श्रीरामसामर्थ्यनिरूपणम्
श्रीहनुमानोवाच -
कामं खल्वहमप्येकः सवाजिरथकुञ्जराम् ।
लङ्कां नाशयितुं शक्तस्तस्यैष तु न निश्चयः ॥ ३१॥
हनुमानजी रावण से कहते हैं - ``निस्सन्देह मैं अकेला ही, घोड़ों, रथों और हाथियों से युक्त पूरी लङ्का का विनाश करने में समर्थ हूँ; किन्तु यह (ऐसा करना) मेरे स्वामी भगवान श्रीराम का आदेश नहीं है ।''
सत्यं राक्षसराजेन्द्र शृणुष्व वचनं मम ।
रामदासस्य दूतस्य वानरस्य विशेषतः ॥ ३८॥
``हे राक्षसराज रावण! मेरे वचनों को सत्य समझकर ध्यानपूर्वक सुनो - मैं भगवान श्रीराम का दास, उनका दूत और विशेष रूप से वानर हूँ ।''
सर्वांल्लोकान् सुसंहृत्य सभूतान् सचराचरान् ।
पुनरेव तथा स्रष्टुं शक्तो रामो महायशाः ॥ ३९॥
अर्थः ``महायशस्वी भगवान श्रीराम सम्पूर्ण लोकों को, सभी चराचर (चल-अचल) प्राणियों सहित, यदि चाहें तो संहार कर सकते हैं - और वैसे ही पुनः उनकी सृष्टि करने में भी समर्थ हैं ।''
देवासुरनरेन्द्रेषु यक्षरक्षोरगेषु च ।
विद्याधरेषु नागेषु गन्धर्वेषु मृगेषु च ॥ ४०॥
अर्थः ``देवताओं में, असुरों और नरेशों में, यक्षों, राक्षसों, सर्पों में, विद्याधरों, नागों, गंधर्वों तथा मृगों (पशुओं) में भी ।''
सिद्धेषु किन्नरेन्द्रेषु पतत्त्रिषु च सर्वतः ।
सर्वत्र सर्वभूतेषु सर्वकालेषु नास्ति सः ॥ ४१॥
यो रामं प्रतियुध्येत विष्णुतुल्यपराक्रमम् ।
अर्थः ``सिद्धों में, किन्नरों के श्रेष्ठों में, पक्षियों में और सब ओर - समस्त प्राणियों में, सभी कालों (भूत, भविष्य एवं वर्तमान) में भी कोई नहीं है । जो भगवान श्रीरामसे, जो विष्णु के समान पराक्रमी हैं, युद्ध करने का साहस करे।''
सर्वलोकेश्वरस्येह कृत्वा विप्रियमीदृशम् ।
रामस्य राजसिंहस्य दुर्लभं तव जीवितम् ॥ ४२॥
अर्थः हे रावण! ``तूने समस्त लोकों के ईश्वर, राजाओं में सिंह, भगवान श्रीराम के प्रति ऐसा अप्रिय कार्य किया है, उसके लिए अब इस संसार में तेरा जीवित रहना दुर्लभ है ।''
देवाश्च दैत्याश्च निशाचरेन्द्र गन्धर्वविद्याधरनागयक्षाः ।
रामस्य लोकत्रयनायकस्य स्थातुं न शक्ताः समरेषु सर्वे ॥ ४३॥
अर्थः ``हे राक्षसों के राजा! देवता, दैत्य, गन्धर्व, विद्याधर, नाग और यक्ष - इन सबमें से कोई भी भगवान श्रीराम, जो तीनों लोकों के नायक हैं, उनके सामने युद्ध में ठहरने की शक्ति नहीं रखता ।''
ब्रह्मा स्वयम्भूश्चतुराननो वा रुद्रस्त्रिनेत्रस्त्रिपुरान्तको वा ।
इन्द्रो महेन्द्रः सुरनायको वा स्थातुं न शक्ता युधि राघवस्य ॥ ४४॥
अर्थः ``स्वयंभू चारमुख ब्रह्मा हों या त्रिनेत्र, त्रिपुरासुर का संहार करने वाले रुद्र (शिव), अथवा महान ऐश्वर्यशाली देवताओं के राजा इन्द्र - ये सभी भी युद्ध में भगवान श्रीराघव के सामने ठहरने में समर्थ नहीं हैं ।''
इति हनुमानप्रोक्तं श्रीरामसामर्थ्यनिरूपणं सम्पूर्णम् ।
- वाल्मीकि रामायण सुन्दरकाण्ड अध्याय ५१ । ३१,३८-४४
- vAlmIki rAmAyaNa sundarakANDa adhyAya 51 . 31,38-44
Notes:
In the 51st chapter of Sundarkand of Valmiki Ramayana, this is a part of the dialogue between Lord Hanuman and Ravana in which Lord Hanuman describes the capabilities of Lord Shri Rama.
In the first chapter of Balakanda of Valmiki Ramayana, there is a dialogue between Narada and Valmiki - in which Valmiki asks questions to Narada.
Bāla-kāṇḍa 1.1.3
चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः ।
विद्वान्कः कः समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः ॥
(Translation by M N Dutt) Who is qualified by virtue of his character, and who is engaged in the welfare of all creatures? Who is learned and capable? Who alone is ever lovely to behold?
It appears that Lord Hanuman is expounding on the quality of Lord Rama in this description.
Encoded and proofread by Mrityunjay Pandey