||भगवतीपद्यपुष्पांजलिस्तोत्र महिषासुरमर्दिनिस्तोत्रम् ||ः२>
श्री त्रिपुरसुन्दर्यै नमः ||
भगवती भगवत्पदपङ्कजं भ्रमरभूतसुरासुरसेवितम् |
सुजनमानसहंसपरिस्तुतं कमलयाऽमलया निभृतं भजे ||१||
ते उभे अभिवन्देऽहं विघ्नेशकुलदैवते |
नरनागाननस्त्वेको नरसिंह नमोऽस्तुते ||२||
हरिगुरुपदपद्मं शुद्धपद्येऽनुरागाद्
विगतपरमभागे सन्निधायादरेण |
तदनुचरि करोमि प्रीतये भक्तिभाजां
भगवति पदपद्मे पद्यपुष्पाञ्जलिं ते ||३||
केनैते रचिताः कुतो न निहिताः शुम्भादयो दुर्मदाः
केनैते तव पालिता इति हि तत् प्रश्ने किमाचक्ष्महे |
ब्रह्माद्या अपि शंकिताः स्वविषये यस्याः प्रसादावधि
प्रीता सा महिषासुरप्रमथिनीच्छ्द्यादवद्यानि मे ||४||
पातु श्रीस्तु चतुर्भुजा किमु चतुर्बाहोर्महौजान्भुजान्
धत्तेऽष्टादशधा हि कारणगुणान्कार्ये गुणारम्भकाः |
सत्यं दिक्पतिदन्तिसंख्यभुजभृच्छम्भुः स्वय्म्भूः स्वयं
धामैकप्रतिपत्तये किमथवा पातुं दशाष्टौ दिशः ||५||
प्रीत्याऽष्टादशसंमितेषु युगपद्द्वीपेषु दातुं वरान्
त्रातुं वा भयतो बिभर्षि भगवत्यष्टादशैतान् भुजान् |
यद्वाऽष्टादशधा भुजांस्तु बिभृतः काली सरस्वत्युभे
मीलित्वैकमिहानयोः प्रथयितुं सा त्वं रमे रक्षमाम् ||६||
अयि गिरिनंदिनि नंदितमेदिनि विश्वविनोदिनि नंदनुते
गिरिवर विंध्य शिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते |
भगवति हे शितिकण्ठकुटुंबिनि भूरि कुटुंबिनि भूरि कृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१||||७||
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते |
दनुज निरोषिणि दितिसुत रोषिणि दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||२||||८||
अयि जगदंब मदंब कदंब वनप्रिय वासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्ग हिमालय शृंग निजालय मध्यगते |
मधु मधुरे मधु कैटभ गंजिनि कैटभ भंजिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||३||||९||
अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड वितुण्डित शुण्ड गजाधिपते
रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते |
निज भुज दण्ड निपातित खण्ड विपातित मुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||४||||१०||
अयि रण दुर्मद शत्रु वधोदित दुर्धर निर्जर शक्तिभृते
चतुर विचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते |
दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति दानवदूत कृतांतमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||५||||११||
अयि शरणागत वैरि वधूवर वीर वराभय दायकरे
त्रिभुवन मस्तक शूल विरोधि शिरोधि कृतामल शूलकरे |
दुमिदुमि तामर दुंदुभिनाद महो मुखरीकृत तिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||६||||१२||
अयि निज हुँकृति मात्र निराकृत धूम्र विलोचन धूम्र शते
समर विशोषित शोणित बीज समुद्भव शोणित बीज लते |
शिव शिव शुंभ निशुंभ महाहव तर्पित भूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||७||||१३||
धनुरनु संग रणक्षणसंग परिस्फुर दंग नटत्कटके
कनक पिशंग पृषत्क निषंग रसद्भट शृंग हतावटुके |
कृत चतुरङ्ग बलक्षिति रङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१४||
सुरललनाततथेयितथेयितथाभिनयोत्तरनृत्यरते
हासविलासहुलासमयि प्रणतार्तजनेऽमितप्रेमभरे |
धिमिकिटधिक्कटधिकटधिमिध्वनिघोरमृदंगनिनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||८||||१५||
जय जय जप्य जयेजय शब्द परस्तुति तत्पर विश्वनुते
झण झण झिञ्जिमि झिंकृत नूपुर सिंजित मोहित भूतपते |
नटित नटार्ध नटीनट नायक नाटित नाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||९||||१६||
अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनः सुमनोहर कांतियुते
श्रित रजनी रजनी रजनी रजनी रजनीकर वक्त्रवृते |
सुनयन विभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१०||||१७||
सहित महाहव मल्लम तल्लिक मल्लित रल्लक मल्लरते
