||प्रमाण लक्षण ( माधव) ||
||श्री गुरुभ्यो नमः हरिः ॐ ||
अशेषगुरुमीशेशं नारायणमनामयम् |
संप्रणम्य प्रवक्ष्यामि प्रमाणानां स्वलक्षणम् ||||
यथार्थं प्रमाणम् | |
तद्द्विविधम् | केवलमनुप्रमाणं च | |
यथार्थज्ञानं केवलम् | |
तत्साधनमनुप्रमाणम् | |
केवलं चतुर्विधम् | ईशलक्ष्मीयोग्योगिभेदेन | |
पूर्वद्वयमनादिनित्यम् | |
स्वातंत्रपारतंत्राभ्यां तद्विशेषः | पूर्वं
स्वपरगताखिलविशेष विषयम् | द्वितीयं
ईशेऽन्येभ्योऽधिकम् | |
असार्वत्रिकम् | अन्यत्र सर्वविषयम् | स्पष्टत्वे भेदः | |
योगिज्ञानं ऋजूनामनादिनित्यम् | ईशे जीवेभ्योऽधिकम् |
अन्यत्रालोचने सर्वविशयम् | क्रमेण वर्धमानम् |
आमुक्तेः | ततोऽव्ययम् | |
ततोऽर्वाक्क्रमेण ह्रसितम् | सादि च तात्त्विकेभ्योऽन्यत्र | |
अयोगिज्ञानं उत्पत्तिविनाशवत् | अल्पम् | |
अनुप्रमाणं त्रिविधम् | प्रतक्षमनुमानमागमं इति | |
निर्दोषार्थेन्द्रियसन्निकर्षः प्रत्यक्षम् |
निर्दोषोपपत्तिरनुमानम् | निर्दोषः शब्दः आगमः | |
अर्थापत्त्युपमे अनुमा विशेषः | |
अभावोऽनुमाप्रत्यक्षं च | |
परामर्शापरामर्शविशेषात् | |
संभवपरिशेषानुमा | |
आत्मान्योन्याश्रय चक्रकानवस्थाकल्पनागौरव
श्रुतदृष्टहानादयोदूषणानुमा | |
उपक्रमोपसंहार तदैकरूपाभ्यासापूर्वताफलार्थवादाश्च | |
उपपत्तिविशेषाः | |
त एव सोपपत्तयो लिङ्गानि | |
समाख्या वाक्यप्रकरणस्थानानि च | लिङ्गविशेषाः | |
व्याप्तिरुपपपत्तिमूलम् | |
सा प्रतिज्ञाहेतुदृष्टांतरूपा | |
हेतुगर्भा प्रतिज्ञा केवलाऽपि | |
सिद्धौ प्रतिज्ञायां हेतुमात्रं च | |
दृष्टांतः स प्रतिज्ञो हेतुगर्भः | |
उपपत्तिदोषौ विरोधासङ्गति | |
न्यूनाधिके वाचनिके | |
संवादानुक्तियुतास्तु एव निग्रहाः | |
प्रत्यक्षं सप्तविधम् | साक्षि षडिन्द्रियभेदेन | |
मानस प्रत्यक्षजा स्मृतिः | |
स्मृत्यनुवादयोर्नाप्रामाण्यम् | |
यथार्थत्वानुभवात् | |
अहानेश्च | |
विरोधो मानस्ववाक्याभ्याम् | |
स्ववाक्यविरोधोऽपसिद्धांतजातिरूपेण | |
जातिर्न मेये मानापेक्षेत्यादिका | |
मेये मानापेक्षास्तीति च तेनैव न्यायेन सिद्धत्वात् | |
मानविरोधश्च | |
छलमसङ्गति | |
अन्यच्च | |
अन्यच्च | |
गृष्टिविवक्षया गामानयेत्युक्ते पृथिवी विवक्षया
गवानयनमशक्यमितिवत् | |
त्रिविधो विरोधः | प्रतिज्ञाहेतुदृष्टांतभेदेन | |
प्रमाणविरुद्धार्थप्रतिज्ञा प्रतिज्ञाविरोधः | |
हेतुस्वरूपासिद्धिरव्याप्तिश्चेति हेतुविरोधः | |
साध्यस्य साधनस्य वाऽननुगमो दृष्टांत विरोधः | |
प्रतिज्ञायाः समबलविरोध एव सप्रतिसाधनः | |
स एवोपाधि दोषोऽपि | |
सर्व एते दृश्यत्वानुमाने दृष्टव्याः | |
प्रत्यक्षागमादिभिर्जगतः सत्यत्वात् | |
तत्पक्षे दृश्यत्वस्य च मिथ्यात्वात् | |
अनिर्वचनीयस्य प्रतिवादिनोऽसिद्धत्वात् | |
अनिर्वचनीयस्येति | |
आत्मनोऽपि दृश्यत्वात् | |
शुक्तिरजतादेरनिर्वचनीयत्वाभावात् | |
अनिर्वचनीय दृश्यत्वाभावात् | |
मानसिद्धत्वादिति सप्रतिसाधनत्वात् | |
जगत्सत्यत्वग्राहि प्रत्यक्षस्य वर्तमानमात्रग्राहित्वे
अनुमानागमप्रामाण्य ग्राहिणोऽपि प्रत्यक्षत्वाविशेषादुत्तरक्षणे
