श्रीविजयनारसिंहस्तुतिः

श्रीविजयनारसिंहस्तुतिः

भजदभयङ्कर भीमपराक्रम वीरनृसिंहविभो । खरनखरायुध पाहि परात्पर घोरतराघहर ॥ १॥ विष्फुरितालककेसरभासुर दीप्तललाटतट । फालविलोल विशङ्कट विष्फुरदग्नि विलोचन ! भो ॥ २॥ भ्रुकुटिभयङ्कर ! तरलिततारक केकरनेत्र जय । उद्गत निश्चल कर्णविलम्बित चन्द्ररविद्वय कर्णिक भो ॥ ३॥ विधुतसटारुण पटलतटस्फुट ऋक्षसहस्र जय । अतिशितपायित वज्रशतायित भीकरदंष्ट्र जय ॥ ४॥ विस्फुरदग्र मुखोदरनिर्गलदुग्र फणिद्युतिजिह्व जय । व्यायत घोर गुहामुखनिर्गत घनगुरुगर्जित विजय जय ॥ ५॥ तुङ्गभुजद्वय दण्डविजृम्भित शङ्खरथाङ्गकर । अंसविजृम्भण सम्भ्रमजृम्भित पीवरवत्स विभो ॥ ६॥ शुभ्र परिस्फुरदुग्रभुजङ्गम भङ्ग्युपवीत विभो । मुष्टिमितिक्रम पीतपटोत्कट मग्नवलग्न विभो ॥ ७॥ अष्टमहाभुज यष्टिविजृम्भण कूणितदृक् करिकूट विभो । वालविधूनन वेगविकम्पित सप्तसमीरण चक्र विभो ॥ ८॥ पीनतर प्रवरोरु समुद्धतिडोलित विश्वकटाह विभो । कच्छपकर्कश जानुविघट्टन भुग्नकुलाचलचक्र विभो ॥ ९॥ स्तम्भ विजृम्भण भावभयङ्कर विक्रमणक्रम जङ्घ विभो । युद्धसमुद्धत दानवमर्दन सज्जपदद्वयं जयजय भो ॥ १०॥ जयजय विश्वसुमङ्गल पिङ्गलवर्ण विनिर्जित नैशकल । ब्रह्मक्षत्रविबोध दिवाकर यादवशैल नृसिंह जय ॥ ११॥ घोरतरं तवरूपमिदं गुरुदेव रिपुव्रज भीतिकरम् । दुर्जन गर्जन तर्जन निश्चल साधुजन व्रजभीतिहरम् ॥ १२॥ जयतु जयोदय सम्भ्रम सम्भृत जय लक्ष्मीकर सङ्कलितम् । रूपमिदं तव देव महत्तरमुत्तम वीरदयादयितम् ॥ १३॥ जय जय विश्वविधारण कारण सत्वसमुद्धर धर्मविभो । जयजय सत्वर वैरिविजित्वर वीरनृसिंह विभो ॥ १४॥ दुष्ट भयङ्कर भक्तदयाकर चक्रगदाकर शङ्कर भो । जय जय जय जय देव जनार्दन जय नुतिरियमपि जयतितराम् ॥ १५॥ इति अरैयर श्रीरामशर्मणा बाल्य एव विरचिता श्रीविजयनारसिंहस्तुतिः सम्पूर्णा । Proofread by M K Barman
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% Author                : araiyara shrIrAmasharmaNA bAlya
% Language              : Sanskrit
% Subject               : philosophy/hinduism/religion
% Proofread by          : M K Barman
% Description/comments  : nRRisiMhakosha 2 upAsanA khaNDa
% Indexextra            : (Scans 1, 2)
% Latest update         : August 4, 2025
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