विरचित वल्लिक पल्लिक मल्लिक झिल्लिक भिल्लिक वर्ग वृते |
सितकृत फुल्लिसमुल्ल सितारुण तल्लज पल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||११||||१८||
अविरल गण्ड गलन्मद मेदुर मत्त मतङ्गज राजपते
त्रिभुवन भूषण भूत कलानिधि रूप पयोनिधि राजसुते |
अयि सुद तीजन लालसमानस मोहन मन्मथ राजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१२||||१९||
कमल दलामल कोमल कांति कलाकलितामल भाललते
सकल विलास कलानिलयक्रम केलि चलत्कल हंस कुले |
अलिकुल सङ्कुल कुवलय मण्डल मौलिमिलद्भकुलालि कुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१३||||२०||
कर मुरली रव वीजित कूजित लज्जित कोकिल मञ्जुमते
मिलित पुलिन्द मनोहर गुञ्जित रंजितशैल निकुञ्जगते |
निजगुण भूत महाशबरीगण सद्गुण संभृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१४||||२१||
कटितट पीत दुकूल विचित्र मयूखतिरस्कृत चंद्र रुचे
प्रणत सुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुल सन्नख चंद्र रुचे |
जित कनकाचल मौलिपदोर्जित निर्भर कुंजर कुंभकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१५||||२२||
विजित सहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृत सुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते |
सुरथ समाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१६||||२३||
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं स शिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् |
तव पदमेव परंपदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१७||||२४||
कनकलसत्कल सिन्धु जलैरनु सिञ्चिनुते गुण रङ्गभुवं
भजति स किं न शचीकुच कुंभ तटी परिरंभ सुखानुभवम् |
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१८||||२५||
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूत पुरीन्दुमुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते |
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||१९||||२६||
अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितासिरते |
यदुचितमत्र भवत्युररि कुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ||२०||||२७||
स्तुतिमितस्तिमितः सुसमाधिना नियमतोऽयमतोऽनुदिनं पठेत् |
परमया रमयापि निषेव्यते परिजनोऽरिजनोऽपि च तं भजेत् ||२८||
रमयति किल कर्षस्तेषु चित्तं नराणामवरजवर यस्माद्रामकृष्णः कवीनाम् |
अकृत सुकृतिगम्यं रम्यपद्दैकहर्म्यं स्तवनमवनहेतुं प्रीतये विश्वमातुः ||२९||
इन्दुरम्यो मुहुर्बिन्दुरम्यो मुहुर्बिन्दुरम्यो यतः सोऽनवद्यः स्मृतः |
श्रीपतेः सूनूना कारितो योऽधुना विश्वमातुः पदे पद्यपुष्पाञ्जलिः ||३०||
इति श्रीभगवतीपद्यपुष्पाञ्जलिस्तोत्रम् ||
The inner numbering of 1 through 20, between 7 and 27 suggests the popular
mahiShasuramardini stotra.
%@@1
% File name : mahisha.itx
%--------------------------------------------
% Text title : bhagavatIpadyapuShpA.njalistotra which includes Shri Mahishasuramardini Stotra
% Author : raamakR^iShNa kavii
% Language : Sanskrit
% Subject : philosophy/hinduism/religion
% Description/comments : Mahadevan Swaminathan mentioned the author of bhagavatIpadyapuShpA.njalIstotra
% Transliterated by : A.Hudli also by G. Ramkumar ramkumar@cs.stanford.edu
% Proofread by : A.Hudli also by G. Ramkumar ramkumar@cs.stanford.edu
% Latest update : October 29, 2002, June 2, 2007, May 3 2009
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%
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% http://sanskritdocuments.org
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% Any use for commercial purpose is prohibited as a 'gentleman's'
% agreement.
% @@2
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