राजा सुप्रतीककृता रामस्तुतिः

राजा सुप्रतीककृता रामस्तुतिः

सुप्रतीक उवाच । नमामि रामं नरनाथमच्युतं कविं पुराणं त्रिदशारिनाशनम् । शिवस्वरूपं प्रभवं महेश्वरं सदा प्रपन्नार्तिहरं धृतश्रियम् ॥ ३॥ भवान् सदा देव समस्ततेजसां करोषि तेजांसि समस्तरूपधृक् । क्षितौ भवान् पञ्चगुणस्तथा जले चतुःप्रकारस्त्रिविधोऽथ तेजसि । द्विधाऽथ वायौ वियति प्रतिष्ठितो भवान् हरे शब्दवपुः पुमानसि ॥ ४॥ भवान् शशी सूर्यहुताशनोऽसि त्वयि प्रलीनं जगदेतदुच्यते । भवत्प्रतिष्ठं रमते जगद्यतः स्तुतोऽसि रामेति जगत् प्रतिष्ठितम् ॥ ५॥ भवार्णवे दुःखतरोर्मिसङ्कुले तथाक्षमानग्रहणेऽतिभीषणे । न मज्जति त्वत्स्मरणप्लवो नरः स्मृतोऽसि रामेति तथा तपोवने ॥ ६॥ वेदेषु नष्टेषु भवांस्तथा हरे करोषि मात्स्यं वपुरात्मनः सदा । युगक्षये रञ्जितसर्वदिङ्मुखो भवांस्तथाग्निर्बहुरूपधृग् विभो ॥ ७॥ कौर्मं तथा ते वपुरास्थितः सदा युगे युगे माधव तोयमन्थने । न चान्यदस्तीति भवत्समं क्वचिज्जनार्दनाद्यः स्वयं भूतमुत्तमम् ॥ ८॥ त्वया ततं विश्वमिदं महात्मन् स्वकाखिलान् वेद दिशश्च सर्वाः । कथं त्वमाद्यं परमं तु धाम विहाय चान्यं शरणं व्रजामि ॥ ९॥ भवानेकः पूर्वमासीत् ततश्च त्वत्तो मही सलिलं वह्निरुच्चैः । वायुस्तथा खं च मनोऽपि बुद्धिश्चेतोगुणास्तत्प्रभवं च सर्वम् ॥ १०॥ त्वया ततं विश्वमिदं समस्तं सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे । समस्तविश्वेश्वर विश्वमूर्ते सहस्रबाहो जय देव देव । नमोऽस्तु रामाय महानुभाव ॥ ११॥ इति स्तुतो देववरः प्रसन्नः तदा राज्ञः सुप्रतीकस्य मूर्तिम् । सन्दर्शयामास ततोऽभ्युवाच वरं वृणीष्वेति च सुप्रतीकम् ॥ १२॥ एवं श्रुत्वा वचनं तस्य राजा ससम्भ्रमं देवदेवं प्रणम्य । उवाच देवेश्वर मे प्रयच्छ लयं यदास्ते परमं वपुस्ते ॥ १३॥ इतीरिते राजवरः क्षणेन लयं तथाऽगादसुरघ्नमूर्तौ । स्थितस्तस्मिन्नात्मभूतो विमुक्तः स भूमिपः कर्मकाण्डैरनेकैः ॥ १४॥ इति वराहपुराणे द्वादशाध्यायान्तर्गता राजा सुप्रतीककृता श्रीरामस्तुतिः समाप्ता ।

हिन्दी भावार्थ

अथ सुप्रतीक कृत श्रीरामस्तुतिः । सुप्रतीक उवाच - नमामि रामं नरनाथमच्युतं कविं पुराणं त्रिदशारिनाशनम् । शिवस्वरूपं प्रभवं महेश्वरं सदा प्रपन्नार्तिहरं धृतश्रियम् ॥ ३॥ अर्थः - सुप्रतीक ने कहा- नरनाथ, अच्युत, कवि, पुराण, देवशत्रु असुरनाशक, शिवस्वरूप, सबके उत्पत्ति बिन्दु, महेश्वर, शरणागत के दुःखों को दूर करने वाले और ऐश्वर्ययुक्त भगवान श्रीराम को मैं प्रणाम करता हूँ । भवान् सदा देव समस्ततेजसां करोषि तेजांसि समस्तरूपधृक् । क्षितौ भवान् पञ्चगुणस्तथा जले चतुःप्रकारस्त्रिविधोऽथ तेजसि । द्विधाऽथ वायौ वियति प्रतिष्ठितो भवान् हरे शब्दवपुः पुमानसि ॥ ४॥ अर्थः - हे देव! हे हरि! आप ही समस्त तेजस्वियों को तेज प्रदान करने वाले हैं, आप ही समस्त रूपों को धारण करने वाले हैं । आप पृथ्वी में रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द आदि पाँच गुणों, जल में रूप, रस, स्पर्श, शब्द आदि चार गुणों; तेज में रूप, स्पर्श, शब्द आदि तीन गुणों; वायु में स्पर्श और शब्द दो गुणों तथा आकाश में शब्द रूप गुण के रूप में स्थित रहने वाले पुरुष हैं । भवान् शशी सूर्यहुताशनोऽसि त्वयि प्रलीनं जगदेतदुच्यते । भवत्प्रतिष्ठं रमते जगद् यतः स्तुतोऽसि रामेति जगत् प्रतिष्ठितम् ॥ ५॥ अर्थः - आप चन्द्र, सूर्य और अग्नि के स्वरूप हैं । आप ही में जगत् का लय होना बतलाया जाता है । इस प्रकार आपसे सुप्रतिष्ठित होकर जगत् आनन्द प्राप्त कर पाते हैं । अतः विश्व में प्रतिष्ठित आपके ``राम'' नाम से स्तुति की जाती है । भवार्णवे दुःखतरोर्मिसङ्कले तथाक्षमानग्रणेऽतिभीषणे । न मज्जति त्वत्स्मरणप्लवो नरः स्मृतोऽसि रामेति तथा तपोवने ॥ ६॥ अर्थः - हे प्रभु! आपके नाम स्मरण जैसी नौका पर आसीन पुरुष दुःखरूपी लहरों से पूर्ण एवं इन्द्रिय रूपी घड़इयाल से युक्त भयङ्कर संसार समुद्र में भी नहीं डूब पाता है । तपोवन में भी ``राम'' इस नाम मात्र से आपका स्मरण किया जाता है । वेदेषु नष्टेषु भवांस्तथा हरे करोषि मात्स्यं वपुरात्मनः सदा । युगक्षये रञ्जितसर्वदिङ्मुखो भवांस्तथाग्निर्बहुरूपधृग् विभो ॥ ७॥ अर्थः - हे दुःखों का हरण करने वाले प्रभु! वेदों के नष्ट होने के समय आप हमेशा अपना मत्स्य रूप धारण करते हैं । हे विभु! युगान्त में आप समस्त दिशाओं को ``रक्त'' वर्ण में ढाल देने वाले अनेक रूपधारी अग्नि हैं । कौर्मं तथा ते वपुरास्थितः सदा युगे युगे माधव तोयमन्थने । न चान्यदस्तीति भवत्समं क्वचिज्जनार्दनाद् यः स्वयं भूतमुत्तमम् ॥ ८॥ अर्थः - हे माधव ! समुद्रमन्थन के अवसर पर प्रत्येक युग में आप कूर्म रूप को धारण करने वाले हैं । आपके समान अन्य कोई कहीं नहीं है । आप ही आदि पुरुष जनार्दन स्वयं ही सर्वोत्तम हैं । त्वया ततं विश्वमिदं महात्मन् स्वकाखिलान् वेद दिशश्च सर्वाः । कथं त्वमाद्यं परम तु धाम विहाय चान्यं शरणं व्रजामि ॥ ९॥ अर्थः - हे महात्मन् श्रीराम ! आपने ही इस विश्वब्रह्माण्ड का विस्तार किया है । आप ही अपनी सम्पूर्ण सृष्टि और समस्त दिशाओं को जानने वाले हैं । अतः आद्य परमधाम को छोड़कर मैं अन्य किसी की शरण में कैसे जा सकता हूँ । भवानेकः पूर्वमासीत् ततश्च त्वत्तो मही सलिलं वह्निरुच्चैः । वायुस्तथा खं च मनोऽपि बुद्धिश्चेतो गुणास्तत्प्रभवं च सर्वम् ॥ १०॥ अर्थः - प्रत्येक सृष्टि के पूर्वकाल में एकमात्र आप ही रहा करते हैं । फिर आपसे ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि चित्त और अन्य सभी गुण प्रकट हुये तथा उन्हीं से ये समस्त संसार की उत्पत्ति हुई । त्वया ततं विश्वमिदं समस्तं सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे । समस्तविश्वेश्वर विश्वमूर्ते सहस्त्रबाहो जय देव देव । नमोऽस्तु रामाय महानुभाव ॥ ११॥ इति स्तुतो देववरः प्रसन्नः तदा राज्ञः सुप्रतीकस्य मूर्तिम् । सन्दर्शयामास ततोऽभ्युवाच वरं वृणीष्वेति न सुप्रतीकम् ॥ १२॥ अर्थः - आपने समस्त संसार का विस्तार किया है । आपको मैं सनातन पुरुष मानता हूँ । हे सम्पूर्ण विश्व के ईश्वर विश्वमूर्ति सहस्रबाहु ! देवाधिदेव ! आपकी सदा जय । हे महानुभाव! हे ``राम'' को प्रणाम है । इस तरह से स्तुति करने पर श्रेठदेव श्रीराम प्रसन्न होकर सुप्रतीक राजा को अपना स्वरूप दर्शन कराया और कहा- ``वर माँग लो'' । एवं श्रुत्वा वचनं तस्य राजा ससम्भ्रमं देवदेवं प्रणम्य । उवाच देवेश्वर मे प्रयच्छ लयं यदास्ते परमं वपुस्ते ॥ १३॥ अर्थः - राजा सुप्रतीक उनके इस प्रकार की वाणी को सुनकर ससम्मान देवाधिदेव को प्रणाम किया और कहा ``हे देवेश्वर! आप मुझे अपने श्रेष्ठ स्वरूप में मिला लें'' । इतीरिते राजवरः क्षणेन लयं तथाऽगादसुरघ्नमूर्ती । स्थितस्तस्मिन्नात्मभूतो विमुक्तः स भूमिपः कर्मकाण्डैरनेकैः ॥ १४॥ अर्थः - इस प्रकार से कहते ही श्रेष्ठ राजा पलमात्र में असुरारि श्रीराम के स्वरूप में लीन हो गया तथा अनेक विध के कर्म बन्धनों से विमुक्त हो, उन देव के आत्मभूत होकर स्थित हो गया । -श्रीवराहपुराणे भगवच्छास्त्रे द्वादशोऽध्यायः वराहपुराण । अध्याय १२/३-१४॥ varAhapurANa . adhyAya 12/3-14.. Proofread by PSA Easwaran. Hindi meaning encoded and proofread by Mrityunjay Pandey
% Text title            : Raja Supratikakrita Rama Stutih with Hindi meaning
% File name             : rAjAsupratIkakRRitArAmastutiH.itx
% itxtitle              : rAmastutiH 13 (rAjAsupratIkakRitA varAhapurANAntargatam hindI bhAvArthasahitA namAmi rAmaM naranAthamachyutaM)
% engtitle              : rAjAsupratIkakRitA rAmastutiH with Hindi meaning
% Category              : raama, stuti, varAhapurANa, rAma
% Location              : doc_raama
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% Language              : Sanskrit/Hindi
% Subject               : philosophy/hinduism/religion
% Proofread by          : PSA Easwaran
% Translated by         : encoded by Mrityunjay Pandey
% Description/comments  : varAhapurANa | adhyAya 12/3-14||
% Indexextra            : (Scans 1, 2, 3, Hindi, English)
% Latest update         : October 21, 2025
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