श्रीहनुमत्प्रोक्तमन्त्रराजात्मकः रामस्तवः सार्थः
श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम् ।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्यु नमाम्यहम् ॥
हनुमानुवाच ।
तिरश्चामपि यो राजा समवायं समीयुषाम् ।
तथा सुग्रीवमुख्यानां यस्तं वन्द्यं नमाम्यहम् ॥ १॥
सकृदेव प्रसन्नाय विशिष्टायैव राज्यदः ।
विभीषणाय यो देवस्तं वीरं प्रणमाम्यहम् ॥ २॥
यो महापुरुषो व्यापी महाब्धौ कृतसेतुकः ।
स्तुतो येन जटायुश्च महाविष्णुं नमाम्यहम् ॥ ३॥
तेजसाप्यायिता यस्य ज्वलन्ति ज्वलनादयः ।
प्रकाशते स्वतन्त्रो यस्तं ज्वलन्तं नमाम्यहम् ॥ ४॥
सर्वतोमुखता येन लीलया दर्शिता रणे ।
राक्षसेश्वरयोधानां तं वन्दे सर्वतोमुखम् ॥ ५॥
नृभावं तु प्रपन्नानां हिनस्ति च सदा रुजम् ।
नृसिंहतनुमप्राप्तो यस्तं नृसिंहं नमाम्यहम् ॥ ६॥
यस्माद्विभ्यति वातार्कज्वलनेन्द्राः समृत्यवः ।
भयं तनोति पापानां भीषणं तं नमाम्यहम् ॥ ७॥
परस्य योग्यतां वीक्ष्य हरते पापसन्ततिम् ।
पुरस्य योग्यतां वीक्ष्य तं भद्रं प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥
यो मृत्युं निजदासानां मारयत्यतिचेष्टदः ।
तत्रापि निजदासार्थं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥ ९॥
यत्पादपद्मप्रणतो भवत्युत्तमपुरुषः ।
तमीशं सर्वदेवानां नमनीयं नमाम्यहम् ॥ १०॥
आत्मभावं समुत्क्षिप्य दास्यं चैव रघुत्तमम् ।
भजेऽहं प्रत्यहं रामं ससीतं सहलक्ष्मणम् ॥ ११॥
नित्यं श्रीरामभक्तस्य किङ्करा यमकिङ्कराः ।
शिववत्यो दिशस्तस्य सिद्धयस्तस्य दासिकाः ॥ १२॥
इदं हनुमता प्रोक्तं मन्त्रराजात्मकं स्तवम् ।
पठेदनुदिनं यस्तु स रामे भक्तिमान्भवेत् ॥ १३॥
॥ इति हनुमत्कल्पे श्रीहनुमन्मन्त्रराजात्मकस्तवराजः सम्पूर्णः ॥
श्रीहनुमत्प्रोक्तमन्त्रराजात्मकः रामस्तवः
हिन्दी भावार्थ
१. अपने मुख्य शत्रु रावणके विनाशके लिये जिन्होंने कपिराज सुग्रीवादि तिर्यक्-योनिमें उत्पन्न वानर-भालुओंकी सेना संगठित की (और सैन्य-शिक्षाके द्वारा उन्हें सुप्रबुद्ध कर लङ्कापर विजय प्राप्त कर ली), उन अति उग्र भगवान् रामको मैं नमस्कार करता हूँ ।
२. समुद्र-तटपर आये विभीषणको, केवल एक बार 'मैं आपकी शरण हूँ'- ऐसा कहनेपर जिन्होंने लङ्का आदिके राज्यसहित अपार वैभवको प्रदान किया, उन महावीर श्रीरामको मैं प्रणाम करता हूँ ।
३. जो सर्वव्यापक हैं, सबसे महान् हैं और देवता, ऋषि-मुनियोंसे भी पूजित हैं तथा महान् कृपा-सुधाके मूर्तिमान् स्वरूप हैं और उस कृपा-सुधासे जटायु तकको भी जिन्होंने संसिक्तकर मुक्त कर दिया, उन महाविष्णुस्वरूप भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ।
४. अग्नि, चन्द्रमा और सूर्य आदि तेजस्वी ज्योतिष्युञ्ज जिनके तेजसे ही प्रकाशित एवं प्रज्वलित होते हैं और जो स्वयं अपने तेजसे प्रकाशित होते हैं, उन प्रज्वलित तेजोमय-भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ।
५. रणस्थलमें खर-दूषण, त्रिशिरा आदि राक्षसोंसे युद्ध करते समय जिन्होंने अपनी लीलासे अपना मुखमण्डल सभी ओर दिखलाया (और सबका नाश कर दिया), उन सर्वतोमुख भगवान् रामकी मैं वन्दना करता हूँ ।
६. शरणमें आते ही जो मनुष्योंके सामान्य मोहमय मनुष्यभावको नष्टकर उन्हें लोकोत्तर ज्ञान एवं विशिष्ट दिव्य शक्तियोंसे सम्पन्न कर देते हैं और जो सम्पूर्ण विश्वमें सिंहके समान बली हैं, उन नरसिंह भगवान् रामको मैं नमन करता हूँ ।
७. जिनसे अग्नि, वायु, सूर्य, इन्द्र, यम आदि सभी भयभीत रहते हैं और पाप तो उनके भयसे सदा ही दूर भागता है, उन भीषण रामको मैं नमस्कार करता हूँ ।
८. जो अपने भक्तोंकी किसी योग्यता आदिकी अपेक्षा किये बिना ही अपने उदार-स्वभावके कारण सदा सब कुछ देते ही रहते हैं और जो नित्य मङ्गलस्वरूप हैं, उन परम भद्रस्वरूप सौजन्यमूर्ति भगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ।
९. जो अपने भक्तोंके मृत्युका समूलोच्छेदन कर उसकी सारी अभिलाषा पूर्ण कर देते हैं, इस सम्बन्धमें महर्षि वाल्मीकि जो पहले कभी व्याधका काम कर रहे थे, परम प्रमाण हैं, ऐसे मृत्युके भी मृत्यु भक्तवत्सल भगवान्को मैं प्रणाम करता हूँ ।
१०. जिनके चरण-कमलोंमें प्रणाम करते ही अधम पुरुष भी अति उत्तम पुरुष बन जाता है, उन जन्मादि षड्-विकारोंसे मुक्त, सभी देवताओंके द्वारा वन्दनीय भगवान् रामकी मैं वन्दना करता हूँ ।
११. मैं (हनुमान्) ब्रह्मैकात्म्य-भावका परित्याग कर दास्यभाव अर्थात् सेव्य-सेवककी भावनासे अहर्निश लक्ष्मणसहित श्रीसीतारामकी उपासना करता हूँ ।
१२. भगवान् श्रीरामके भक्तोंके लिये यमदूत भी सदाके लिये किंकर (सेवक- दास) बन जाते हैं, उसके लिये दसों दिशाएँ मङ्गलमयी हो जाती हैं और सभी सिद्धियाँ उसके चरणोंमें लोटती हैं ।
१३. श्रीहनुमान्जीद्वारा प्रोक्त इस मन्त्रराजात्मक स्तोत्रका जो पाठ करता है, वह भगवान् श्रीरामका भक्त हो जाता है ।
Notice that words in the first verse are strewn in the end of other verses.
This stotra is prescribed to be read daily in the chapter 1.9 of the Rama Rahasya Upanishad.
Encoded and Proofread by Ravin Bhalekar ravibhalekar@hotmail.com