प्रामाण्यं न सेत्स्यतीति भेदादिवाक्यानामेव प्रामाण्यं स्यात् | |
तस्य साक्षिसिद्धत्वं चेज्जगत्सत्यत्वमपि साक्षिसिद्धम् | |
व्यभिचारिश्चेदागमार्थानुमानिर्दोषत्वाध्यवसाये च समः | |
अत उत्तरदिवसेऽभेदवाक्यस्य भेदोऽर्थः स्यात् | |
निर्दोषानुमायाः सदोषत्वम् | |
सदोषानुमायाः निर्दोषत्वम् | |
इत्यव्यवस्था | |
आश्रयसाध्यवधिकरणासिद्धयो न दूषणम् | |
अतिप्रसङ्गाभावात् | |
अतिप्रसङ्गेन हि दोषत्वादोषत्वे कल्प्ये | |
व्याप्तिरेव हि प्रयोजिका | |
असत्यपि व्याप्तिरस्त्येव | |
असदाश्रयस्य साधकत्वं नेत्यपि व्याप्तिं विना
कथं निवार्यते | |
असदाश्रयमित्यादि विशेषणत्वसंभवे कथमव्याप्तिः | |
न चात्यंताभावोऽपि सर्वधर्मरहितः | प्रमेयत्वाद्यनुभवात् | |
परिशेषार्थापत्तिप्रामाण्याभ्युपगमाच्च | |
विमतं सकर्तृकमित्यत्र सर्वज्ञत्वस्य पक्षधर्मता बलेन
सिद्ध्यङ्गीकारात् | |
परिशेषोऽर्थापत्तिरनुमानमित्यविशेषः | उपपत्तिमात्रत्वात् | |
उपपत्तेश्च व्याप्त्यपेक्षा सर्वथाङ्गीकार्येत्याग्रह मात्रेण भेदः | |
उपमानस्यापि व्याप्तिरूपत्वात् | |
न हि स्वसदृशेनासदृशं क्वचिद्दृष्टम् | |
योग्यानुपलब्धेश्च लिङ्गत्वम् | |
अविशेषात् | |
अविशेषात् | |
अविशेषात् | |
अविशेषात् | |
उक्तदोषेष्वेवाशेषानुमानदोषाणामंतर्भावः | |
साध्याविशिष्टोऽसिद्धिः | |
सिद्धसाधकोऽसङ्गतिः | |
न प्रमासाधनं प्रमाणम् | |
ज्ञानव्यतिरिक्तप्रमायां प्रमाणाभावात् | |
न चाज्ञातपरिच्छित्तिरेव प्रमेत्यत्र किञ्चिन्मानम् | |
याथार्थ्यमेव प्रामाण्यमित्यङ्गीकारात् | |
न चानुभूतिरेव प्रमाणम् | स्मृत्यादावव्याप्तेः | |
वेदानुमानादि प्रामाण्यप्रसिद्धेश्च | |
स्मृतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानश्चतुष्टयम् |
प्रमाणमिति विज्ञेयं धर्माद्यर्थे बुभूषुभिः ||
इति श्रुतेश्च | |
ऐतिह्यमागमभेदः | |
न च सम्यगनुभवसाधनं प्रमाणम् | ईश्वरज्ञानादावव्यप्तेः | |
अप्रामाण्ये प्रमाणाभावच्च | |
प्रामाण्यज्ञाने च | |
तत्राप्यङ्गीकारेऽनवस्थितेः | |
स्वप्रकाशात्माङ्गीकारे तत्राव्याप्तेः | |
स्मृतेश्च प्रामाण्यानङ्गीकारेऽनुभूतं मयेत्यत्र प्रमाणाभावात् | |
लिङ्गत्वेन प्रामाण्ये कल्पनागौरवम् | |
दृष्टहानिश्च | |
स्मृतिप्रमाणद्वैविध्यमात्रकल्पने मिथ्याज्ञानादेर्निरासादनुभव
विरोधः | |
तदनुभवाभाव इत्युक्तेऽनुभवः स्मृतिश्च नास्तीत्युक्ते
किमुत्तरम् | |
स्वसिद्धैः साधनं परसिद्धैर्दूषणम् | |
अतो न दूषणे अपसिद्धांतादि | |
इष्टापत्तिः सिद्धसाधनत्वादसङ्गतमेव | |
आनंदतीर्थमुनिना ब्रह्मतर्कोक्तमार्गतः |
मानलक्षणमित्युक्तं सङ्क्षेपाद्ब्रह्मसिद्धये ||||
अशेषमानमेयैक साक्षिणेऽक्षयमूर्तये |
अजेश पुरुहूतेड्य नमो नारायणाय ते ||||
इति श्रीमदानंदतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितं
प्रमाणलक्षनग्रन्थोत्तमं संपूर्णम्
||भारतीरमणमुख्यप्राणांतर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||
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