, अपितु यह हरितिमा के द्वारा जीवन की स्थायित्वपूर्ण सम्पन्नता और प्रकृति के संरक्षण की प्रेरणा देता है । देवी लक्ष्मी यहाँ केवल अलङ्करण की देवी नहीं, वरन् प्रकृति की सजीव आधारशक्ति हैं - जो प्रत्येक अङ्कुर, जड़, पत्ती, जलधारा और भूमि के कण में चेतन होकर नृत्य करती हैं । ``हरित लक्ष्मी स्तोत्र'' की आराधना से साधक न केवल स्थूल समृद्धि, बल्कि गहन आत्मिक शान्ति, प्राणीमात्र के प्रति करुणा, और सृष्टि के साथ गहन संवाद प्राप्त करता है । या देवी सर्वभूतेषु हरिताभारूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः । हरियाली तीज का महत्व हरियाली तीज एक महत्वपूर्ण हिन्दू त्योहार है । यह भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है। मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए बहुत कठिन तपस्या की थी। उन्होंने १०८ जन्मों तक तपस्या की और उसके बाद भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया। इस दिन पूजा करने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। जो महिलाएं इस दिन सच्चे मन से पूजा करती हैं, उनका वैवाहिक जीवन हमेशा खुशहाल रहता है । मां पार्वती को अर्पित करें सुहाग की सामग्री हरियाली तीज एक महत्वपूर्ण त्योहार है । इस दिन महिलाएं माता पार्वती की पूजा करती हैं, वे उनसे अपने सुखी वैवाहिक जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। मान्यता है कि इस दिन माता पार्वती को सोलह श्रृङ्गार की वस्तुएं अर्पित करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। पूजा में सबसे पहले भगवान शिव का गङ्गाजल या पवित्र जल से अभिषेक करें। फिर माता पार्वती को चूड़ी, बिन्दी, सिन्दूर, मेहन्दी और चुनरी जैसी चीजें अर्पित करें। इन चीजों से माता अत्यन्त प्रसन्न होती हैं और उनकी कृपा से दाम्पत्य जीवन में प्रेम, समृद्धि और सुख-शान्ति बनी रहती है। पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ता है, घर में सुख-शान्ति बनी रहती है और समृद्धि आती है । हरियाली तीज २०२५ में २७ जुलाई, रविवार को मनाई जाएगी। हिन्दू पञ्चाङ्ग के अनुसार, सावन शुक्ल तृतीया तिथि २६ जुलाई को रात १० बजकर ४१ मिनट पर शुरू होगी और यह तिथि २७ जुलाई को रात १० बजकर ४१ मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, हरियाली तीज २७ जुलाई को मनाई जाएगी। इस दिन रवि योग का शुभ संयोग भी बन रहा है, जो शाम ४ बजकर २३ मिनट से शुरू होकर २८ जुलाई को सुबह ५ बजकर ४० मिनट तक रहेगा। रवि योग में पूजापाठ करना और व्रत रखना बहुत ही शुभ फल देने वाला माना जाता है । हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है । विवाहित महिलाएं और अविवाहित लड़कियां दोनों ही इस व्रत को रखती हैं। हरियाली तीज का धार्मिक महत्व बहुत खास होता है। हरियाली तीज पर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा अर्चना करने का विशेष महत्व है। हरियाली तीज को श्रावणी तीज भी कहा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं तो वहीं कुंवारी कन्याएं शिवजी जैसा सुयोग्य वर पाने के लिए व्रत रखकर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं । श्री श्री विद्याधाम पीठाधीश्वर
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